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आर्थिक अनुमानों में विरोधाभास! क्या वाकई सुरक्षित है भारत का ‘मिडिल क्लास’ और घरेलू बजट?

अनिश्चित वैश्विक माहौल के बीच मध्यम वर्ग और गिग वर्कर्स के लिए आर्थिक भविष्य धुंधला है। पारदर्शी नीतिगत संकेतों की कमी घरेलू बजट और भरोसे को कमजोर कर सकती है

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रमा बिजापुरकर   
Last Updated- May 12, 2026 | 11:12 PM IST

पश्चिम एशिया के संघर्ष और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के मोर्चे पर अनिश्चितता के बावजूद, नीति-निर्माता यह स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि घरेलू खपत इस उथल-पुथल के बीच हमारी सबसे बड़ी मजबूत कड़ी बनेगी। शेयर बाजार चढ़ता और गिरता रहा है और इसको लेकर एक कथ्य यह है कि ये केवल अस्थायी झटके हैं और यह चरण भी जल्द ही गुजर जाएगा।  

भारतीय रिजर्व बैंक के मार्च 2026 के उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण बताते हैं कि देश के शहरी और ग्रामीण उपभोक्ता कुछ असंतुष्ट जरूर हैं लेकिन भरोसे में किसी गंभीर गिरावट के संकेत नहीं देते और उन्हें विश्वास है कि अगला साल आज से बेहतर होगा। हालांकि दोनों ही तरह के उपभोक्ता, दिशात्मक आधार पर सर्वेक्षण में अर्थव्यवस्था और रोजगार को लेकर विश्वास में कमजोरी दिखाते हैं।

शहरी उपभोक्ताओं की भावना पिछले एक साल से नकारात्मक रही है जबकि ग्रामीण उपभोक्ता अब लगभग सकारात्मक क्षेत्र में हैं। ग्रामीण भारत में आय को लेकर अपेक्षाएं स्पष्ट रूप से कमजोर हुई हैं जबकि शहरी भारत में यह थोड़ी गिरावट के साथ अब भी मामूली रूप से सकारात्मक बनी हुई है।

इसके बावजूद उपभोक्ता अपनी खर्च करने की योजना, यहां तक कि गैर-जरूरी खर्च में पीछे नहीं हट रहे। अगले साल के लिए, अर्थव्यवस्था, रोजगार और गैर-जरूरी खर्च को लेकर अपेक्षाओं में स्पष्ट सुधार देखने को मिलता है और आय की उम्मीद में और भी बड़ी तेजी है। मूल्य वृद्धि की धारणा में भी हल्का सुधार देखा गया है।

लेकिन इस आशावादी तस्वीर में जो सबसे बड़ी कमी नजर आती है वह है उन लोगों से भविष्य के संकेतों की कमी जो भारत की अर्थव्यवस्था को इस उथल-पुथल से आगे ले जा रहे हैं। तेल आयात पर हमारी निर्भरता और संभावित संरचनात्मक बदलाव को देखते हुए, यह कहना कि यह केवल अस्थायी झटके हैं और पुरानी स्थिति सामान्य तौर पर बहाल हो जाएगी, यह सब यथार्थ के करीब नहीं लगता।

हमारी अर्थव्यवस्था पर असर न हो यह संभव नहीं, ऐसे में सरकारों की यह चुप्पी रणनीतिक हो सकती है क्योंकि उन्होंने शायद पहले से ही मुकाबला करने की योजनाएं बनाई हों और उपभोक्ताओं या कारोबारों को डराने वाली खबरों से बचाना चाह रहे हों।

किन नीतिगत कदमों के आधार पर घर के बजट पर किस प्रकार का दबाव पड़ सकता है, इसके बारे में अनुमान न होने से उपभोक्ता और कमजोर तथा असुरक्षित हो जाते हैं। इसका असर यह होता है कि उपभोक्ताओं को अपने बजट और खर्च की नीतियां खुद तय करनी पड़ती हैं। उन्हें अचानक आने वाले झटकों को समायोजित करना और जल्दी निर्णय लेना पड़ता है। उच्च-आय वर्ग वाले परिवार जो अक्सर घरेलू खर्च और बचत में सबसे ज्यादा असर डालते हैं, वे कम प्रभावित होते हैं क्योंकि उनके पास पर्याप्त भंडार और आय के स्थिर तरीके होते हैं।

