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आरटीआई से मनरेगा तक… एम वीरप्पा मोइली ने बताया कौन से सुधार हुए सफल और कहां अब भी बाकी है बड़ी चुनौती

वर्ष 1991 में आर्थिक सुधारों के आगाज के ठीक बाद एम वीरप्पा मोइली ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री का ओहदा संभाला था। वह केंद्र में भी कई मंत्रालयों की बागडोर संभाल चुके हैं जिनमें कॉर्पोरेट मामले, कानून और पेट्रोलियम मंत्रालय शामिल…

M Veerappa Moily

M Veerappa Moily

Last Updated: सितंबर 14, 2026 | 9:11 AM IST

वर्ष 1991 में आर्थिक सुधारों के आगाज के ठीक बाद एम वीरप्पा मोइली ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री का ओहदा संभाला था। वह केंद्र में भी कई मंत्रालयों की बागडोर संभाल चुके हैं जिनमें कॉर्पोरेट मामले, कानून और पेट्रोलियम मंत्रालय शामिल हैं। वर्ष 2005 में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) के प्रमुख के तौर पर उन्होंने शासन-व्यवस्था और प्रशासन का बारीकी से अध्ययन किया और कई बदलाव लाने के सुझाव भी दिए। कुछ सुझाव मान लिए गए तो कुछ नहीं। अर्चिस मोहन और विक्रम गोपाल ने उनका ऑनलाइन माध्यम से साक्षात्कार लिया। इस साक्षात्कार में मोइली ने प्रशासन और शासन-व्यवस्था बेहतर बनाने पर अपने अनुभव साझा किए। बातचीत के खास अंश:

उदारीकरण के ठीक बाद आप कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने थे। राज्यों ने इन सुधारों को किस नजरिये से देखा?

अचानक ऐसा लगा जैसे हमें आजादी मिल गई हो। हम स्वयं को बंधन से खुला महसूस कर रहे थे। पहले राज्यों पर कई तरह की पाबंदियां थीं और हर काम के लिए हमें नई दिल्ली के चक्कर काटने पड़ते थे। पी वी नरसिंह राव बहुत प्रगतिशील प्रधानमंत्री थे। आजकल मुख्यमंत्री अपना मंत्रिमंडल स्वयं नहीं बना सकते। उन्हें दिल्ली जाकर पार्टी आलाकमान के साथ बैठना पड़ता है चाहे वह भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस या मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ही क्यों न हो।

जब मैं मुख्यमंत्री बना तो मैंने राव से पूछा, ‘क्या आप चाहते हैं कि मैं मंत्रालय को मंजूरी दिलाने के लिए दिल्ली आऊं या मैं आगे बढ़ सकता हूं?’ उन्होंने कहा,‘मोइली, मेरी बस एक गुजारिश है। क्या आप एस एम कृष्णा (जो उस समय विधान सभा अध्यक्ष थे) को मंत्री बना सकते हैं?’ मैंने उनसे कहा, ‘मंत्री ही क्यों? मैं उन्हें उप-मुख्यमंत्री बनाऊंगा और उन्हें वह विभाग दूंगा जिसके वह हकदार हैं।’ इस तरह मुख्यमंत्रियों को अधिकार मिलते हैं। मैं एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह काम कर सकता था।

क्या सिविल सेवा में सुधार वर्ष 1991 का एक ऐसा मकसद था जो अधूरा रह गया है?

हां, यह अधूरा रह गया है। भले ही मेरी सिफारिशों के आधार पर कुछ मामूली सुधार किए गए मगर बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि सबसे होनहार लोग इसमें सफल नहीं हो पाते और वे केंद्रीय सेवा में आने से कतराते हैं। मुझे नहीं लगता कि सिविल सेवा को पुरानी और बेकार चीज के नजरिये से देखा जाना चाहिए। उन्हें जीवंत और सक्रिय होना चाहिए और देश की समस्याएं हल करने की कोशिश करनी चाहिए। अभी भी बहुत होनहार लोग हैं मगर वे अलग-थलग काम कर रहे हैं। पहले, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के लोग भी इन पदों के लिए होड़ करते थे। अब वे इसलिए कतराते हैं कि उन्हें पता है कि सिविल सेवा में भ्रष्टाचार बढ़ गया है और उन्हें मंत्रियों की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ेगा। मैंने एक पारदर्शी व्यवस्था तैयार की थी जिससे परीक्षाओं में सबसे अच्छे अधिकारियों को चुना जा सके। अगर मेरे सुझाव लागू किए जाते या आगे भी लागू किए जाएं तो और हमें सिविल सेवा का एक नया रूप देखने को मिलता या मिल सकता है।

एआरसी की रिपोर्ट में आपने बताया था कि कैसे ‘व्हाइटहॉल मॉडल’ अब भी चल रहा है। क्या इसमें कोई बदलाव आया है?

