प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
मार्च का महीना आते ही कई लोगों को अचानक याद आता है कि फाइनेंशियल ईयर खत्म होने वाला है और टैक्स से जुड़ी कई बातें अभी तय करनी बाकी हैं। अक्सर इस समय लोग जल्दबाजी में कहीं भी पैसे लगाने लगते हैं, सिर्फ इसलिए कि टैक्स बच जाए।
लेकिन, फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि असली समझदारी आखिरी वक्त में भागदौड़ करने में नहीं, बल्कि अपने पूरे आर्थिक स्थिति को शांति से समझने में है। इस दौरान ये देखना जरूरी होता है कि आपकी आय कितनी है, कौन-कौन सी कटौतियां मिल सकती हैं और किस टैक्स रिजीम में आपको फायदा मिलता है। कई बार सही रिजीम चुनने, डिडक्शन्स का पूरा इस्तेमाल करने और इन्वेस्टमेंट्स के टाइमिंग पर ध्यान देने से टैक्स का बोझ काफी कम हो सकता है।
इतना ही नहीं, बोनस, कैपिटल गेन्स और रिकॉर्ड्स की सही जांच भी बड़ी बचत करा सकती है। यानी मार्च सिर्फ टैक्स भरने का महीना नहीं, बल्कि समझदारी से प्लानिंग करके अपने पैसों को बेहतर तरीके से संभालने का मौका भी है।
टैक्स और इनवेस्टमेंट एक्सपर्ट बलवंत जैन कहते हैं कि टैक्स बचाने का सबसे पहला कदम है ये देखना कि ओल्ड टैक्स सिस्टम आपके लिए बेहतर है या न्यू। न्यू रिजीम काफी आसान लगता है। इसमें टैक्स स्लैब रेट्स कम हैं, स्टैंडर्ड डिडक्शन ज्यादा है और स्ट्रक्चर सिंपल है। लेकिन इसमें ज्यादातर कटौतियां और छूट नहीं मिलतीं। अगर आपके पास ज्यादा डिडक्शन्स नहीं हैं, तो ये आपके लिए सही रह सकता है। लेकिन अगर आपका फाइनेंस अच्छे से सेटअप है, जैसे होम लोन, इंश्योरेंस प्रीमियम, रिटायरमेंट में योगदान, बच्चों की स्कूल फीस या हेल्थ कवर, तो ओल्ड रिजीम ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है।
जैन कहते हैं कि लोग अक्सर न्यू रिजीम को चुन लेते हैं क्योंकि ये आसान लगता है, लेकिन ये हमेशा सस्ता नहीं होता। वो सलाह देते हैं कि दोनों रिजीम्स के तहत अपना टैक्स कैलकुलेट करके कंपेयर करें। इससे पता चलेगा कि कौन सा विकल्प आपके लिए बेहतर होगा और ज्यादा बचत होगी। कई बार ओल्ड ओल्ड सिस्टम में मिलने वाली छूट इतनी ज्यादा होती हैं कि टैक्स बिल काफी कम हो जाता है। तो जल्दबाजी न करें, कैलकुलेटर निकालें और हिसाब लगाएं।
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जैन के मुताबिक, ओल्ड टैक्स रिजीम में कई ऐसी कटौतियां मिलती हैं जो आपकी टैक्स देने वाली इनकम को काफी कम कर सकती हैं। इनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला सेक्शन 80C है। इसके तहत आप पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF), इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम्स (ELSS), लाइफ इंश्योरेंस, EPF कॉन्ट्रिब्यूशन और होम लोन के प्रिंसिपल रीपेमेंट जैसी चीजों में निवेश करके 1.5 लाख रुपये तक की छूट ले सकते हैं। इसके अलावा सेक्शन 80CCD(1B) के तहत नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में निवेश करने पर 50 हजार रुपये तक की अतिरिक्त कटौती मिलती है, जिसमें रिटायरमेंट के लिए भी पैसा जमा होता है और टैक्स भी कम होता है।
हेल्थ से जुड़े खर्चों पर भी टैक्स में राहत मिलती है। सेक्शन 80D के तहत आप अपने और माता-पिता के लिए दिए गए हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर कटौती ले सकते हैं। वहीं अगर आपने घर के लिए लोन लिया है, तो सेक्शन 24(b) के तहत सेल्फ-ऑक्यूपाइड घर के होम लोन के ब्याज पर 2 लाख रुपये तक का डिडक्शन मिल सकता है।
टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि आखिरी समय में जल्दबाजी करने के बजाय पहले से टैक्स प्लानिंग करना ज्यादा समझदारी है, क्योंकि ये कटौतियां सिर्फ टैक्स ही नहीं बचातीं बल्कि आपकी फाइनेंशियल सिक्योरिटी भी मजबूत करती हैं।
Moneyfront के को-फाउंडर और CEO मोहित गांग कहते हैं कि इन्वेस्टमेंट से होने वाले मुनाफे पर टैक्स कम करने के लिए खरीद-फरोख्त का सही समय चुनना बहुत जरूरी होता है। अगर आप किसी निवेश को थोड़ा ज्यादा समय तक होल्ड करते हैं, तो वह शॉर्ट-टर्म की बजाय लॉन्ग-टर्म में आ सकता है और उस पर कम टैक्स देना पड़ता है।
इसके अलावा टैक्स लॉस हार्वेस्टिंग भी एक तरीका है। इसमें जिन निवेशों में नुकसान हो रहा होता है, उन्हें बेचकर उस नुकसान को मुनाफे के साथ एडजस्ट किया जाता है, जिससे कुल टैक्स का बोझ कम हो सकता है।
मोहित गांग कहते हैं कि ज्यादातर लोग बाजार के उतार-चढ़ाव पर तो नजर रखते हैं, लेकिन टैक्स से जुड़ी टाइमिंग पर उतना ध्यान नहीं देते। उनके मुताबिक निवेशकों को समय-समय पर अपना कैपिटल गेन स्टेटमेंट जरूर देखना चाहिए।
उन्हें यह पहचानना चाहिए कि किन निवेशों में नुकसान हो रहा है और 31 मार्च से पहले उस नुकसान को मुनाफे के साथ एडजस्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा करने से कुल टैक्स का बोझ काफी कम किया जा सकता है। यह तरीका खास तौर पर उन लोगों के लिए फायदेमंद होता है, जो स्टॉक मार्केट या म्यूचुअल फंड्स में निवेश करते हैं।
जैन के मुताबिक, साल के आखिर में मिलने वाला बोनस कई बार आपकी इनकम को सीधे हाई टैक्स स्लैब में पहुंचा देता है। ऐसे में बेहतर है कि आप अपनी पेंडिंग डिडक्शन्स की जांच कर लें, NPS में पैसा बढ़ाने पर विचार करें या होम लोन से जुड़े जरूरी डॉक्यूमेंट्स ठीक से अपडेट कर लें। इससे टैक्स की कुल लायबिलिटी कम करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह अगर आप बड़े गिफ्ट या किसी एसेट का ट्रांसफर कर रहे हैं, तो उसका सही डॉक्यूमेंटेशन होना जरूरी है, नहीं तो आगे चलकर वह टैक्सेबल इनकम बन सकता है।
इसके साथ ही एक जरूरी कदम है फॉर्म 26AS और एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) को ध्यान से देखना। इसमें TDS का मिसमैच, अनक्रेडिटेड ट्रांजैक्शन्स या पेंडिंग एडवांस टैक्स जैसी चीजें चेक करनी चाहिए। अगर इनमें गड़बड़ी रह गई, तो सेक्शन 234B और 234C के तहत ब्याज देना पड़ सकता है। इसलिए 31 मार्च से पहले इन रिकॉर्ड्स का मिलान कर लेना टैक्स प्लानिंग को आसान बना देता है।
एक्सपर्ट के मुताबिक, मार्च के आखिर में शॉर्ट-टर्म डेब्ट मार्केट में निवेश के अच्छे मौके बन सकते हैं। फाइनेंशियल ईयर खत्म होने के समय बाजार में लिक्विडिटी थोड़ी कम हो जाती है, क्योंकि कई कॉरपोरेट कंपनियां टैक्स और डिविडेंड देने के लिए पैसा निकालती हैं।
ऐसी स्थिति में सर्टिफिकेट्स ऑफ डिपॉजिट (CD) और कमर्शियल पेपर्स (CP) जैसे शॉर्ट-टर्म इंस्ट्रूमेंट्स पर मिलने वाली यील्ड बढ़ जाती है।
CNBC-TV18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 से 2025 के ट्रेंड्स बताते हैं कि इस दौरान कई बार निवेशकों को सामान्य से ज्यादा यील्ड मिली है। इसलिए मनी मार्केट में निवेश करने वालों के लिए यह एक तरह का टैक्टिकल फायदा बन सकता है। इस वजह से अगर कोई निवेशक कम समय के लिए पैसा लगाना चाहता है, तो मार्च के आखिर का समय उसके लिए फायदेमंद हो सकता है।