म्युचुअल फंड

क्या Small Cap Funds पर फिर दांव लगाने का समय आ गया? वैल्यूएशन, कमाई और फंडामेंटल्स दे रहे संकेत

स्मॉलकैप फंड्स ने 2020 से 2024 के बीच तेजी से बढ़त दर्ज की थी, लेकिन अक्टूबर 2024 से यह अंडरपरफॉर्म करने लगे। यह स्थिति 2026 की पहली छमाही तक बनी रही

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हिमाली पटेल   
Last Updated- June 03, 2026 | 4:15 PM IST

स्मॉलकैप फंड्स में निवेश के लिए मौजूदा समय अनुकूल हो सकता है। सुधरते फंडामेंटल्स, सामान्य होती वैल्यूएशन और आय में संभावित रिकवरी इस सेगमेंट के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। साथ ही, रिकवरी के दौर में स्मॉलकैप्स के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन का इतिहास भी निवेशकों के लिए अवसर पैदा कर सकता है। यह बात बजाज फिनसर्व एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) की हालिया रिपोर्ट में कही गई है।

स्मॉलकैप फंड्स ने 2020 से 2024 के बीच तेजी से बढ़त दर्ज की थी, लेकिन अक्टूबर 2024 से यह अंडरपरफॉर्म करने लगे। यह स्थिति 2026 की पहली छमाही तक बनी रही। हालांकि, इस कैटेगरी ने पिछले तीन महीनों में 6.3 फीसदी की बढ़त दर्ज की है।

वैल्यूएशन में आया सुधार

2024 के अपने पीक से स्मॉलकैप शेयरों के वैल्यूएशन में उल्लेखनीय नरमी आई है और अब कई हिस्सों में यह ज्यादा उचित (reasonable) स्तर पर दिखाई दे रहे हैं।
एडलवाइस म्युचुअल फंड के इक्विटी हेड, प्रेसिडेंट और CIO त्रिदीप भट्टाचार्य कहते हैं, “स्मॉलकैप वैल्यूएशन लगभग 21 गुना वन-ईयर फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो पर हैं, जो लंबी अवधि के ऐतिहासिक औसत के करीब है।”

हालांकि कुछ सेगमेंट अभी भी प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। सेंट्रिसिटी वेल्थटेक के प्रोडक्ट हेड और फाउंडिंग टीम के सदस्य विनायक मगोत्रा का कहना है कि मौजूदा वैल्यूएशन FY25-26 की उच्च किश्तों में अनुमानित आय वृद्धि से समर्थित हैं, लेकिन सुरक्षा का मार्जिन सीमित है और निवेश करते समय अनुशासन जरूरी है। उनके अनुसार, हालिया गिरावट के बाद स्मॉलकैप अब अधिकतम फेयर वैल्यू पर लौटे हैं, न कि डीप-वैल्यू क्षेत्र में।

द वेल्थ कंपनी म्युचुअल फंड की CIO (इक्विटी) अपर्णा शंकर का कहना है कि वैल्यूएशन में बड़ा अंतर अभी भी बना हुआ है, जिससे स्टॉक सलेक्शन और एक्टिव मैनजमेंट बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

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कमाई में सुधार सबसे अहम फैक्टर

स्मॉलकैप के लिए कमाई में वृद्धि (earnings growth) में सुधार को सबसे महत्वपूर्ण ट्रिगर माना जा रहा है। बजाज फिनसर्व AMC के हेड ऑफ इक्विटीज सोरभ गुप्ता का कहना है कि घरेलू मांग मजबूत होने और कई सेक्टर्स में ऑपरेटिंग लीवरेज के प्रभाव दिखने से कंपनियों की आय में सुधार की उम्मीद है।

ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि जब आय ठहराव (stagnation) या गिरावट (contraction) के दौर से गुजरती है, तो उसके बाद अक्सर तेजी से सुधार देखने को मिलता है। भट्टाचार्य का कहना है कि शुरुआती संकेत यह बता रहे हैं कि ऐसा ही रिकवरी चरण बनता हुआ दिख रहा है।

शंकर भी मानती हैं कि घरेलू मांग में सुधार और उद्योगों में बढ़ता क्षमता उपयोग (capacity utilisation) स्मॉलकैप कंपनियों की आय वृद्धि को समर्थन दे सकता है।

