राज्यों में विदेशी निवेश 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद समान रूप से नहीं पहुंचा। इसका बड़ा हिस्सा कुछ ही राज्यों को मिला। जनवरी 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में आए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) इक्विटी का करीब 82 फीसदी हिस्सा केवल छह राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश (तेलंगाना समेत) में आया।
जब भारत ने एफडीआई और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के लिए अपने दरवाजे खोले, उस समय देश में पूंजी निवेश कम था। यह आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार की एक बड़ी वजह थी। उम्मीद थी कि विदेशी निवेश बढ़ने से पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा और इससे पूरे देश में आर्थिक विकास को गति मिलेगी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एफडीआई में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
भारत में वित्त वर्ष 2021 में शुद्ध एफडीआई का प्रवाह बढ़कर करीब 44 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। वित्त वर्ष 2001 में यह सिर्फ 3.27 अरब डॉलर था यानी इस दौरान इसमें 1,245.56 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद लगातार चार वर्षों तक एफडीआई में गिरावट आई और वित्त वर्ष 2025 में यह घटकर करीब 1 अरब डॉलर रह गया। हालांकि, इसके अगले वित्त वर्ष में यह बढ़कर करीब 7 अरब डॉलर हो गया।
क्षेत्रों की बात करें तो जनवरी 2000 से दिसंबर 2025 के बीच कुल एफडीआई इक्विटी में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 16.37 फीसदी रही। इसके बाद कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की 15.62 फीसदी और कारोबारी (ट्रेडिंग) क्षेत्र की 6.55 फीसदी हिस्सेदारी रही। सेवा क्षेत्र के भीतर वित्तीय सेवाओं को सबसे ज्यादा एफडीआई मिला। राज्यों की बात करें तो जनवरी 2000 से दिसंबर 2025 के बीच सेवा क्षेत्र में आए कुल एफडीआई इक्विटी का 45.22 फीसदी हिस्सा महाराष्ट्र को मिला। वहीं, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर और कारोबारी क्षेत्र में कर्नाटक सबसे आगे रहा।
महाराष्ट्र सबसे आगे
जनवरी 2000 से मार्च 2006 तक कुल एफडीआई इक्विटी निवेश में 24.69 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दिल्ली सबसे आगे थी। इसके बाद महाराष्ट्र शीर्ष पर आ गया। तब से महाराष्ट्र लगभग हर साल सबसे आगे रहा और जनवरी 2000 से मार्च 2026 की पूरी अवधि में उसकी हिस्सेदारी 30 फीसदी से ज्यादा रही। इस दौरान 17.39 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दिल्ली दूसरे स्थान पर रही। महामारी के बाद कर्नाटक और गुजरात की हिस्सेदारी बढ़ी, जबकि दिल्ली की हिस्सेदारी में गिरावट आई।
अक्टूबर 2019 से दिसंबर 2025 के बीच महाराष्ट्र में सबसे बड़ा एफडीआई इक्विटी निवेश सऊदी अरब के सार्वजनिक निवेश कोष (पीआईएफ) ने किया। उसने रिलायंस रिटेल वेंचर्स के जरिए भंडारण और वेयरहाउसिंग कारोबार में 1.29 अरब डॉलर का निवेश किया। कर्नाटक में सबसे ज्यादा 4.03 अरब डॉलर का एफडीआई स्विट्जरलैंड की रॉबर्ट बॉश इंटरनैशनल से आया।
यह निवेश मोटर वाहन के इंजन बनाने के लिए किया गया। गुजरात में गूगल इंटरनैशनल एलएलसी सबसे बड़ा निवेशक रहा। उसने जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड के जरिए आईटी और कंप्यूटर सेवाओं में 4.58 अरब डॉलर का एफडीआई किया। तमिलनाडु में अमेरिका की ब्रिलिएंस टेक्नॉलजीज ने कार्यालय प्रशासनिक सेवाओं के लिए 50 करोड़ डॉलर का एफडीआई किया। इसी तरह, माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी भारतीय सहायक कंपनी के जरिए दिल्ली में 1.4 अरब डॉलर का एफडीआई किया। यह निवेश ग्राहकों को कंप्यूटर सेवाएं देने के लिए किया गया।
