उत्पादन मंदा, कारोबार ठंडा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 09, 2022 | 2:59 PM IST

अगर कोई कहता है कि कार का बाजार 2009 में सुधर जाएगा, तो उस पर हंसी आना लाजिमी है। बाजार की जो हालत है, उससे जाहिर है कि 2009 कार कंपनियों पर भारी पड़ने जा रहा है।


कम से कम साल की पहली छमाही में तो कार उद्योग के लिए हालात बिल्कुल विपरीत ही रहेंगे।

2008 में कार कंपनियों को जबरदस्त चोट लगी, अगले साल भी उन्हें ऐसा ही माहौल मिलेगा और उद्योग में विकास की रफ्तार 10 फीसदी से भी काफी कम रहेगी। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कार कंपनियों पर तीन तरफा मार पड़ रही है, जिसकी वजह से ग्राहक उनसे दूर भाग रहे हैं।

सबसे पहले ब्याज दरें काफी ज्यादा हैं और कोई भी ग्राहक दोहरे अंक की ब्याज दर पर कर्ज लेना नहीं चाहता। भारत में 70 फीसदी से ज्यादा कारें कर्ज लेकर ही खरीदी जाती हैं, इसलिए बिक्री पर इस पहलू का फर्क पड़ना लाजिमी है।

बैंक भी अब आसानी से ऑटो लोन नहीं दे रहे हैं। तीसरी परेशानी यह है कि ग्राहक शोरूम के भीतर कदम ही नहीं रख रहे हैं। इस समय छंटनी और मंदी के माहौल में कमोबेश सभी खरीदारी की अपनी योजना टाल रहे हैं।

जहां तक उत्पादन में कटौती की बात है, तो ज्यादातर कार कंपनियां इस पर अमल करेंगी। सबसे पहले वे अपने संयंत्रों पर और डीलरों के यहां मौजूद स्टॉक को निकालेंगी, इसलिए उत्पादन धीमा करना ही पड़ेगा। निवेश पर ब्रेक लग जाएंगे।

छंटनी इस क्षेत्र में भी तय है। कार कंपनियों में स्थायी कर्मचारी बच सकते हैं, लेकिन अस्थायी कर्मचारी तो छांटे ही जाएंगे। इसके अलावा कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियां भी कार निर्माताओं पर ही आश्रित होती हैं, इसलिए वहां छंटनी बड़ी तादाद में होगी।

वाहन उद्योग में अगले साल भर्तियों का सिलसिला थम सकता है और वेतन में बढ़ोतरी की उम्मीद करना इस माहौल में बेमानी होगा। बहुत शानदार काम करने वाले कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ सकती है, लेकिन उन्हें भी 10 फीसदी से कम ही बढ़ोतरी मिलेगी।

बातचीत : ऋषभ कृष्ण


बाजार तो मंदा है, आगे कुछ कहना अभी बहुत मुश्किल है

आर सी भार्गव
चेयरमैन, मारुति सुजुकी इंडिया

छंटनी तो नहीं, लेकिन उत्पादन में कटौती तो करनी ही होगी

पी बालेंद्रन
उपाध्यक्ष, जनरल मोटर्स इंडिया

First Published : December 29, 2008 | 12:07 AM IST