फंडामेंटल्स से मिल रहा सहारा

स्मॉलकैप सेगमेंट के बुनियादी संकेतक (fundamentals) मजबूत बने हुए हैं। गुप्ता का कहना है कि कई स्मॉलकैप कंपनियों की बैलेंस शीट मजबूत है और वे पिछले चक्रों की तुलना में बेहतर फंडामेंटल्स के साथ इस चरण में प्रवेश कर रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में स्मॉलकैप यूनिवर्स में बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिला है। कंपनियां अब विस्तार के लिए लोन पर निर्भर रहने के बजाय इंटरनल कैश फ्लो से फंडिंग कर रही हैं, जिससे उनकी बैलेंस शीट ज्यादा स्वस्थ और लाभप्रदता बेहतर हुई है।

गुप्ता का कहना है कि कई छोटी कंपनियां कैपिटल एक्सपेंडिचर (capex) आधारित गतिविधियों से लाभ उठाने की अच्छी स्थिति में हैं, खासकर पावर और कैपिटल गुड्स वैल्यू चेन में उनकी मौजूदगी के कारण।

शंकर का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस, इंडस्ट्रियल्स और घरेलू खपत से जुड़े स्मॉलकैप बिजनेस अब भी मजबूत स्ट्रक्चरल फैक्टर्स से फायदा उठा रहे हैं। हालांकि, प्रदर्शन आगे चलकर चुनिंदा (selective) रहने की संभावना है। गुप्ता के अनुसार, मौजूदा माहौल में निवेशकों को उन कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए जिनकी आय क्षमता मजबूत हो, बैलेंस शीट स्वस्थ हो और कॉरपोरेट गवर्नेंस मानक बेहतर हों।

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काफी जोखिम मौजूद

अगर आय (earnings) में अपेक्षित सुधार नहीं होता है, तो स्मॉलकैप सेगमेंट की री-रेटिंग टल सकती है। भट्टाचार्य का कहना है कि यदि रेवेन्यू ग्रोथ और कमाई में सुधार उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तो स्मॉलकैप वैल्यूएशन पर और दबाव पड़ सकता है और कई स्तरों पर डीरिटिंग (de-rating) देखने को मिल सकती है।

वैश्विक अनिश्चितता, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से मंदी और कमोडिटी कीमतों की अस्थिरता रिस्क सेटीमेंट और कैपिटल फ्लो पर असर डाल सकती है। अमेरिका-ईरान संघर्ष में संभावित बढ़ोतरी और मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी नीतिगत अनिश्चितता भी बाजार में अस्थिरता पैदा कर सकती है।

मगोत्रा का कहना है कि कच्चा तेल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बना हुआ है, क्योंकि बढ़ती महंगाई विभिन्न सेक्टर्स में मार्जिन को दबा सकती है और भविष्य की आय वृद्धि पर असर डाल सकती है।
यदि नकदी की स्थिति सख्त होती है या कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आती है, तो इसका असर बड़ी कंपनियों की तुलना में छोटी कंपनियों पर ज्यादा पड़ सकता है, क्योंकि स्मॉलकैप कंपनियों की प्राइसिंग पावर कमजोर होती है।

शंकर का कहना है कि उपभोग में रिकवरी की निराशा, निजी क्षेत्र के कैपेक्स में देरी या अप्रत्याशित महंगाई का दबाव छोटे कारोबारों पर नेगेटिव असर डाल सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि स्मॉलकैप्स जोखिम-से-भागने (risk-off) वाले माहौल में ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनकी लिक्विडिटी कम और आय में उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है।

स्मॉलकैप फंड्स किसके लिए बेहतर?

