युवा ग्राहकों के बीच बैंक जमा (FDs) की तुलना में म्युचुअल फंड (MFs) की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कई निजी बैंक अब म्युचुअल फंड के बदले लोन (Loan Against Mutual Funds – LAMF) कारोबार में उतर रहे हैं। हालिया मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण भारत के प्राइवेट सेक्टर के बैंक जैसे करूर वैश्य बैंक (Karur Vysya Bank) और सीएसबी बैंक (CSB Bank) जल्द ही इस सेगमेंट में एंट्री करने की योजना बना रहे हैं। साउथ इंडियन बैंक (South Indian Bank) ने मार्च में यह सुविधा शुरू की थी, जबकि केनरा बैंक (Canara Bank) जिसने पिछले साल इसे शुरू किया था, अब अपने कारोबार का विस्तार करने की तैयारी में है।
निवेशकों के लिए यह प्रोडक्ट म्युचुअल फंड यूनिट्स को भुनाए बिना तुरंत नकदी (लिक्विडिटी) उपलब्ध कराने का माध्यम बन सकता है। हालांकि, इस सुविधा का उपयोग करने से पहले उधारकर्ताओं को इसकी लागत, मार्जिन से जुड़े जोखिम और पुनर्भुगतान (रिपेमेंट) दायित्वों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
डिजिटल LAMF प्रोडक्ट के लिए कम से कम लोन राशि आमतौर पर 25,000 रुपये होती है। DhanLAP के फाउंडर और सीईओ सी. आर. चंद्रशेखर के अनुसार, बैंक इक्विटी फंड्स के बदले अधिकतम 1 करोड़ रुपये और डेट फंड्स के बदले 5 करोड़ रुपये तक का लोन दे सकते हैं। वहीं, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFCs) इक्विटी फंड्स पर 2 करोड़ रुपये तक और डेट फंड्स पर 5 करोड़ रुपये तक का लोन उपलब्ध करा सकती हैं।
ब्याज दरें उधारकर्ता की प्रोफाइल, लेंडर की पॉलिसी और संबंधित पोर्टफोलियो पर निर्भर करती हैं। बैंकबाजार के सीईओ आदिल शेट्टी कहते हैं, “ब्याज दरें आमतौर पर सालाना 9-10 फीसदी से शुरू होती हैं और 15 फीसदी से ज्यादा भी जा सकती हैं।
चंद्रशेखर के अनुसार, लोन की अवधि (टेन्योर) तीन महीने से लेकर तीन सात तक हो सकती है और इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। प्रोसेसिंग चार्ज आमतौर पर कम होता है, जो मंजूर की गई लोन रकम का 0.5 फीसदी से 2 फीसदी तक हो सकता है। कुछ डिजिटल LAMF प्रोडक्ट्स में प्रोसेसिंग चार्ज नहीं भी लिया जाता।
लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो नियामकीय दायरे में तय होता है। मिरे असेट फाइनेंशियल सर्विसेज (इंडिया) के सीईओ कृष्णा कन्हैया कहते हैं, “लेंडर (ऋणदाता) आमतौर पर इक्विटी म्युचुअल फंड्स की वैल्यू का 50 फीसदी तक और डेट म्युचुअल फंड्स की वैल्यू का 80 फीसदी तक लोन दे सकते हैं।”
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उधारकर्ता समान मासिक किस्तों (EMIs) के जरिए भुगतान कर सकते हैं। वे ओवरड्राफ्ट सुविधा का भी उपयोग कर सकते हैं, जो रिवॉल्विंग क्रेडिट स्ट्रक्चर की तरह काम करती है। इस स्थिति में लेंडर केवल उपयोग की गई राशि पर ही ब्याज वसूलता है।
शेट्टी का कहना है कि चूंकि यह लोन मौजूदा निवेशों के बदले सुरक्षित होता है, इसलिए लेंडर आमतौर पर अनसिक्योर्ड लोन की तुलना में इसे ज्यादा तेजी से प्रोसेस और डिस्ट्रीब्यूट करते हैं।
कम उतार-चढ़ाव वाले फंड गिरवी रखना बेहतर
लेंडर आमतौर पर ऐसे फंड्स के बदले लोन देना पसंद करते हैं जिनमें उतार-चढ़ाव कम हो। शेट्टी के अनुसार, अपेक्षाकृत स्थिर फंड के बदले लोन लेने से बाजार में तेज उतार-चढ़ाव के दौरान मार्जिन कॉल या अतिरिक्त कोलेटरल की मांग की संभावना कम हो जाती है।
चन्द्रशेखर का कहना है कि डेट फंड्स इस सुविधा के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते हैं, क्योंकि इनमें उतार-चढ़ाव कम होता है और इनके बदले लेंडर ज्यादा LTV (लोन-टू-वैल्यू) रेश्यो देते हैं। इसके बाद हाइब्रिड फंड्स और फिर इक्विटी फंड्स का नंबर आता है। डायवर्सिफाइड इक्विटी स्कीम्स में लार्ज-कैप इक्विटी म्युचुअल फंड अपेक्षाकृत ज्यादा स्थिर और तरल (लिक्विड) होने के कारण ज्यादा बेहतर माने जाते हैं।
