प्रतीकात्मक तस्वीर
नई राष्ट्रीय यूरिया नीति कृषि क्षेत्र से जुड़े इस महत्त्वपूर्ण कच्चे माल से जुड़ी समस्या का आंशिक समाधान प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है ताकि इसे वैश्विक आपूर्ति झटकों से बचाया जा सके। भारत अपनी वार्षिक 4 करोड़ टन यूरिया मांग का 25 फीसदी आयात करता है। पश्चिम एशिया युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के बाद जब तक चीन ने अपना अस्थायी निर्यात प्रतिबंध नहीं हटाया तब तक कीमतें 40 से 50 फीसदी तक बढ़ गईं। नीति का लक्ष्य 8 या 9 यूरिया संयंत्र स्थापित करना है जिनकी उत्पादन क्षमता 1 करोड़ टन होगी। यानी वर्तमान में आयात की जाने वाली मात्रा के समतुल्य।
इसके लिए प्रोत्साहन संरचना में बदलाव किए गए हैं। इनमें स्थिर और परिवर्तनीय लागतों को अलग करना, इक्विटी पर रिटर्न की गणना के लिए 12-16 फीसदी का बैंड लागू करना और विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करने के लिए मौजूदा विनिमय दर के आधार पर स्थिर लागतों को चार साल बाद रुपये में बदलना शामिल है। आत्मनिर्भरता का उद्देश्य निस्संदेह एक तात्कालिक समस्या का समाधान करता है क्योंकि निकट भविष्य में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की अनिश्चितताएं बनी रहेंगी। लेकिन जब भारत की उर्वरक नीति की गहरी संरचनात्मक समस्याओं के संदर्भ में देखा जाए तो यह अपर्याप्त प्रतीत होता है।
मूल समस्या भारत की उर्वरक सब्सिडी संरचना में है जो अमोनिया-आधारित यूरिया (एन) को फॉस्फेट आधारित (पी) और पोटैशियम आधारित (के) पोषक तत्वों पर प्राथमिकता देती है। जहां बाद के दोनों पोषक तत्वों पर सब्सिडी पोषक तत्व सामग्री के आधार पर दी जाती है वहीं यूरिया पर सपाट दर से सब्सिडी दी जाती है। वर्तमान में किसान 45 किलो का यूरिया बैग 242 रुपये में खरीदता है जबकि सरकार को इसकी लागत 2,200 रुपये से 4,000 रुपये तक आती है।
यह इस पर निर्भर करता है कि यूरिया घरेलू रूप से निर्मित है या आयातित। आश्चर्य नहीं कि वर्षों में यूरिया सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला उर्वरक बन गया है जिससे वार्षिक सब्सिडी अस्थिर स्तर तक पहुंच गई है। आमतौर पर यूरिया ही उर्वरक सब्सिडी का सबसे बड़ा हिस्सा होता है जिसके लिए चालू वित्त वर्ष में 1.71 लाख करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के बाद वैश्विक कीमतों में तेजी से वृद्धि होने के कारण यह आंकड़ा काफी अधिक होने की संभावना है।
अधिक घरेलू संयंत्र स्थापित करना आयात पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है, लेकिन अन्य समस्याओं पर भी विचार करना आवश्यक है। पहला, सरकार का अनुमान है कि यूरिया की मांग हर साल 5 फीसदी बढ़ रही है। एक यूरिया संयंत्र बनाने में लगभग दो साल लगते हैं। मान लें कि सभी नए संयंत्र समय पर बनकर 1 करोड़ टन उत्पादन शुरू कर दें यानी वर्तमान घरेलू कमी के बराबर, तब भी भारत मांग के ग्राफ से पीछे ही रहेगा। यह स्थिति 2012 की पहली यूरिया नीति में भी स्पष्ट थी जिसके तहत छह नई इकाइयां स्थापित की गईं लेकिन आयात जारी रहा।
दूसरा, यूरिया संयंत्र में विदेशी मुद्रा जोखिम परिवर्तनीय लागतों से आता है, विशेष रूप से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) से, जो फीडस्टॉक और ऊर्जा स्रोत दोनों है और उत्पादन लागत का 60 से 80 फीसदी हिस्सा बनाती है। भारत अपनी एलएनजी आवश्यकताओं का लगभग आधा आयात करता है जिनमें से अधिकांश पश्चिम एशिया से आता है जहां आपूर्ति बाधित होने पर कीमतें दोगुनी से अधिक हो गईं। यह जोखिम वर्तमान और भविष्य के यूरिया संयंत्रों के लिए बना हुआ है।
राष्ट्रीय नीति उस मूल्य निर्धारण विसंगति को नजरअंदाज करती है जिसके कारण यूरिया का अत्यधिक उपयोग हुआ है। जिससे गंभीर मृदा क्षरण और उत्पादकता में गिरावट आई है। एन: पी: के का अनुपात 4:2:1 रखने की सलाह दी जाती है, लेकिन भारत का अनुपात 9.8:3:1 है। स्पष्ट समाधान यूरिया की कीमतें बढ़ाना है। लेकिन यह राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य साबित हुआ है और लाखों छोटे किसानों को नुकसान पहुंचा सकता है।
एक समाधान यह हो सकता है कि वर्तमान प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) मॉडल, जो निर्माताओं को प्रतिपूर्ति करता है, किसानों तक पहुंचाया जाए। किसानों को पहले बाजार मूल्य चुकाना पड़े और फिर सब्सिडी की राशि उनके बैंक खातों में आए। इससे यूरिया के अत्यधिक (और गलत) उपयोग पर प्रभावी रोक लग सकती है जिसकी कीमत फिलहाल करदाता चुका रहा है।