स्मॉलकैप फंड्स में निवेश की एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि निवेशक के पास पहले से एक अच्छी तरह डायवर्सिफाइड कोर पोर्टफोलियो होना चाहिए। स्मॉलकैप फंड्स उन निवेशकों के लिए बेहतर हैं जिनकी जोखिम लेने की क्षमता (risk appetite) ज्यादा है। आनंद राठी वेल्थ की म्युचुअल फंड्स हेड श्वेता रजनी का कहना है कि निवेशकों को यह समझना चाहिए कि स्मॉलकैप में तेज बढ़त के साथ-साथ तेज गिरावट (high peaks and deep troughs) भी देखने को मिलती है।

मगोत्रा का कहना है कि निवेशकों को स्मॉलकैप में तभी निवेश करना चाहिए जब वे 30-40 फीसदी तक की गिरावट को कुछ वर्षों तक बिना घबराए झेल सकें। लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन के लिए स्मॉलकैप में निवेश करने वाले निवेशकों को बाजार के विभिन्न चक्रों (market cycles) के दौरान निवेश बनाए रखना चाहिए। रजनी निवेश की अवधि कम से कम 7-10 वर्ष रखने की सलाह देती हैं।

लैडरअप एसेट मैनेजमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर राघवेंद्र नाथ का कहना है कि जो निवेशक बाजार में गिरावट के दौरान घबरा कर निवेश बेच देते हैं, उन्हें इस फंड कैटेगरी से दूर रहना चाहिए।
इसके अलावा, जो लोग बच्चों की शिक्षा, शादी या इमरजेंसी फंड जैसी निकट अवधि की जरूरतों के लिए निवेश कर रहे हैं, उनके लिए यह बेहतर नहीं है। रिटायर्ड निवेशक या वे लोग जिन्हें अपने निवेश से नियमित आय की आवश्यकता है, उनके लिए भी यह कैटेगरी बेहतर नहीं मानी जाती।

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छोटे आवंटन से शुरुआत करें

पहली बार निवेश करने वालों को छोटे स्तर से शुरुआत करनी चाहिए। नाथ का कहना है कि निवेशक अपने इक्विटी पोर्टफोलियो का लगभग 10-15 फीसदी स्मॉलकैप फंड्स में आवंटित कर सकते हैं।
लंबी निवेश अवधि जरूरी है। मीरा मनी के को-फाउंडर आनंद के. राठी का कहना है कि केवल 2-3 साल के भीतर स्मॉलकैप में एंट्री और एग्जिट करने से असंतोषजनक परिणामों की संभावना बढ़ जाती है। रजनी भी सलाह देती हैं कि निवेशकों को गिरावट के दौर में निवेश जारी रखना चाहिए ताकि बाद में होने वाली रिकवरी का लाभ मिल सके।

नए निवेशकों को एकमुश्त बड़ी राशि लगाने के बजाय सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए धीरे-धीरे निवेश करना चाहिए। शंकर का कहना है कि SIPs निवेशकों को उतार-चढ़ाव (volatility) को संभालने और समय के साथ खरीद लागत को औसत करने में मदद करते हैं।

निवेशकों को पोर्टफोलियो की गुणवत्ता और निवेश शैली की भी जांच करनी चाहिए। राठी के अनुसार, उन्हें डाइवर्सिफाइड फंड चुनना चाहिए, अत्यधिक केंद्रित पोर्टफोलियो से बचना चाहिए और क्वालिटी-ओरिएंटेड स्मॉलकैप फंड्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।

नाथ सलाह देते हैं कि निवेशकों को फंड मैनेजर के ट्रैक रिकॉर्ड की समीक्षा कई वर्षों और अलग-अलग बाजार परिस्थितियों में करनी चाहिए, न कि केवल तेजी वाले बाजार के दौरान प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

मौजूदा निवेशक क्या करें?

जिन निवेशकों का निवेश का समय पांच साल से ज्यादा है, उन्हें हालिया कमजोर प्रदर्शन को देखकर घबराने के बजाय अपने निवेश पर कायम रहना चाहिए। नाथ का कहना है कि खराब प्रदर्शन के बाद निवेश बेचने से केवल नुकसान स्थायी हो जाता है और निवेशक संभावित रिकवरी का लाभ उठाने से चूक सकते हैं। र

जनी सलाह देती हैं कि निवेशकों को अपने SIP जारी रखने चाहिए और बाजार में गिरावट या करेक्शन के दौरान निवेश बंद नहीं करना चाहिए। हालांकि, जिन निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्मॉलकैप का हिस्सा बहुत ज्याजा हो गया है, उन्हें धीरे-धीरे रीबैलेंसिंग के जरिए इसका वजन कम करना चाहिए।

First Published : June 3, 2026 | 3:41 PM IST