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सिर्फ रजिस्ट्रेशन से नहीं बनेगी वसीयत वैध, सुप्रीम कोर्ट ने बताए नियम; जानें असली वसीयत कैसे साबित करें?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि अदालतें वसीयत की जांच कैसे करती हैं, उसे सही साबित करने की जिम्मेदारी किसकी होती है और केवल रजिस्ट्रेशन पर्याप्त क्यों नहीं है।

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अमित कुमार   
Last Updated- July 21, 2026 | 6:00 PM IST

रजिस्टर्ड वसीयत (Registered Will) अपने आप में वैध या वास्तविक वसीयत नहीं मानी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने एक स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि अदालतों को केवल वसीयत के रजिस्ट्रेशन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि क्या यह दस्तावेज वास्तव में मृत व्यक्ति की स्वतंत्र और स्वैच्छिक इच्छा को दर्शाता है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब संपत्ति, वित्तीय निवेश और पारिवारिक संपत्ति से जुड़े उत्तराधिकार विवाद बढ़ रहे हैं।

अदालत ने कहा कि वसीयत को सही साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होगी, जो उस पर भरोसा कर रहा है। उसे यह साबित करना होगा कि वसीयत स्वेच्छा से बनाई गई थी, वसीयतकर्ता (Testator) मानसिक रूप से स्वस्थ था और उस पर किसी तरह का दबाव, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव नहीं था। परिवारों के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश है कि वसीयत तैयार करते समय सावधानी और सही दस्तावेजी प्रक्रिया अपनाने से भविष्य में होने वाले विवादों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

वसीयत को लेकर विवाद भारतीय अदालतों में आने वाले सबसे आम पारिवारिक संपत्ति मामलों में शामिल हैं। संपत्ति की बढ़ती कीमतों और वित्तीय संपत्तियों के विस्तार के साथ उत्तराधिकार विवाद भी बढ़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत एक विशेष प्रकार का दस्तावेज है, क्योंकि इसे बनाने वाला व्यक्ति इसके लागू होने के समय जीवित नहीं होता और वह यह नहीं बता सकता कि वसीयत किन परिस्थितियों में बनाई गई थी। इसलिए अदालतों को ऐसे दस्तावेजों की सामान्य दस्तावेजों की तुलना में अधिक सावधानी से जांच करनी होती है। 

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति को अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति (Self-acquired Property) को अपनी इच्छा के अनुसार बांटने का अधिकार है। केवल इसलिए कि किसी कानूनी उत्तराधिकारी को संपत्ति से बाहर रखा गया है, वसीयत अमान्य नहीं हो जाती।

वैध वसीयत के लिए क्या जरूरी है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, एक वैध वसीयत को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 के प्रावधानों का पालन करना होता है और विवाद होने पर इसे साक्ष्य कानून के अनुसार साबित करना पड़ता है। डीएम हरिश एंड कंपनी एलएलपी की अधिवक्ता प्रिया गाडा के अनुसार वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर होना जरूरी है। कम से कम दो गवाहों द्वारा वसीयत की पुष्टि (Attestation) होनी चाहिए। साथ ही गवाहों ने वसीयतकर्ता को हस्ताक्षर करते हुए देखा हो और वसीयत मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से बनाई गई हो। यदि वसीयत को चुनौती दी जाती है, तो आमतौर पर कम से कम एक गवाह को अदालत में गवाही देनी पड़ सकती है।

दिल्ली हाईकोर्ट की अधिवक्ता विनीता सेजवाल ने कहा कि वसीयत को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और साक्ष्य कानून दोनों की कसौटी पर खरा उतरना होता है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र गवाहों का चयन और उम्र या बीमारी से जुड़े मामलों में मेडिकल रिकॉर्ड रखना भविष्य के विवादों को कम कर सकता है। द फोर्ट सर्किल की सह-संस्थापक और पार्टनर प्रियंका देसाई ने कहा कि वसीयत के गवाह स्वयं लाभार्थी नहीं होने चाहिए। साथ ही वसीयतकर्ता को दस्तावेज समझने और निर्णय लेने की मानसिक क्षमता होनी चाहिए।

सिरिल अमरचंद मंगलदास (Cyril Amarchand Mangaldas) में प्राइवेट क्लाइंट निदेशक वरुण कल्सी ने सलाह दी कि वसीयत में स्पष्ट भाषा का इस्तेमाल किया जाए, चल व अचल संपत्तियों को अलग-अलग बताया जाए और अलग-अलग देशों या क्षेत्रों में संपत्ति होने पर अलग वसीयत तैयार करने पर विचार किया जाए।

