प्रतीकात्मक तस्वीर
जरूरी नहीं कि फर्जीवाड़ा करने वाला व्यक्ति बाहरी हो। अंदर का कोई व्यक्ति भी ऐसी वारदात को अंजाम दे सकता है। उसके पास बैंकिंग तंत्र में सेंध लगाने की चाबी (लॉगिन पासवर्ड), एक पद और संस्थान में काम करने का वर्षों का तजुर्बा होता है। कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (सीबीएस) प्रणाली आने के बाद हर शाखा में अब डिजिटल लेनदेन होते हैं। इससे अंदर बैठे शख्स को जालसाजी करने के लिए एक अदृश्य हथियार हाथ लग जाता है यानी खाते से पैसे निकालना, पिछली तारीख की प्रविष्टि (एंट्री) करना, सस्पेंस अकाउंट (एक अस्थायी खाता जिसका इस्तेमाल उस स्थिति में होता है जब किसी लेनदेन की सही जानकारी न हो) में रकम डालना, ग्राहकों के निष्क्रिय खाते चालू चालू करना और रिश्तेदारों के या ‘म्यूल अकाउंट’ (धोखाधड़ी के लिए इस्तेमाल होने वाले खाते) में पैसे भेजना।
फर्जीवाड़ा करने वाला गतिविधियों की रिपोर्ट देर से तैयार होने और इसके तैयार होने के तुरंत बाद प्रविष्टि की जांच करने के लिए कर्मचारियों की कमी का फायदा उठाता है। डेटा की भरमार के बीच बिना मशीन या तकनीक की मदद से विश्लेषण करना और नुकसान का पता लगाना आसान नहीं है।
असल में बैंक इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं। बैंक कर्मचारियों से जुड़े फर्जीवाड़े के मामले वित्त वर्ष 2021 में 2,624 से घटकर वित्त वर्ष 2025 में 1,935 और वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 400 रह गए हैं। कर्मचारियों द्वारा की जाने वाली धोखाधड़ी कुल मामलों का सिर्फ 8 फीसदी हैं मगर इनसे बड़ी रकम की हेराफेरी होने का अनुमान है। मामले इसलिए कम हुए हैं क्योंकि मौजूदा नियंत्रण ठीक काम कर रहे हैं। मगर अभी और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
सीबीएस तकनीक हाथों से होने वाले कार्यों में गलतियां खत्म करती है और वास्तविक समय में किसी खास शाखा से बंधे बिना प्रक्रिया पूरी करना संभव बनाती है। यह दोनों ही मामलों में सफल रही है। मगर वही ढांचा जो ग्राहक को किसी भी शाखा से लेनदेन की सुविधा देता है, वह इस प्रणाली तक पहुंच रखने वाले बैंक कर्मचारी को कई खातों से पैसे निकालने, किसी दूसरे बैंक के खाते में रकम जमा करने और उस पैसे को म्यूल अकाउंट या रिश्तेदारों के खातों में भेजने की सुविधा भी देता है। एक बार कोई फर्जीवाड़ा होने पर पैसे की वसूली मुश्किल हो जाती है।
सबसे खतरनाक तरीका ‘वैल्यू डेटिंग’ का गलत इस्तेमाल करना है। वैल्यू डेटिंग वह सिद्धांत है जिसके तहत ब्याज प्रविष्टि (क्रेडिट एंट्री) की तारीख से मिलता है न कि असल लेनदेन की तारीख से। कोई कर्मचारी पिछली तारीख से क्रेडिट एंट्री कर सकता है, एंट्री बनने की तारीख पर उसका निपटान कर सकता है, प्रणाली को बीच की अवधि के ब्याज की गणना और रकम खाते में जोड़ने दे सकता है और फिर मूल रकम पलट (रिवर्स) सकता है जबकि पहले से क्रेडिट हो चुके ब्याज को वैसे ही रहने देता है। चूंकि, हर डेबिट के बदले उसी दिन रकम घटा दी जाती है इसलिए यह नियमित अपवाद पकड़ में नहीं आता और नुकसान चुपचाप वर्षों तक बढ़ता रहता है।
