सरकारी स्वामित्व वाली हेलीकॉप्टर सेवा प्रदाता कंपनी पवन हंस लिमिटेड की बोली जीतने वाले कंसोर्टियम के एक सदस्य के खिलाफ अदालती आदेश आने के कारण केंद्र इसकी बिक्री अनिश्चित समय के लिए टाल सकता है। यह दूसरा मामला है, जिसमें विजेता बोलीदाता के खिलाफ आरोपों की वजह से प्रक्रिया पूरी होने के बाद विनिवेश की मुहिम को टाला जा रहा है। सरकार ने पहले सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (सीईएल) का निजीकरण रोक दिया था। उस मामले में आरोप थे कि बोली जीतने वाली कंपनी नंदलाल फाइनैंस और छांट दी गई दूसरी कंपनी जेपीएम इंडस्ट्रीज लिमिटेड एक-दूसरे से संबंधित हैं।
ऐसा कहा जा रहा है कि अल्मास ग्लोबल अपॉच्र्युनिटी फंड अपने पिछले रिकॉर्ड की वजह से सवालों के घेरे में है। यह केमन द्वीपसमूह का फंड है, जिसे दुबई की अल्मास कैपिटल संभालती है। इसे राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने दोषी ठहराया है क्योंकि बोली में सफल घोषित किए जाने के बाद भी आवश्यक धनराशि का भुगतान नहीं किया और कोलकाता की बिजली पारेषण कंपनी ईएमसी लिमिटेड की दिवालिया प्रक्रिया को मुश्किल में फंसा दिया।
एनसीएलटी के कोलकाता पीठ ने 20 अप्रैल को आदेश दिया कि दिवालिया संहिता की धारा 74(3) के तहत अल्मास ग्लोबल अपॉच्र्युनिटी फंड के प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाए। इस धारा के तहत बोली जीतने वाली कंपनी के अधिकारियों को कम से कम एक साल और अधिकतम पांच साल के लिए कैद किया जा सकता है। उन पर अधिकतम 1 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
एनसीएलटी के पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता की धारा 74(3) के तहत स्वीकृत समाधान योजना के उल्लंघन के लिए सफल समाधान आवेदक (एसआरए) और इसके जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित किया जाए। इसके लिए इस आदेश की एक प्रति भारतीय ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) और कंपनी मामलों के मंत्रालय के सचिव को भेजी जाए, जो उचित शिकायत शुरू करने के लिए अधिकृत एजेंसियां हैं।’ पीठ ने अपने आदेश में कहा कि फंड ने पूरी प्रक्रिया को धोखा दिया है।
एनसीएलटी के आदेश के नौ दिन बाद ही कैबिनेट समिति ने पवन हंस की 51 फीसदी हिस्सेदारी एवं प्रबंधन नियंत्रण स्टार9 मोबोलिटी प्राइवेट लिमिटेड को बेचने की मंजूरी दे दी। स्टार9 मोबोलिटी प्राइवेट लिटिमेड तीन सदस्यों का कंसोर्टियम है। इसमें फ्लाईबिग के नाम से क्षेत्रीय उड़ानों का परिचालन करने वाली बिग चार्टर प्राइवेट लिमिटेड, महाराज एविएशन प्राइवेट लिमिटेड और अल्मास ग्लोबल अपॉच्र्युनिटी फंड एसपीसी शामिल हैं। कंसोर्टियम ने 211 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी।
बाकी 49 फीसदी हिस्सेदारी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के पास है।
सरकार ने कहा था कि उसे तीन वित्तीय बोलियां मिली हैं, लेकिन 199.20 करोड़ रुपये की आरक्षित कीमत से अधिक बोली केवल स्टार9 मोबिलिटी ने लगाई है। इसने बोली लगाने वाले दो अन्य पक्षों के नाम का खुलासा नहीं किया।