हमने फ्रांस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में उस समय चल रहे प्रशासनिक ढांचों का अध्ययन किया था। हमने प्रशासन और कानून-व्यवस्था के सभी पहलुओं पर गौर किया। एआरसी में मेरी सोच रचनात्मक विनाश की थी यानी पुरानी व्यवस्था जारी रखने से हमारा मकसद पूरा नहीं होगा। उन सुझावों के आधार पर हमने कुछ हद तक प्रयोग भी किए। जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब हमने कई पुरानी व्यवस्थाएं खत्म कर दीं और उनकी जगह नई व्यवस्थाएं लागू कीं। हमने सुझाव दिया था कि विकेंद्रीकरण होना चाहिए और सभी मंत्रालयों को पूरी आजादी मिलनी चाहिए।

एआरसी की एक और रिपोर्ट वित्तीय प्रबंधन प्रणाली मजबूत करने पर थी। सरकारी आंकड़ों पर हाल ही में हुए विवाद पर आपकी क्या राय है?
देश में जीडीपी के आंकड़े निकालने की एक खास प्रणाली थी। मुझे लगता है कि अभी विश्वसनीयता की काफी कमी है।

एआरसी ने स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने के सिद्धांत पर जोर दिया था। लगभग दो दशक बाद भी राज्य उनके पास पर्याप्त अधिकार नहीं होने की बात कह रहे हैं। क्या अधिकारों का हस्तांतरण उस हद तक हुआ है जैसा आपने सोचा था?

अभी केंद्रीय व्यवस्था की तरफ झुकाव अधिक है। एआरसी में मेरा नजरिया दुनिया भर की प्रणालियों के अध्ययन पर आधारित था। केंद्रीय व्यवस्था या से देश सामाजिक या आर्थिक रूप से आगे नहीं बढ़ेगा। हमने ‘नियोजन’ और ‘गैर-नियोजन’ कार्यक्रम छोड़ दिया है। हमने योजना आयोग खत्म कर दिया क्योंकि ऐसा माना जाता था कि इससे केंद्रीकरण बढ़ रहा है। हमने तय किया कि नियोजन की जरूरत नहीं है। मगर हमने नीति आयोग बनाया। जब हमने योजना आयोग खत्म किया तो कोई ऐसी समानांतर संस्था बनाने का कोई मतलब नहीं था जो आखिर में उसी (योजना आयोग) की तरह ही काम करे। इससे कोई फायदा नहीं होगा। राज्यों को अधिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए क्योंकि आखिर में काम उन्हीं को करना है। केंद्र सरकार सीधे तौर पर काम नहीं कर सकती।

आपने अंतर-राज्य परिषद मजबूत करने की सिफारिश की थी। मगर काफी समय से इसकी पूरी बैठक नहीं हुई है। इस पर आपकी क्या राय है?

मैंने सुझाव दिया था कि यह संस्था केवल दिखावे के लिए नहीं होनी चाहिए। इसकी कार्य योजना तय होनी चाहिए और इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। अगर यह अपना मकसद पूरा नहीं कर पा रही है तो इसे बंद कर देना चाहिए मगर राज्यों के बीच ऐसे कई मुद्दे हैं जिन्हें ठोस बातचीत से सुलझाया जा सकता है। आजकल बातचीत केवल पानी के बंटवारे के विवादों तक ही सीमित रहती है। कभी-कभी उस पर भी कोई निर्णय नहीं हो पाता। मुझे लगता है कि इसे एक ऐसी ठोस संस्था के तौर पर फिर से तैयार किया जाना चाहिए जो अपने फैसले लागू कर सके। अभी तो यह बस दिखावे की चीज बनकर रह गई है।

कंपनी अधिनियम, 2013 में हुए बदलावों पर क्या कहेंगे?

कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय का कार्यभार संभालने (वर्ष 2011) से पहले उद्योगपति जे जे ईरानी ने कंपनी कानून पर एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट सौंपी थी। मैंने उन्हें बुलाया और कहा कि 50 वर्ष पुराने कंपनी अधिनियम में मामूली बदलाव से काम नहीं चलेगा क्योंकि हालात तेजी से बदले हैं। जब मनमोहन सिंह ने वर्ष1991 में ही अर्थव्यवस्था खोल दी थी तो हमें भी सब कुछ उदार बनाना चाहिए था। इसी सोच के साथ कंपनी अधिनियम, 2013 अस्तित्व में आया। दुनिया भर में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) कंपनियों की मनमर्जी पर आधारित नहीं होती थी। मैं चाहता था कि 500 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार करने वाली कंपनियां अपने मुनाफे का 2 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक उद्देश्यों के लिए अलग रखें। मनमोहन सिंह ने मुझसे पूछा कि क्या कंपनियां इसका विरोध करेंगी। मैंने बातचीत की और बिड़ला और रतन टाटा जैसे सभी बड़े उद्योगपतियों को साथ लिया। आखिरकार, वे सहमत हो गए।

कुछ विरोध तो हुआ ही होगा। आपने उन्हें कैसे मनाया?

मैंने कहा कि हमारा एक सामाजिक उद्देश्य है और विकास सिर्फ एक ही दिशा में नहीं हो सकता। हमें सर्वांगीण विकास की दरकार है। इससे कारोबार को भी लाभ होगा। उन्हें एहसास हुआ कि इससे उन्हें भी फायदा होता है। उन्होंने इसकी तारीफ की। मुझे नहीं लगता कि कोई विरोध हुआ था।

जब आप मुख्यमंत्री थे तब आपने छह विश्वविद्यालय स्थापित किए थे मगर उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण था संयुक्त प्रवेश परीक्षा (सीईटी)। छात्रों में मौजूदा असंतोष को आप कैसे देखते हैं?

मुख्यमंत्री के तौर पर मैंने सबसे पहले कैपिटेशन फीस (अतिरिक्त शुल्क) खत्म करने को एक मिशन के तौर पर लिया क्योंकि केवल अमीर लोग ही डॉक्टर बन पाते थे। पूरी व्यवस्था पारदर्शी नहीं थी। मैंने सीईटी शुरू किया जिसके जरिये केवल योग्य छात्र ही दाखिला ले सकते थे। आज भी सीईटी में पर्चा लीक नहीं होता क्योंकि यह पूरी तरह सुरक्षित व्यवस्था है जिसे ऐसी तकनीक से बनाया गया है कि कोई शिकायत नहीं कर सकता। राष्ट्रीय पात्रता सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें 12वीं कक्षा के अंक पर विचार नहीं होता। इसका मतलब है कि 12वीं में 45 प्रतिशत अंक लाने वाले भी डॉक्टर बन सकते हैं।

एआरसी की पहली दो रिपोर्ट सूचना का अधिकार (आरटीआई) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के बारे में थीं। 20 वर्ष बाद आप इसके नतीजों का मूल्यांकन कैसे करते हैं?

आरटीआई अब केवल कागजों तक सीमित कानून बनकर रह गया है। इसका गलत इस्तेमाल हुआ है। यह एक ऐसी प्रणाली है जिसका इस्तेमाल देश से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए किया जाना चाहिए था। यह ऐसा करने का सबसे मजबूत हथियार है। भ्रष्टाचार राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर एक गंभीर बीमारी की तरह पांव पसार चुका है। जहां तक मनरेगा की बात है तो यह जरूर सफल रहा, भले ही लोगों ने इसका मजाक उड़ाया था। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसका मजाक उड़ाया था। मगर बाद में उन्होंने अपनी राय बदल ली। यह एक पारदर्शी प्रणाली थी और हमने अपनी एआरसी रिपोर्ट में इसे लागू करने के तरीके बताए थे। अब भी मनरेगा वापस शुरू की जा सकती है। अधिक देर नहीं हुई है।

एआरसी ने ई-गवर्नेंस पर बहुत जोर दिया था। क्या यह उसी तरह काम कर रहा है जैसा आपने तब सोचा था?

यह प्रशासनिक कामकाज का मुख्य आधार है। तकनीक के विकास के साथ इसके अधिक से अधिक इस्तेमाल शासन-व्यवस्था मजबूत होगी। ई-गवर्नेंस भ्रष्टाचार और देरी खत्म करने का एक और बहुत ठोस जरिया है।

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