इलेस्ट्रेशन: अजय मोहंती
आर्थिक जगत अब द्विपक्षीय निवेश संधियों (बीआईटी) पर हमारी गलतियों को लेकर जागरूक हो गया है। बुनियादी रूप से भारत के लिए यह बेहतर है कि वह हर साल एक बड़ी राशि का भुगतान करे और बदले में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में शामिल विशाल धनराशि को स्थिर बनाए। भारत के सबसे अधिक हित में यही है कि वह विदेशी निवेशकों को गहरी सुरक्षा प्रदान करे। यहां तक कि घरेलू निवेशकों से किए गए वादों से कहीं आगे बढ़कर ऐसा करे। हम जिन आंकड़ों की बात कर रहे हैं वे शायद असंतुष्ट विदेशी निवेशकों को 20 अरब डॉलर सालाना तक के भुगतान के समान हैं। बदले में हमें 2 लाख करोड़ डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त होंगे। जो भारतीय राज्य संस्थागत विफलता के लिए कीमत चुकाता है, वही राज्य नीतिगत सुधार करने के लिए भी अधिक इच्छुक होगा, जिससे समाज को बहुत बड़े लाभ मिलेंगे।
इन बुनियादी बातों के साथ हमें दो सवालों के जवाब देने चाहिए। व्हाइट इंडस्ट्रीज जैसे मामले फिर न हों इसे कैसे पुख्ता किया जाए? बेहतर संधियों के साथ भी क्या निजी निवेशक वास्तव में आएंगे?
विभिन्न देश निवेश संधियों पर हस्ताक्षर क्यों करते हैं? जर्मनी में फैक्टरी लगाने से पहले कोई संधि की मांग नहीं करता। जर्मन अदालतें, प्रशासन और राजनीति स्वयं में भरोसा जगाती हैं। निवेश संधियां इसलिए अस्तित्व में हैं क्योंकि विकासशील देशों की राज्य संस्थाएं कमजोर होती हैं। यह संधि किराए पर ली गई विश्वसनीयता है: पूंजी को आज आकर्षित करने का एक तरीका, जबकि घरेलू संस्थाएं अभी निर्माणाधीन हैं।
पूंजी के आगमन से पहले सरकार के पास अच्छी शर्तें देने का हर प्रोत्साहन होता है लेकिन समस्या यह है कि वादों को विश्वसनीय रूप से बांधना कठिन होता है। एक बार जब पूंजी बिजली संयंत्र या खदान में लग जाती है तो सौदेबाजी की ताकत उलट जाती है और वही सरकार शर्तों को बदलने का हर प्रोत्साहन रखती है। निवेशक यह पहले से जानते हैं। कोई भी सरकार जो अपने वादों को बाध्यकारी नहीं बना सकती वह पाएगी कि निवेशक उससे जोखिम का मूल्य वसूलते हैं। यह उच्च रिटर्न की मांग के रूप में हो सकता है। या फिर वे पूरी तरह दूर रहते हैं।
लेकिन यह विश्वसनीयता मुफ्त नहीं होती। उदाहरण के लिए व्हाइट इंडस्ट्रीज मामले में क्या हुआ। एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी के खिलाफ एक सामान्य वाणिज्यिक मध्यस्थता मामला जीता। इसके प्रवर्तन को भारतीय अदालतों में नौ साल तक लटकाए रखा गया। एक अंतरराष्ट्रीय पंचाट ने माना कि यह देरी हमारी संधि प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन है और भारतीय राज्य को भुगतान करना पड़ा। इसे संधि की विफलता मानना आकर्षक लग सकता है। लेकिन वास्तव में मामला विपरीत था। पंचाट ने वही किया जिसके लिए संधि बनाई गई थी। उसने हमारी घरेलू संस्थाओं की विफलता पर कीमत लगाई। यह निर्णय एक विशेषता थी न कि त्रुटि। भारत सरकार की प्रतिक्रिया ऐसी थी मानो रेफरी पर ही हमला कर दें।
जब हम संधियों की ओर वापस जाते हैं तो हमें यह अधिक सोचना चाहिए कि यह वास्तव में कैसे काम करेगा। इसके लिए एक पहले से धन की व्यवस्था वाला सुरक्षित कोष होना उपयोगी होगा जिससे प्रतिकूल फैसलों का सम्मान किया जा सके। इससे सुनिश्चित होगा कि भुगतान तुरंत हो, ताकि निवेशकों को अपने धन की वसूली के लिए भारतीय संपत्तियों को विदेश में जब्त करने की धमकी न देनी पड़े। यह एक बॉन्ड की तरह काम करता है क्योंकि हर निकासी दिखाई देती है और उसे बजट से पुनः भरा जाना होता है। हर उल्लंघन तत्काल वित्तीय लागत बन जाता है जिसे संसद और प्रेस देख सकते हैं बजाय इसके कि मुकदमेबाजी की देनदारी एक दशक तक दबाकर बैठा जाए।