सरकार की विनिवेश प्रक्रिया संभालने वाले निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम) के सचिव तुहिन कांत पांडे ने कहा, ‘हम इसकी कानूनी जांच कर रहे हैं। बोली में सफल पक्ष को अभी हमने लेटर ऑफ अवार्ड जारी नहीं किया है।’ दीपम के दिशानिर्देशों के मुताबिक अगर किसी कंपनी या उसके निदेशकों को अदालत ने दोषी ठहराया है या किसी नियामकीय प्राधिकरण ने दोषारोपण या प्रतिकूल आदेश दिया है, जिससे किसी सार्वजनिक कंपनी का निजीकरण होने पर उसके प्रबंधन में उसकी क्षमता पर संदेह पैदा होता है तो उस कंपनी को अपात्र घोषित कर दिया जाएगा।
इस फंड को अपात्र घोषित करने से प्रक्रिया मुश्किल में फंस जाएगी क्योंकि यही कंसोर्टियम न्यूनतम 300 करोड़ रुपये के नेटवर्थ की पात्रता वाले पैमाने पर खरा उतरा था। कंपनी में अल्मास की 49 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि बिग चार्टर की 26 फीसदी और महाराजा एविएशन की 25 फीसदी है।
घाटे में चल रहीं दो अन्य कंपनियां बिग चार्टर और महाराजा एविएशन इसलिए पात्र मानी गईं क्योंकि वे हवाई परिवहन प्रदाता हैं और उन्हें डीजीसीए से वैध हवाई परिचालक लाइसेंस मिला है।
बोली प्रक्रिया की शर्तों के अनुसार, यदि हवाई परिवहन सेवा परिचालक अपने कंसोर्टियम के जरिये बोली लगाते हैं और इसमें 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं, तो उनकी निवेश पूंजी शून्य समझी जाएगी। इसलिए अलमास ग्लोबल की निवेश पूंजी (जो 691 करोड़ रुपये नियत की गई) पूरे कंसोर्टियम की नेटवर्थ के तौर पर समझा गया था।
इंडियन नैशनल कांग्रेस ने दो सप्ताह पहले पवन हंस की बोली प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे।
अधिकारियों का कहना है कि ईएमसी लिमिटेड को 6,500 करोड़ रुपये के ऋणों की चूक के बाद वर्ष 2018 में एनसीएलटी के हवाले किया गया था। अक्टूबर 2019 में एसबीआई के नेतृत्व में बकायेदारों की समिति (îसीओसी) ने बैंकों का बकाया निपटाए जाने के लिए अलमास ग्लोबल अपॉच्र्युनिटीज फंड द्वारा प्रस्तावित समाधान योजना को मंजूरी दी। इस फंड ने बैंकों का बकाया चुकाकर और करीब 568 करोड़ रुपये की पूंजी लगाकर कंपनी का कायाकल्प किए जाने का प्रस्ताव रखा था। पूरा भगतान समाधान योजना की मंजूरी की तारीख से 60 दिन के अंदर करना था।
हालांकि भुगतान के बारे में बार-बार याद दिलाए जाने और सीओसी द्वारा कहे जाने के बावजूद अलमास ने बैंक गारंटी के तौर पर 30 करोड़ रुपये के अलावा कोई रकम नहीं चुकाई।
जनवरी 2021 में, बैंक ने रिजोल्यूशन पेशेवर कन्नन तिरूवेंगदम को नियुक्त किया और समाधान योजना का उल्लंघन करने पर अलमास ग्लोबल अपॉच्र्युनिटी फंड के खिलाफ एनसीएलटी में चला गया।
इस प्रक्रिया से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा, ‘इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, क्योंकि बार बार कहे जाने के बावजूद फंड भुगतान करने को लेकर बहानेबाजी कर रहा था और कोई पैसा नहीं चुका रहा था। इसलिए रिजोल्यूशन पेशेवर बोली प्रक्रिया रद्द करने और इसे पुन: चालू करने के लिए अदालत चला गया।’
ईएमसी के लिए नई ईओआई 11 मई को आमंत्रित की गई थी।
इस संबंध में अलमास ग्लोबल अपॉच्र्युनिटी फंड को भेजे गए सवालों का जवाब नहीं मिला है।