आगरा में पांव जमा रहा प्लास्टिक पैकेजिंग उद्योग

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 12:05 AM IST

आगरा के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में अब उद्यमशीलता की भावना का अभाव देखा जा रहा है।
अपने हस्तशिल्प और फुटवियर निर्यात की बदौलत 2200 करोड़ रुपये से भी अधिक की कमाई करने वाले इस शहर में बड़े उद्योगपतियों के बीच उद्यमशीलता को लेकर उत्साह काफूर होता नजर आ रहा है। इसके विपरीत कई छोटी इकाइयां प्लास्टिक पैकेजिंग समेत कई नए व्यवसायों के लिए आगे आई हैं।
देश के प्रमुख औद्योगिक क्लस्टरों में शुमार आगरा में पिछले दशक में सख्त प्रदूषण मानकों के लागू होने के बाद से स्थानीय औद्योगिक विकास काफी हद तक थम सा गया है। इस शहर के उद्यमी औद्योगिक निकायों भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और नेशनल चैम्बर ऑफ इंडस्ट्रीज ऐंड कॉमर्स (एनसीआईसी) द्वारा सुझाए गए व्यवसाय के नए क्षेत्रों में निवेश से परहेज कर रहे हैं।
एनसीआईसी (उत्तर प्रदेश) के पूर्व अध्यक्ष राजीव गुप्ता कहते हैं, ‘आगरा के प्रमुख उद्यमियों में ऐसी पहल के अभाव ने इस शहर का औद्योगिक विकास अवरुद्ध कर दिया है। लोग किसी तरह का जोखिम लेने को इच्छुक नहीं हैं और वे फाउंड्री, फुटवियर और पर्यटन क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।’
गुप्ता के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में एनसीआईसी द्वारा उद्योगपतियों को कई प्रस्ताव दिए गए। इन प्रस्तावों में सोलर फोटोवोल्टिक सेल्स, विंड टर्बाइन जैसी पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा निर्माण उपकरणों से जुड़ी निर्माण इकाइयों की स्थापना भी शामिल थी जिससे आगरा पर्यावरण अनुकूल एसईजेड के विशेष दर्जे को हासिल कर सकता था। लेकिन किसी भी उद्यमी ने इन परियोजनाओं में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आगरा में विकास संभावनाओं के अभाव की वजह से ही इस शहर की उत्पादनकारी युवा जनसंख्या दिल्ली और एनसीआर की तरफ पलायन कर रही है जिसकी वजह से इस शहर की प्रगति बाधित हो रही है।
एक ओर जहां बड़े उद्यमी बिना सरकारी समर्थन के नए व्यवसायों में दस्तक देने की पहल में बहुत कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं, वहीं आगरा में प्लास्टिक पैकेजिंग इकाइयां नए औद्योगिक क्षेत्र में रूप में तेजी से विकसित हो रही हैं। हालांकि इन प्लास्टिक पैकेजिंग उद्योगों को विकसित करने के लिए छोटी और कुटीर इकाइयां सरकारी मदद पर निर्भरता के बगैर ही आगे बढ़ रही हैं।
सिकंदरा औद्योगिक इलाके में ऐसी ही प्लास्टिक पैकेजिंग, टयूब्स और मोल्डेड शीट निर्माण इकाई चलाने वाले परवेज खान दावा करते हुए कहते हैं कि आगरा में छोटे आकार की कम से कम 20-25 इकाइयां 1-2 इंजेक्शन मोल्डिंग मशीनों के साथ काम कर रही हैं। ये इकाइयां स्थानीय बाजार और पड़ोसी शहरों के बाजारों के लिए प्लास्टिक निर्माण, थर्मोकॉल, पीई बबल पैक और पीपी फिल्म पैकेजिंग मैटेरियल के निर्माण में लगी हुई हैं।
परवेज के मुताबिक आगरा में बड़े आकार की 2-3 पैकेजिंग इकाइयां पहले से ही काम कर रही हैं। ये बड़ी इकाइयां बड़े घरेलू ग्राहकों के लिए और विदेशों में अपने उत्पादों की आपूर्ति करती हैं। वहीं शहर में स्थापित हो रही कुटीर इकाइयां सिर्फ स्थानीय मांग को पूरा करने में लगी हुई हैं।
उन्होंने कहा कि पुरानी मशीनों के साथ किसी पीई या पीपी फिल्म पैकेजिंग इकाई की शुरुआत करना नई मशीनरी की खरीदारी की तुलना में काफी सस्ता है और आगरा में काम कर रही ज्यादातर छोटी इकाइयां पुरानी मशीनों का ही इस्तेमाल कर रही हैं। पुरानी मशीनों के साथ इकाई की शुरुआत करने पर लगभग 5 लाख रुपये की लागत आती है और ऐसी परियोजना के लिए वित्त की व्यवस्था बिना सरकारी मदद के भी की जा सकती है।
परवेज का कहना है कि असल में, शहर से बाहर औद्योगिक इलाकों में भूखंड आवंटन के सिलसिले में सरकारी मदद जरूरी है। हालांकि इंजेक्शन मोल्डिंग मशीन लगाना भी काफी महंगा है और इसीलिए आगरा में ऐसी ज्यादा इकाइयां अभी तक कामकाज शुरू नहीं कर पाई हैं।
नई इकाइयों द्वारा झेली जा रही समस्याओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ज्यादातर कुटीर इकाइयां पंजीकृत नहीं हैं और इसलिए उन्हें दिल्ली से कच्चे माल की खरीद में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा सालाना प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र हासिल करना भी छोटे उद्यमियों के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है। किसी भी औद्योगिक इकाई को शहर में कार्य करने के लिए यह प्रमाण पत्र लेना जरूरी है।

First Published : April 11, 2009 | 5:49 PM IST