अगर राज्यों में जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण और खनन अधिकारों से जुड़ी समस्याओं के कारण कुछ प्रस्तावित निवेश रद्द या रोक नहीं दिए गए होते, तो तस्वीर कुछ अलग हो सकती थी। इनमें ओडिशा की पॉस्को स्टील परियोजना शामिल थी। इससे करीब 12 अरब डॉलर का एफडीआई आने की उम्मीद थी और उस समय इसे सबसे बड़ा विदेशी निवेश सौदा बताया गया था। इसी तरह, फॉक्सकॉन के आईफोन असेंबली संयंत्र से महाराष्ट्र में करीब 5 अरब डॉलर का निवेश आने की उम्मीद थी।
अलग-अलग रुझान
शुरुआत में ऐसा लगता है कि जिन राज्यों में सुधार कम हुए और कारोबार करना आसान होने की रैंकिंग में प्रदर्शन कमजोर रहा, वहां एफडीआई भी कम आया। हालांकि, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों का भी पिछले दशक में अलग-अलग वर्षों में सरकार की ओर से जारी कारोबारी सुगमता (ईओडीबी) रैंकिंग में प्रदर्शन कमजोर रहा था।
मिसाल के तौर पर, दिल्ली और तमिलनाडु 2015, 2016, 2017 और 2019 में शीर्ष 10 राज्यों में जगह नहीं बना सके। वहीं, इन चार वर्षों में महाराष्ट्र और कर्नाटक की सबसे अच्छी रैंक आठवीं रही। इसके विपरीत, आंध्र प्रदेश ने इन चार में से तीन वर्षों में कारोबारी सुगमता रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया, जबकि एक साल वह दूसरे स्थान पर रहा।
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान और तेलंगाना जैसे राज्यों की कारोबारी सुगमता रैंकिंग अपेक्षाकृत बेहतर रही, लेकिन इन राज्यों में एफडीआई का प्रवाह काफी कम रहा। यह रुझान अब भी जारी है। हालांकि, कारोबारी सुगमता की रैंकिंग को सीधे नंबर देने के बजाय अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है।
इनमें सबसे ऊपर ‘सबसे अच्छा प्रदर्शन’, इसके बाद ‘अच्छा प्रदर्शन’, ‘तेजी से सुधार करने वाले’ और ‘सुधार की ओर बढ़ने वाले’ श्रेणियां हैं। एफडीआई के मामले में शीर्ष दो राज्य महाराष्ट्र और दिल्ली कारोबारी सुधार कार्ययोजना (बीआरएपी) की रैंकिंग में अभी भी ‘सुधार की ओर बढ़ने वाली’ श्रेणी में हैं। यह रैंकिंग कारोबार से जुड़े सुधारों के आधार पर राज्यों का आकलन करती है। 2024 की सबसे हालिया रैंकिंग में एफडीआई पाने वाले शीर्ष राज्यों में से कोई भी शीर्ष दो श्रेणियों में नहीं था।
विशेषज्ञों का कहना है कि कारोबारी सुगमता और बीआरएपी की रैंकिंग एफडीआई आने की मुख्य वजह नहीं हैं। एफडीआई का प्रवाह राज्यों के बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों तक पहुंच, आर्थिक समृद्धि और औद्योगिक नेटवर्क की मौजूदगी पर अधिक निर्भर करता है। सामाजिक विकास परिषद (सीएसडी) में विशिष्ट प्रोफेसर विश्वजीत धर कहते हैं कि कारोबारी सुगमता और बीआरएपी की रैंकिंग ज्यादा राजनीतिक प्रकृति की हैं और इनमें पारदर्शिता की कमी है।
उनके मुताबिक, एफडीआई उन राज्यों में जाता है जहां बुनियादी ढांचा बेहतर है, बाजार मजबूत हैं और बंदरगाहों तक अच्छी पहुंच है। उनका कहना है कि उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में बेहतर लॉजिस्टिक सुविधाओं के साथ बंदरगाहों तक पहुंच भी है। वहीं, दिल्ली में बंदरगाह नहीं हैं, लेकिन यहां बेहतर लॉजिस्टिक कनेक्टिविटी और प्रति व्यक्ति आय अधिक है, जिससे निवेशकों को बड़ा बाजार मिलता है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कारोबारी सुगमता को एक सहायक कारक मानते हैं। उनका कहना है कि यह सुगमता सिर्फ निवेश को आकर्षित करने में थोड़ी मदद कर सकता है, लेकिन असली वजह निवेश के अवसर और उद्योगों की मौजूदगी है।
सबनवीस के मुताबिक, वित्तीय क्षेत्र में एफडीआई मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में आता है, जबकि तकनीकी क्षेत्र में दक्षिणी राज्यों को अधिक निवेश मिलता है। उनका कहना है कि जिन राज्यों में उद्योग कम हैं और मजबूत वित्तीय ढांचा नहीं है, वहां एफडीआई आने की संभावना भी कम रहती है।
