लार्सन ऐंड टुब्रो
इंजीनियरिंग और निर्माण क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो की सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज में 12 फीसदी की हिस्सेदारी है। माना जा रहा है कि सत्यम के अधिग्रहण की होड़ में एलऐंडटी ही सबसे आगे है।
वास्तव में एलऐंडटी ने कई बार सरकार के समक्ष सत्यम के प्रबंध तंत्र पर नियंत्रण की इच्छा जाहिर की। वह सत्यम में अब तक 670 करोड़ रुपये का निवेश कर चुकी है। एलऐंडटी के सीएमडी ए. एम. नाइक ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में कई सारी चीजें बदल चुकी हैं।
जहां कई बोलीदाताओं ने अपने नाम वापस ले लिए, वहीं कई महत्वपूर्ण कर्मचारियों ने कंपनी छोड़ दी है। जानकारों के मुताबिक, उसकी आईटी कंपनी एलऐंडटी इन्फोटेक और विवादित सत्यम में ढेर सारी समानताएं हैं।
एक बैंकर ने बताया, ”एंटरप्राइज अप्लीकेशन पर और इंजीनियरिंग क्षेत्र पर सत्यम का जबरदस्त ंफोकस है। संयोग से इन्हीं दोनों क्षेत्र पर एलऐंडटी इन्फोटेक का भी ंफोकस है।” एलऐंडटी यदि अधिग्रहण करती है तो इसके राजस्व में न केवल अरबों डॉलर की वृद्धि हो जाएगी, बल्कि कर्मचारियों की संख्या भी 50 हजार बढ़ जाएगी।
कॉग्निजेंट
नैस्डैक में सूचीबद्ध कॉग्निजेंट टेक्नोलॉजी सॉल्युशंस निजी इक्विटी फर्म विल्बर एल रॉस ऐंड कंपनी के साथ मिलकर सत्यम के अधिग्रहण की दौड़ में शामिल है।
गौरतलब है कि कॉग्निजेंट को सत्यम और ब्रैडस्ट्रीट कॉरपोरेशन ने 1994 में शुरू किया था। डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट सत्यम सॉफ्टवेयर (डीबीएसएस) नाम की इस संस्था में सत्यम की हिस्सेदारी 24 तो डीऐंडबी की 76 फीसदी थी।
हालांकि इसके शुरू होने के 2 साल बाद डीबीएसस में सत्यम की हिस्सेदारी को डीऐंडबी ने खरीद लिया। एक विश्लेषक के मुताबिक, कॉग्निजेंट अब तक बीएफएसआई और हेल्थकेयर कारोबार पर ध्यान देती रही है। सत्यम का अधिग्रहण करते ही इंटरप्राइज अप्लीकेशन में अपने-आप कंपनी की धमक हो जाएगी।
विल्बर एल रॉस ऐंड कंपनी
अमेरिकी अरबपति विल्बर रॉस चालित इक्विटी कंपनी विल्बर रॉस ऐंड कं. ने भी सत्यम में अपनी रुचि जाहिर की है। कॉग्निजेंट के साथ मिलकर यह बोली लगा रही है। रॉस को इस्पात, कोयला, दूरसंचार, विदेशी निवेश और कपड़ा उद्योग की असफल कंपनियों के पुनरुद्धार के लिए जाना जाता है। 2005 में फोर्ब्स मैगजीन ने पहली बार रॉस को अरबपतियों की अपनी सूची में शामिल किया था।
टेक महिंद्रा
महिन्द्रा ऐंड महिन्द्रा समूह की आईटी कंपनी टेक महिन्द्रा भी सत्यम को खरीदने की होड़ में शामिल है। इसने अब तक अपने विकल्प खुले रखे हैं क्योंकि सत्यम ने ग्राहकों, कर्मचारियों और देनदारियों के मसले पर कोई स्पष्ट नीति जारी नहीं की है।
एक विश्लेषक ने बताया कि इस वजह से टेक महिन्द्रा की सफलता संदिग्ध हो सकती है। इसके लिए चिंता की एक और वजह अधिग्रहण के लिए जरूरी धन का जुगाड़ है। 31 दिसंबर तक टेक महिन्द्रा के पास महज 11 करोड़ डॉलर की नगदी है। इसके अलावा, फिच ने सत्यम अधिग्रहण के दौड़ में शामिल होन को लेकर इसकी रेटिंग घटा दी है।
ऐसे में सत्यम के अधिग्रहण के लिए विदेशों से धन का जुगाड़ कर पाने में काफी मुश्किल होगी। यही नहीं, दीपक पारेख महिन्द्रा ऐंड महिन्द्रा के बोर्ड में 1990 से ही रहे हैं। यदि नीलामी एमऐंडएम के पक्ष में जाती है तो पारेख और नीलामी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं।
भले ही नीलामी प्रक्रिया से दीपक पारेख का कोई जुड़ाव न हो। ऐसे में माना जा रहा हैकि टेक महिन्द्रा को एलऐंडटी से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी होगी।