अवधारणा के स्तर पर हम सभी को समझना होगा कि द्विपक्षीय निवेश संधियों (बीआईटी) के कारण नियमित भुगतान का प्रवाह होगा जो उस बीमा प्रीमियम के समान है जिसकी आवश्यकता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के विशेषाधिकार को हासिल करने के लिए होती है।
यदि भारतीय राज्य आर्थिक सुधारों की एक श्रृंखला में संलग्न होता है तो यह बीमा लागत वास्तव में कम हो जाएगी। इसके लिए कराधान, अनुबंध प्रवर्तन और पहले से अनुमान लगाने योग्य विनियमन पर काम करना आवश्यक है। इनमें से कोई भी केवल वित्त मंत्रालय द्वारा नहीं किया जा सकता। संधि के वादे संघ सरकार के एक हिस्से द्वारा किए जाते हैं लेकिन वे पूरे भारतीय राज्य में वितरित होते हैं। यानी कर प्रशासन द्वारा, स्वतंत्र नियामकों द्वारा, राज्य सरकारों द्वारा जिनकी बिजली वितरण कंपनियां बिजली खरीद समझौते करती हैं। एक संधि संघ सरकार को बीमा प्रदाता की स्थिति में रखती है, जबकि वह अपनी सभी शक्तियों का उपयोग साथ-साथ आर्थिक सुधार प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए करती है।
यह बात हमें दूसरे प्रश्न तक लाती है। एक संधि को दो पक्षों को आश्वस्त करना होता है। पहले, प्रतिपक्षीय सरकार को और दूसरा उस देश के निजी निवेशकों को। सरकारें कई कारणों से संधियां करती हैं जिनमें कूटनीतिक कारण भी शामिल हैं। लेकिन पूंजी केवल हस्ताक्षरों की मोहताज नहीं होती एक अच्छी तरह से तैयार संधि भारत को पहले वर्ग से आगे ले जाती है। दूसरा वर्ग संधि का पाठ नहीं पढ़ता। वह पिछले रिकॉर्ड को पढ़ता है।
भारतीय राज्य का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। हमने कर कानून को पिछली तारीखों से लागू करते हुए संशोधित किया। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय को पलटने के लिए हम आधी सदी पीछे गए। हमने मामलों में हार के बाद 75 संधियों से कदम वापस खींचे। हमने स्थिर कर स्थितियों को उलट दिया। हमने शुल्कों को इस तरह बदला कि पहले से किए गए निवेश की अर्थव्यवस्था ही बदल गई। सभी निर्णय मिलकर एक पैटर्न बनाते हैं, और निवेशकों ने उस पैटर्न की कीमत तय कर दी है। विश्वसनीयता बनाए रखना सस्ता है लेकिन उसे फिर से बहाल करना महंगा।
अपने आप को निवेशक की जगह रखकर देखिए। कोई नई संधि प्रस्तावित है। जब अगला राजस्व संकट आएगा या अगला न्यायालय का निर्णय सरकार के खिलाफ जाएगा तो यह कितनी राहत देगी? निवेशक को याद है कि पूर्वव्यापी कर 2021 में तब निरस्त किया गया जब विदेश में प्रवर्तन कार्रवाइयों ने उसे अस्थिर बना दिया। दबाव में की गई वापसी उस वादे से कहीं कम संकेत देती है जो कभी टूटा ही न हो। निवेशक को यह भी याद है कि पिछली संधियां प्रतिकूल फैसलों का सामना नहीं कर पाईं। नई संधि को इस इतिहास के संदर्भ में पढ़ा जाएगा, उसके स्थान पर नहीं।
तो आखिर समीकरण को क्या बदलेगा? हमें एक वास्तविक बीआइटी पाठ चाहिए जो गहरी सुरक्षा का वादा करे न कि कंजूस पाठ ताकि परिष्कृत नीति क्षमताओं को प्रदर्शित किया जा सके। और हमें मुआवजा कोष को भी वित्तपोषित करना चाहिए। यह तंत्र बीमा भुगतान के स्थिर प्रवाह के साथ एक दशक तक बिना रुकावट के चलना चाहिए जो राष्ट्रवाद या आक्रोश से मुक्त हों। हम वर्षों तक बीआईटी के शब्दों से मेल खाते कार्यों के माध्यम से विश्वसनीयता बनाएंगे। निवेशकों का विश्वास धीरे-धीरे ही बढ़ेगा। भारतीय जोखिम प्रीमियम को सार्थक रूप से कम करने के लिए अच्छे व्यवहार वाले दशकों की आवश्यकता है।
(लेखक द्वय एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)