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विकसित भारत का रोडमैप: प्रो. महेंद्र देव ने BS ‘मंथन’ में बताया कैसे 3 बड़े लक्ष्यों से बदलेगी देश की तस्वीर

प्रो. देव ने 2047 तक विकसित भारत के लिए आय में बढ़ोतरी, समावेशी रोजगार और 2070 नेट जीरो का विजन रखा, साथ ही टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और कृषि विविधीकरण पर जोर दिया

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रिमझिम सिंह   
Last Updated- February 24, 2026 | 8:04 PM IST

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन प्रोफेसर एस महेंद्र देव ने मंगलवार को साफ कहा कि भारत 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। उन्होंने ग्रोथ, समावेश और स्थिरता को लेकर तीन सूत्री विकास विजन पेश किया। ये बातें उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड के फ्लैगशिप इवेंट BS ‘मंथम’ में ‘रिफॉर्म्स एजेंडा’ थीम कहीं। यह कार्यक्रम नई दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहा है।

2047 तक के तीन मुख्य विकास लक्ष्य

प्रो देव ने बताया कि 2047 तक देश के सामने तीन बड़े लक्ष्य हैं। सबसे पहला लक्ष्य है प्रति व्यक्ति आय को काफी ऊंचा उठाना। इसके लिए निर्यात पर जोर, नई टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, प्रोडक्टिविटी बढ़ाना, टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी सुधारना और ह्यूमन कैपिटल को मजबूत करना जरूरी है। साथ ही महिला श्रम बल में भागीदारी भी बढ़ानी होगी।

उन्होंने कहा, “भारत में महिला भागीदारी दर अभी करीब 35 प्रतिशत है। दुनिया का औसत 50 प्रतिशत है, इसलिए हमें उस स्तर तक पहुंचना है।”

प्रो देव ने यह भी जोड़ा कि डिजिटलाइजेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी टेक्नोलॉजी से प्रोडक्टिविटी और कुल विकास दोनों को बढ़ावा मिल सकता है।

दूसरा लक्ष्य है समावेश, यानी गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करना। स्वतंत्रता के बाद से दो बड़ी संरचनात्मक समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। पहली है मजदूर-केंद्रित मैन्युफैक्चरिंग की कमी और दूसरी स्वास्थ्य व शिक्षा क्षेत्र में कमजोरी।

तीसरा लक्ष्य है 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करना। प्रो देव ने कहा कि ये तीनों लक्ष्य साथ-साथ चलेंगे तो ही भारत 2047 का सपना पूरा हो सकेगा।

2014 से सुधारों ने रखी मजबूत नींव

प्रो महेंद्र देव ने कहा कि 2014 के बाद हुए सुधारों ने देश में संरचनात्मक बदलाव लाया है जो विकसित अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव तैयार कर रहा है। इनमें सबसे अहम रहा वित्तीय सुधार।

RBI ने बैंकिंग सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट दिया। हाल में साइन हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स ने विदेशी बाजारों तक पहुंच आसान की है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि अब राज्य स्तर पर भी सुधारों की जरूरत है और अलग-अलग नीतियों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। कैपिटल एक्सपेंडिचर से इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, टैक्स सुधार और GST से खपत बढ़ रही है और बाजार ज्यादा कुशल हो रहा है। फाइनेंशियल सेक्टर के सुधारों से क्रेडिट का फ्लो भी बढ़ा है।

प्रो देव ने साफ कहा, “सभी सुधारों में एक-दूसरे से तालमेल है।”

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वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की तैयारी

वैश्विक माहौल की अनिश्चितता पर बात करते हुए प्रो देव ने कहा कि भारत घरेलू स्तर पर किसी भी ग्लोबल झटके से निपटने को तैयार है। उन्होंने कहा, “आत्मनिर्भर भारत हमारा ग्लोबल तूफान का जवाब है।”

अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि अब ग्लोबल ट्रेड ज्यादा जियोपॉलिटिकल हो गया है। उन्होंने कहा, “अमेरिका के बारे में चीजें अभी साफ नहीं हैं। ग्लोबल ट्रेड जियोपॉलिटिकल हो चुका है। इसलिए आगे अनिश्चितता रहेगी और हमें इसके लिए तैयार रहना होगा।”

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और डिरेगुलेशन को लगातार सुधारने की प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा कि यह काम कभी रुकना नहीं चाहिए।

शिक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और कृषि में नई दिशा

शिक्षा के बारे में प्रो देव ने बताया कि नामांकन लगातार बढ़ रहे हैं और ज्यादा लड़कियां स्कूलों और कॉलेजों में आ रही हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि शहरी परिषदों को और ज्यादा अधिकार दिए जाने की जरूरत है।

मैन्युफैक्चरिंग को लेकर उठ रही चिंताओं का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “मैन्युफैक्चरिंग स्थिर नहीं है।” पिछले दस सालों में रियल टर्म्स में वैल्यू ऐडेड 75 प्रतिशत बढ़ा है। शेयर इसलिए नहीं बढ़ा क्योंकि सर्विसेज सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

राज्यों में प्राइवेट कैपिटल और फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट भी आ रहा है। उन्होंने दोनों क्षेत्रों के बीच के कनेक्शन पर जोर देते हुए कहा कि मैन्युफैक्चरिंग के लिए सर्विसेज बहुत जरूरी हैं।

कृषि क्षेत्र पर बात करते हुए प्रो देव ने कहा कि पिछले दशक में यह सेक्टर अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन अभी भी चावल, गेहूं और गन्ने पर ज्यादा फोकस है जो कुल पानी का करीब 80 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं। फसल पैटर्न को विविध बनाने के प्रयास चल रहे हैं।

पोस्ट-हार्वेस्ट गतिविधियों जैसे वेयरहाउसिंग पर ध्यान देने की जरूरत बताई। छोटे और सीमांत किसानों को फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशंस और कोऑपरेटिव्स से जोड़ना जरूरी है। किसान अब डिजिटल टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, जो खेती को और बेहतर बना रहा है।

 

First Published : February 24, 2026 | 8:01 PM IST