उधारकर्ताओं को स्मॉलकैप, सेक्टोरल, थीमैटिक और कमोडिटी फंड्स को गिरवी रखने से बचना चाहिए, क्योंकि इनमें उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है और इनके लिए LTV रेश्यो भी कम मिलता है। फिनप्रो वेल्थ के चीफ फाइनेंशियल प्लानर और फाउंडर हर्ष वीरा कहते हैं, “इनके नेट एसेट वैल्यू (NAV) में तेज बदलाव मार्जिन की अतिरिक्त मांग को ट्रिगर कर सकते हैं।”
लेंडर क्लोज्ड-एंडेड फंड्स और सीमित लिक्विडिटी वाले अन्य फंड्स के बदले लोन देने से भी बचते हैं।
LAMF एक कम लागत वाला सिक्योर्ड लोन है, जो निवेशकों को अपनी मौजूदा एसेट्स का उपयोग करके धन जुटाने की सुविधा देता है। शेट्टी के अनुसार, “यह प्रोडक्ट उन निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है जिन्हें अस्थायी रूप से नकदी की जरूरत हो, लेकिन जो बाजार में अपना निवेश जारी रखना चाहते हों।” आमतौर पर ये लोन लंबी अवधि के बजाय शॉर्ट से मिड टर्म की नकदी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते हैं।
लोग अक्सर इस तरह के लोन का इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड का महंगा कर्ज चुकाने, बच्चों की पढ़ाई की फीस भरने, घर खरीदने के लिए शुरुआती रकम जुटाने, छुट्टियों के खर्च पूरे करने या अचानक आए मेडिकल खर्चों को संभालने के लिए करते हैं। इसके अलावा, जब कुछ समय के लिए पैसों की कमी हो जाए, तब भी यह लोन मददगार साबित हो सकता है। कई लोग इसका उपयोग टैक्स भरने, कारोबार के रोजमर्रा के खर्च चलाने या थोड़े समय के लिए पैसों की जरूरत पूरी करने में भी करते हैं।
वीरा का कहना है कि कुछ निवेशक ज्यादा रिटर्न वाले प्रोडक्ट्स में निवेश करने के लिए भी LAMF का सहारा लेते हैं। हालांकि यह रणनीति जोखिम भरी हो सकती है।
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LAMF निवेशकों को निवेश बनाए रखते हुए तुरंत नकदी उपलब्ध कराने की सुविधा देता है। चन्द्रशेखर के अनुसार, इससे अल्पकालिक या मध्यम अवधि की वित्तीय जरूरतें लंबी अवधि में संपत्ति बनाने की योजना में रुकावट नहीं डालतीं।
निवेशक म्युचुअल फंड यूनिट्स को भुनाने (रिडेम्पशन) से जुड़े टैक्स प्रभावों से भी बच सकते हैं। एक और फायदा यह है कि लोन अवधि के दौरान गिरवी रखी गई यूनिट्स की कीमत बढ़ने पर निवेशक को उसका लाभ मिलता रहता है।
इस पर ब्याज दरें आमतौर पर बिना गारंटी वाले पर्सनल लोन की तुलना में कम होती हैं। इसके अलावा, प्रीपेमेंट चार्ज नहीं लगना, ओवरड्राफ्ट सुविधा मिलना (जिसमें केवल इस्तेमाल की गई राशि पर ब्याज देना होता है), कई वर्षों तक नवीनीकरण की सुविधा और लोन अवधि के दौरान गिरवी रखे गए फंड्स को बदलने का लचीलापन भी इसके प्रमुख फायदे हैं।
अब कई लेंडर लगभग पूरी तरह डिजिटल प्रोसेस के जरिए यह सुविधा दे रहे हैं, जिससे लोन की मंजूरी और राशि जारी होने की प्रक्रिया तेज हो गई है। साथ ही, दस्तावेजों की जरूरत भी सीमित रहती है।
बाजार में तेज उतार-चढ़ाव आने पर गिरवी रखी गई म्युचुअल फंड यूनिट्स की वैल्यू घट सकती है, जिससे वह तय LTV (लोन-टू-वैल्यू) स्तर से नीचे चली जाती है। खासतौर पर इक्विटी ओरिएंटेड म्युचुअल फंड्स में यह जोखिम ज्यादा रहता है।
चन्द्रशेखर कहते हैं, “अगर गिरवी रखी गई एसेट की कीमत घटती है तो उधारकर्ता को अंतर की रकम जमा करनी पड़ सकती है या फिर अतिरिक्त म्युचुअल फंड यूनिट्स गिरवी रखनी पड़ सकती हैं।
कन्हैया का कहना है कि यदि LTV सीमा 50 फीसदी से ज्यादा टूट जाती है, तो उधारकर्ता को खाता नियमित करने के लिए केवल सात दिन तक का समय मिल सकता है। ज्यादा बड़े LTV उल्लंघन की स्थिति में यह समयसीमा और भी कम हो सकती है।
अगर उधारकर्ता एसेट की कीमत में आई गिरावट की भरपाई नहीं कर पाता या मासिक भुगतान करने में असफल रहता है, तो लेंडर म्युचुअल फंड यूनिट्स बेच सकता है। आनंद राठी वेल्थ के ज्वाइंट सीईओ फिरोज अजीज के मुताबिक, “बाजार में गिरावट के दौरान जबरन यूनिट्स बेचे जाने से नुकसान पक्का हो जाता है और निवेशक की लंबी अवधि की निवेश रणनीति भी प्रभावित होती है।”
लोन लें या म्युचुअल फंड भुनाएं?
