उम्र के 65वें पड़ाव तक आते-आते नुस्ली वाडिया ने कई चीजें छोड़ दी हैं। न केवल स्मोकिंग (इनका पसंदीदा ब्रांड डनहिल और डेविडॉफ रहा है) बल्कि कंपनियों की रोजाना होने वाली बैठक भी।
अब उनके बेटे जेह और नेस ही समूह के कर्ता-धर्ता बन चुके हैं। समूह का कामकाज संभालने में इन दोनों भाइयों की मदद विनीता बाली जैसे दमदार पेशेवर कर रहे हैं। धीरूभाई अंबानी के साथ नुस्ली की चर्चित तकरार अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है।
हालांकि, रतन टाटा, केशो महिन्द्रा, शरद पवार और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कुछ चुनिंदा दोस्तों का साथ और एकाकी स्वभाव नुस्ली अब तक नहीं छोड़ पाए हैं। वे और उनकी पत्नी मौरीन लाइमलाइट में हमेशा बने ही रहते हैं।
मौरीन वाडिया ग्लैडरैग्स ब्यूटी पेजेंट की अध्यक्ष और ग्लैडरेग्स ब्यूटी की संपादक हैं। एक महत्वपूर्ण चीज तो हर किसी को पता है कि नुस्ली पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नाती हैं। उनकी मां दीना जिन्ना साहब की बेटी हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज कि नुस्ली वाडिया हमेशा अपने जुझारू स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। यकीन न हो तो दानोन मामले को ही देख लें।
फ्रांस की बड़ी डेयरी कंपनियों में से एक दानोन एक बार तो ब्रिटानिया पर नियंत्रण पाने के लिए वाडिया से ही भिड़ने की सोच रही थी। दरअसल इन दोनों कंपनियों के बीच तनाव 2007 में तब उत्पन्न हुआ, जब वाडिया समूह की सहमति के बगैर ही दानोन ने बेंगलुरु की पोषक खाद्य सामान निर्माता अवस्ताजेन में हिस्सेदारी खरीदने का फैसला लिया।
आरोप यह भी है कि दानोन ने बगैर वाडिया की सहमति के टाइगर ब्रांड को 70 देशों में पंजीकृत कराने की पहल शुरू कर दी। परिणाम यह हुआ कि दोनों कंपनियों के बीच का तनाव चरम तक पहुंच गया। अब बारी जुझारू कहे जाने वाले नुस्ली की थी। उन्होंने सबसे पहले अवस्ताजेन का अधिग्रहण रुकवाया। इसके लिए उन्होंने अस्वीकृति का पहला अधिकार का सहारा लिया।
इसके बाद टाइगर मामले में बौद्धिक संपदा कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए दानोन को कोर्ट में घसीटा। यह मामला हालांकि अभी चल रहा है। दानोन ने जब अमेरिका की क्राफ्ट फूड के हाथों अपना वैश्विक बिस्कुट कारोबार बेचा, तब केवल भारत को इससे दूर रखा गया। ऐसा इसलिए कि यहां बगैर वाडिया की सहमति के ऐसा करना संभव नहीं था।
अब 3 साल पुराने इस मामले पर सोमवार को परदा पड़ गया, जब वाडिया का ब्रिटानिया पर सबसे बड़ा नियंत्रण हो गया है। वाडिया 1993 से ही इसके लिए कोशिश कर रहे थे। उस समय कंपनी पर नियंत्रण के लिए हंटली और पामर से बातचीत की गई थी। यह सपना हकीकत तो बना पर इसमें 16 साल लग गए। इस तरह ब्रिटानिया अब वाडिया समूह के मुकुट का रत्न बन गई।