सिंघानिया एंड कंपनी की पार्टनर रीना बजाज ने कहा कि वैध वसीयत कम से कम 18 वर्ष की आयु वाले मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति द्वारा बनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, लेकिन इससे आधिकारिक रिकॉर्ड बन जाता है और विवाद की स्थिति में वसीयत की प्रमाणिकता मजबूत हो सकती है।

सिर्फ रजिस्ट्रेशन प्रमाण नहीं है

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि वसीयत का रजिस्ट्रेशन उसकी प्रमाणिकता को मजबूत करता है, लेकिन अकेले इससे वसीयत सही साबित नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता तुषार कुमार ने कहा कि रजिस्ट्रेशन न तो वसीयत को वैध बनाता है और न ही इसे वास्तविक मानने की कोई स्वत: धारणा पैदा करता है।अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि दस्तावेज वास्तव में मृत व्यक्ति की स्वतंत्र और सोच-समझकर ली गई इच्छा को दर्शाता है।

फोरसाइट लॉ ऑफिसेज इंडिया के प्रिंसिपल एसोसिएट पारिजात सिंह सुरेंद्रन ने कहा कि रजिस्ट्रेशन केवल एक महत्वपूर्ण परिस्थिति है।यदि वसीयत की प्रमाणिकता पर संदेह पैदा करने वाले तथ्य मौजूद हैं, तो रजिस्टर्ड वसीयत भी खारिज की जा सकती है।

अदालत किन बातों को मानती है संदिग्ध?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संदिग्ध परिस्थितियों की कोई निश्चित सूची नहीं है।हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर फैसला किया जाएगा। हालांकि अदालतें आमतौर पर इन बातों की जांच करती हैं:

  • बिना कारण प्राकृतिक उत्तराधिकारियों को संपत्ति से बाहर रखना।
  • मुख्य लाभार्थी का वसीयत तैयार करने में सक्रिय रूप से शामिल होना।
  • वसीयतकर्ता का गंभीर बीमारी से पीड़ित होना या मानसिक क्षमता पर सवाल होना।
  • संदिग्ध हस्ताक्षर, बदलाव या काट-छांट।
  • दबाव, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के सबूत।
  • गवाहों के बयान में विरोधाभास।
  • संपत्ति का असामान्य या बिना वजह वितरण।

प्रिया गाडा ने कहा कि अदालतें गवाहों के विरोधाभासी बयानों और दस्तावेज में संदिग्ध बदलावों की भी जांच करती हैं

वसीयत को चुनौती पर कौन से दस्तावेज आएंगे काम?

यदि वसीयत विवाद में जाती है, तो उसे सही साबित करने की शुरुआती जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होगी जो उस पर दावा कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, लाभार्थी या निष्पादक (Executor) को ये दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए:

  • मूल वसीयत।
  • गवाहों की जानकारी।
  • वसीयतकर्ता की मानसिक स्थिति से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड।
  • वसीयत पंजीकृत होने पर रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड।
  • वसीयतकर्ता की इच्छा को दर्शाने वाले पत्र या दस्तावेज।
  • संपत्ति के असमान वितरण का कारण बताने वाले रिकॉर्ड।

विशेषज्ञों के अनुसार, बुजुर्ग या गंभीर रूप से बीमार वसीयतकर्ता के मामले में मेडिकल रिकॉर्ड काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। गवाहों की गवाही अक्सर सबसे अहम सबूत होती है। संपत्ति वितरण से जुड़े दस्तावेज और यह प्रमाण कि विवादित दस्तावेज अंतिम वसीयत थी, मामले को मजबूत कर सकते हैं।

परिवारों के लिए व्यावहारिक सीख

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पष्ट है कि कानूनी रूप से मजबूत वसीयत बनाना केवल दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने तक सीमित नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञों ने वसीयत बनवाते समय इन बातों में ध्यान देने की सलाह दी है।

  • वसीयत स्पष्ट भाषा में तैयार करें।
  • स्वतंत्र गवाह रखें।
  • मूल दस्तावेज सुरक्षित रखें।
  • संपत्ति के असमान वितरण का कारण स्पष्ट करें।
  • जरूरत पड़ने पर मेडिकल प्रमाणपत्र लें।
  • अतिरिक्त प्रमाणिकता के लिए वसीयत का पंजीकरण कराने पर विचार करें।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उत्तराधिकार कानून का उद्देश्य व्यक्ति की संपत्ति बांटने की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना है कि इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल धोखाधड़ी, दबाव या हेरफेर के जरिए न किया जाए।

First Published : July 21, 2026 | 6:00 PM IST