अगर पैसों की जरूरत थोड़े समय के लिए है, तो म्युचुअल फंड के बदले लोन लेना बेहतर विकल्प हो सकता है। कन्हैया के अनुसार, “ऐसे मामलों में म्युचुअल फंड यूनिट्स बेचने से कंपाउंडिंग का फायदा टूट सकता है, कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ सकता है, एग्जिट लोड लग सकता है और निवेशक बाजार में संभावित रिकवरी का लाभ भी गंवा सकता है।
अजीज का कहना है कि जब मार्केट वैल्यूएशन संतुलित हो और जरूरत से ज्यादा तेजी (फ्रॉथ) न हो, तब लोन लेकर निवेश बनाए रखना अपेक्षाकृत ज्यादा आकर्षक विकल्प हो सकता है।
हालांकि, अगर पैसों की जरूरत लंबी अवधि के लिए हो या जिस लक्ष्य के लिए निवेश किया गया था वह पूरा हो चुका हो, तो म्युचुअल फंड भुनाना ज्यादा सही विकल्प हो सकता है। इसी तरह, यदि निवेश अल्पकालिक लक्ष्य के लिए किया गया था या केवल कुछ समय के लिए पैसा पार्क किया गया था, तब भी रिडेम्पशन बेहतर माना जा सकता है।
कन्हैया के मुताबिक, “अगर भविष्य में लोन चुकाने को लेकर अनिश्चितता हो, निवेशक पहले से वित्तीय दबाव में हो या निवेश अब उसके वित्तीय लक्ष्यों से मेल नहीं खाता हो, तब भी यूनिट्स भुनाना बेहतर हो सकता है।”
लोन लेने से पहले निवेशकों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि संभावित रिटर्न, लोन की लागत से पर्याप्त ज्यादा हो और निवेश से अपेक्षित परिणाम मिलने की संभावना मजबूत हो।
अगर निवेशक ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी या मार्जिन कॉल के जोखिम को लेकर सहज नहीं है, तो ऐसे में भी म्युचुअल फंड भुनाना बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
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उधारकर्ताओं को अपनी पूरी पात्र लोन सीमा का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। खासकर इक्विटी ओरिएंटेड फंड्स के बदले लोन लेते समय कुछ अतिरिक्त मार्जिन बनाए रखना जरूरी है, ताकि बाजार में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव की स्थिति को आसानी से संभाला जा सके।
निवेशकों को पहले अपने मौजूदा कर्ज और EMI दायित्वों का आकलन करना चाहिए। अजीज के अनुसार, अगर LAMF लेने के बाद कुल EMI बोझ मासिक आय के लगभग 50 फीसदी से ज्यादा हो जाता है, तो इतना कर्ज लेना वित्तीय रूप से समझदारी नहीं माना जाएगा।
वीरा ने चेतावनी दी है कि इस तरह के लोन का इस्तेमाल सट्टेबाजी वाले निवेश या गैर-जरूरी खर्चों के लिए नहीं करना चाहिए, क्योंकि कर्ज वित्तीय दबाव को और बढ़ा सकता है।
अजीज का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति लग्जरी खर्चों के लिए यह लोन ले रहा है, तो उसे अपनी पूरी लोन क्षमता इस्तेमाल करने के बजाय केवल 20-25 फीसदी तक ही सीमित रखना चाहिए।
उधारकर्ताओं को छोटी बकाया रकम को भी नजरअंदाज करने या भुगतान टालने से बचना चाहिए। कन्हैया के मुताबिक, “सभी बकाया राशि की जानकारी क्रेडिट ब्यूरो को भेजी जाती है और अब कई मामलों में इसकी रिपोर्टिंग साप्ताहिक आधार पर भी तेजी से होने लगी है।”
ग्राहकों को नियमित रूप से अपने लोन उपयोग, ब्याज भुगतान और पुनर्भुगतान दायित्वों पर नजर बनाए रखनी चाहिए।