बेतहाशा गर्मी, कमजोर फसल और कीड़ों के प्रकोप के चलते आम इस बार खास लोगों की ही पहुंच में रहेगा। उत्तर प्रदेश के फल पट्टी क्षेत्र काकोरी-मलिहाबाद में दो सालों के बाद आम की फसल कमजोर दिखाई दे रही है। बेतहाशा पड़ रही गर्मी के चलते आम का साइज छोटा हुआ है और बहुत से बागों में कटर कीट के प्रभाव के चलते फसल कमजोर हुई है।
बागवानों का कहना है कि दो लगातार अच्छे सीजन के बाद आमतौर पर तीसरे साल फसल कमजोर हो जाती है लिहाजा इस बार आम उस तरह नहीं आए हैं। मार्च की बारिश और फिर अप्रैल की शुरूआत से पड़ रही तेज गर्मी के चलते आमों का आकार छोटा हुआ है जबकि फसल और भी कम हो गई है। खाड़ी संकट, माल पर बीमे के प्रीमियम बढ़ने और क्वालिटी में कमजोरी के चलते इस बार आम के कारोबारियों को विदेशी बाजार से बहुत आस नहीं है। वहीं उनका कहना है कि बीते साल के मुकाबले आम कम होने के चलते घरेलू मंडियों में रेट भी बढ़ कर खुलेगा। बीते साल जहां खुदरा बाजारों में दशहरी 30-40 रुपये किलो बिका था वहीं इस बार यह 50-60 रुपये किलो तक बिक सकता है।
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आम कारोबारी और मलिहाबाद में नफीस नर्सरी के संचालक शबीहुल हसन बताते हैं कि वैसे तो दशहरी की तोड़ाई मई के दूसरे हफ्ते से ही शुरू हो गई पर अभी उनमें रंग व रस नहीं है। सोमवार से नौतपा शुरू होने के बाद पड़ने वाली प्रचंड गर्मी में दशहरी पूरी तरह से पक जाएगा जिसकी तोड़ाई जून की शुरुआत से होगी। उनका कहना है कि पिछले साल तो काकोरी-महिलाबाद से दशहरी, सफेदा व चौसा आम दुबई, यूरोप, दक्षिण एशियाई देशों से लेकर अमेरिका व न्यूजीलैंड तक भेजा गया था पर इस बार ज्यादातर माल की खपत घरेलू बाजारों में ही की जाएगी। बीते साल मलिहाबाद क्षेत्र से ही 500 टन के लगभग आम का निर्यात हुआ था।
शबीहुल बताते हैं कि आम का रिवाज है कि एक दो साल अच्छी फसल के बाद अगला साल कमजोर हो जाता है। वही इस बार हुआ है जब पेड़ों में आम कम आए हैं। इसके बाजवूद आमों के बड़े होने पर बागवानों ने उन्हें पेपर बैग्स से ढका है जिसके चलते रंग और आकार ठीक हो गया है। आम के आढ़ती फौजान अहमद का कहना है कि पेपर बैग से कवर किए गए आम तो बाजार में अच्छी कीमत पर बिक जाएंगे। उनके दाम 80 रुपये किलो तक मिल सकते हैं। उनका कहना है कि एक बार बारिश शुरू हो जाने के बाद 25 जून से दशहरी डाल से खुद ब खुद टपकने लगेगा जो स्वाद में उम्दा होगा और कीमत अच्छी मिलेगी।
मलिहाबाद फल मंडी के बड़े आढ़ती इकरामुल्लाह का कहना है कि इस बार आम की साइज थोड़ा छोटी है और रंग भी अच्छा नहीं दिख रहा है। खाड़ी मे हालात ठीक नहीं और निर्यात के लिए जाने वाले माल पर बीमे का प्रीमियम बढ़ा है। इसके चलते ज्यादातर माल केवल घरेलू बाजारों में खपाया जाएगा।
उद्यान विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार बौर निकलने के समय फरवरी मार्च में बारिश हुई जबकि फ्लावरिंग के पीक पर होने के समय कोहरा पड़ रहा था। इन सब कारणों से फसल करीब 50 फीसदी कम हो गई है। हालांकि उनका कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मौसम ठीक रहा था और वहां आम अच्छे आए हैं।
गौरतलब है कि बीते साल यूपी में करीब 58 लाख टन आम हुआ था जिसका 30 फीसदी अकेले काकोरी-महिलाबाद के फल पट्टी क्षेत्र में था।