उनका कुल खर्च सामान्यतः बना रहेगा या केवल स्थगित होगा। फिर भी, उनके खर्च और बचत के विकल्पों में बदलाव हो सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों और प्रमुख कंपनियों के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा साथ ही रोजगार, उपभोक्ता विश्वास और निवेश की गति में सुधार पर असर पड़ेगा।

कम आमदनी वाले परिवारों के लिए यह माना जाता है कि सरकार की सुरक्षा का दायरा जारी रहेगा फिर भी, हमें इस बारे में कोई संकेत नहीं मिले हैं कि इसमें कोई बदलाव होगा या इसका उनके जीवन और खर्च पर क्या असर पड़ेगा।  सबसे अधिक प्रभावित होने वाले परिवार वे हैं जो आय के हिसाब से मध्य 50 फीसदी में आते हैं। यह आर्थिक रूप से नाजुक, मेहनती और महत्त्वाकांक्षी मध्य वर्ग वाला भारत है।

इसे हम कम से कम अगली पीढ़ी में एक स्थिर और सशक्त मध्य वर्ग में बदलने की उम्मीद रखते हैं। यही वह वर्ग है जिसे अच्छे समय में ऋण लेकर खर्च करने, आवास और शिक्षा के लिए प्रोत्साहित  किया जाता है। लेकिन भविष्य में क्या हो सकता है इसका अंदाजा लगाने के लिए इस वर्ग के पास साधन नहीं हैं।  

आर्थिक संकट के प्रारंभिक चेतावनी संकेतों जैसी जानकारी इस वर्ग तक पहुंचने में भी देर होती है, क्योंकि इनके नियोक्ता, उनके नियोक्ताओं के नियोक्ता या यहां तक कि ग्राहक भी ज्यादातर अनौपचारिक या अंशकालिक काम (गिग) वाली अर्थव्यवस्था में शामिल हैं। स्विगी या जेप्टो के डिलीवरी कर्मी और उबर ड्राइवर, जो औपचारिक गिग अर्थव्यवस्था में काम करते हैं, वे भी अपने भविष्य की आय के संकेत पकड़ने में सक्षम नहीं हैं।

उपभोक्ता विश्लेषकों का यह व्यंग्यात्मक और सही कथन है कि यह बड़ा वर्ग हमारी राजनीति के मूल में है लेकिन यह वित्तीय संस्थानों में गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) के आंकड़ों में ही मायने रखता है जिसके लिए प्रावधान होता ही है।

फिर भी, यह ‘मध्य 50 फीसदी’ वाले परिवार राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता के लिए और विकसित भारत की दिशा में गति बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हें तात्कालिक भविष्य के बारे में वही सम्मान और अनुमान मिलना चाहिए जैसा कि उन्हें लंबे समय की योजना और संभावनाओं के लिए दिया जा रहा है।

किस प्रकार का शांतिपूर्ण अनुमान उपयोगी हो सकता है? सबसे पहले, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में और क्यों ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं और इसका सामान्य मूल्य वृद्धि, सब्सिडी, गैस, पेट्रोल, डीजल और ऋण की उपलब्धता पर क्या असर पड़ेगा।

दूसरा, अगर ऊर्जा की अधिक लागत बनी रहती है तब यह बताया जाना चाहिए कि इसका कितना बोझ आम आदमी को उठाना पड़ेगा। इससे मध्य-आय वाला भारतीय उपभोक्ता आज से ही अपने वित्तीय निर्णय और योजनाएं, बेहतर तरीके से बना सकेगा। इसके अलावा, बड़े और छोटे कृषि व्यवसायों तथा छोटे उद्यमों के लिए इस तरह के अनुमान कि किस तरह के नीतिगत समर्थन की उम्मीद की जा सकती है, यह उनके लिए बेहद मूल्यवान होगा।

अब तक सरकार के कथ्य, लंबी अवधि में भारत के अनिवार्य उत्थान, वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद स्थिरता और सकारात्मक सोच पर केंद्रित रहे हैं। लोगों और छोटे कारोबार को बड़े सपने देखने, साहसिक कदम उठाने और आत्मनिर्भरता, कौशल निर्माण आदि के जरिये अपनी स्थिति बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। संदेश यह है कि राज्य पारिस्थितिकी तंत्र और बुनियादी ढांचा बनाएगा लेकिन नागरिकों को अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी लेनी होगी। ऐसे कथ्य के बीच, निकट भविष्य के बारे में स्पष्ट अनुमान और भी जरूरी हो जाता है।

First Published : May 12, 2026 | 10:57 PM IST