मंदी में भी चमक रहा देहरादून का बल्ब उद्योग

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 10, 2022 | 10:50 PM IST

देहरादून में वाहनों के लिए बल्ब का निर्माण करने वाली जीबीपीएल इंडस्ट्रीज के लिए मौजूदा आर्थिक मंदी और सरकार द्वारा मुहैया कराई गई कर रियायत ने कारोबार में इजाफा करने का एक सुनहरा मौका दे दिया है।
जीबीपीएल ने आर्थिक मंदी, खासकर वाहन क्षेत्र में मंदी, के बावजूद इस वित्त वर्ष में कारोबार में 25 फीसदी का इजाफा दर्ज किया है। यह बल्ब निर्माण इकाई वाहन क्षेत्र में मंदी का भरपूर लाभ उठा रही है। यह इकाई जिन बल्बों का निर्माण करती है उनका इस्तेमाल पुराने वाहनों में रीप्लेसमेंट के तौर पर किया जाता है।
देहरादून के औद्योगिक इलाके पटेल नगर में स्थित जीबीपीएल के प्रबंध निदेशक राजीव के अग्रवाल ने कहा, ‘पिछले एक साल के दौरान वाहन क्षेत्र में बिक्री घटी है। इसलिए पुराने वाहनों में यह हमारे बल्बों का इस्तेमाल बढ़ा है।’
जीबीपीएल ही नहीं, देहरादून में अन्य वाहन बल्ब उद्योगों के लिए भी कारोबार चमकाने का यह अच्छा समय है। इस शहर की लगभग 30-40 फीसदी लघु इकाइयां और असंगठित क्षेत्र की दर्जनों इकाइयां वाहनों के लिए बल्ब, टॉर्च और सजावटी सामानों के निर्माण में लगी हुई हैं।
इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (आईएयू) के अध्यक्ष एग्रीस पंकज गुप्ता ने कहा, ‘वाहन क्षेत्र में मंदी की वजह से देश में वाहन बल्बों के निर्माण में 10 से 15 फीसदी का इजाफा हुआ है।’ कर रियायत की अवधि से पहले बल्ब उद्योग में तस्वीर बेहद धुंधली थी।
पिछले एक दशक के दौरान लगभग 200 बल्ब निर्माण इकाइयां बंद हो चुकी हैं। इनमें से ज्यादातर निर्माता अन्य पेशों की तरफ मुड़ चुके हैं। इस अवधि के दौरान सस्ते चीनी उत्पादों की बाजार में बाढ़ आ गई जिससे स्थानीय बल्ब उद्योग के लिए खतरा पैदा हो गया।
लेकिन सस्ते चीनी बल्बों की दस्तक के बावजूद कुछ निर्माताओं ने चतुराई का परिचय दिया और कर रियायत का लाभ उठाते हुए कारोबार का व्यापक विस्तार किया। इसके अलावा समय बीतने पर चीनी बल्बों की चमक फीकी पड़ने लगी।
देहरादून के 25 करोड़ रुपये के कारोबार वाले बल्ब क्लस्टर में कई इकाइयों ने अपने कारोबार का विस्तार एवं विविधीकरण किया है। 3 करोड़ रुपये के कारोबार वाली आनंद इंडस्ट्रीज के मालिक राजीव बेरी बताते हैं कि उन्होंने टॉर्च बल्बों के इंडोलाइट ब्रांड का निर्माण अब बंद कर दिया है।
विभिन्न बाध्यताओं की वजह से हमने इस ब्रांड का निर्माण बंद कर अब रेलवे सिगनल लैम्प के कारोबार में किस्मत आजमाई है। बेरी ने कहा, ‘चीन और जापान में निर्मित होने वाले लाइट एमिटिंग डियोड्स (एलईडी) के सामने टॉर्च बल्ब अब अपनी चमक खो चुका है।’
भारत में छोटे बल्बों के निर्माण का सिलसिला 1958 में उस वक्त शुरू हुआ था जब एसी जैन ने देहरादून में कोमेट बल्बों के निर्माण के लिए पहली फैक्टरी स्थापित की। तब से देहरादून के आसपास बल्ब उद्योग निर्माण इकाइयों की बाढ़ आ गई है। इस उद्योग के जानकारों का कहना है कि बल्ब उद्योग में लगभग 5000 लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
समय बदलने के साथ दिल्ली, मुंबई, इंदौर और पुणे जैसे शहरों में भी ऐसी कई इकाइयां स्थापित हुईं जिससे देहरादून की इकाइयों के लिए चुनौती बढ़ गई। पंकज गुप्ता ने कहा, ‘हालांकि कर रियायतों के बावजूद इस उद्योग के लिए परिदृश्य ज्यादा सुखद नहीं है। उद्योग को इसलिए भी बुरे वक्त का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उसे सरकार से ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है।’
फिर भी इस उद्योग के लिए उम्मीद की किरण नजर आ रही है। टाटा मोटर्स, एम ऐंड एम, हीरो होंडा और बजाज ऑटो जैसी कंपनियां इस राज्य में अपनी शॉप स्थापित कर रही हैं। इस उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बल्ब उद्योग को एक बड़े ऑटो हब के रूप में तेजी से उभर रहे उत्तराखंड में जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

First Published : April 4, 2009 | 4:38 PM IST