अंतर-शाखा कार्यालय और सस्पेंस अकाउंट का भी गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। बैंकों को सालाना जांच (ऑडिट) के बजाय ‘डेटा + व्यवहार + नियंत्रण’ वाला ढांचा अपनाना चाहिए जो वास्तविक समय में काम करे क्योंकि कर्मचारियों की धोखाधड़ी को पकड़ना मुश्किल होता है।
निम्नलिखित गतिविधियों पर खास तौर से ध्यान दिया जा सकता है :
एक ही बायोमेट्रिक पहचान को एक लेनदेन के लिए ‘मेकर’ और ‘चेकर’ दोनों की भूमिका निभाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अगर किसी आईडी का इस्तेमाल न हो रहा हो तो उसे तय समय (जैसे 15 मिनट) से अधिक देर तक सक्रिय नहीं रहने देना चाहिए।
बैंक कर्मचारियों की असामान्य गतिविधियों पर भी नजर रखी जानी चाहिए। यानी उसके रहन-सहन के ढंग और आय में भारी अंतर दिखे तो संबंधित बैंक को सतर्क हो जाना चाहिए।
जब कोई कर्मचारी वर्षों तक छुट्टी नहीं लेता या स्थानांतरण का विरोध करता है और हर दिन देर तक काम करता है तो दाल में कुछ काला हो सकता है।
धोखाधड़ी का जल्द पता लगाने के लिए ढांचागत नियंत्रण में ‘फोर-आई प्रिंसिपल’ को अपनाना जा सकता है। यह एक संचालन और जोखिम प्रबंधन का जरिया है जिसके तहत किसी अहम काम, निर्णय या लेनदेन लागू होने से पहले कम से कम दो अलग-अलग, अधिकृत लोगों द्वारा उसकी समीक्षा करना और फिर मंजूरी देना जरूरी होता है। कोई भी अकेला कर्मचारी स्वयं खाते नहीं खोल सकता, ऋण नहीं दे सकता या आरटीजीएस अंतरण नहीं कर सकता।
आमतौर पर वरिष्ठ नागरिक का बैंकों की शाखाओं में संपर्क के लिए एक ही भरोसेमंद व्यक्ति होता है। बैंकों को ऐसे ग्राहकों को कई कर्मचारियों से बातचीत करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। मृत व्यक्ति के अकाउंट को संभालने की प्रक्रिया में भी इसी तरह की सख्ती की रूरत है। ग्राहक और शाखा के बीच भौतिक दूरी होने पर जैसे कि एनआरआई खातों की सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत की जरूरत होती है। ऐसे खातों के बदले किसी भी ऋण या लियन (रकम निकालने या भेजने पर रोक) से जुड़ी प्रक्रिया की अनुमति देने से पहले लार्ज लैंग्वेज मॉडल-आधारित डॉक्यूमेंट ऑथेंटिकेशन टूल के जरिये स्कैन किए गए दस्तावेज का सत्यापन जरूरी होना चाहिए।
भारतीय बैंकों के सतर्कता विभाग में निगरानी के लिए एआई या मशीन लर्निंग मॉडल का इस्तेमाल सीमित है। ऐसी ज्यादातर गतिविधियां किसी शिकायत या नुकसान के बाद ही शुरू होती हैं। अगर कर्मचारियों द्वारा किए गए फर्जीवाड़े से जुड़े पूरे बैंकिंग उद्योग के आंकड़े एकत्र किए जाएं और इनका विश्लेषण हो तो एआई प्रणाली अलग-अलग कर्मचारियों की भूमिकाओं का अध्ययन कर समय के साथ उनमें बदलाव का पता लगा सकती हैं। इससे और नुकसान होने के बाद कदम उठाने के बजाय नुकसान होने से पहले ही प्रशासनिक और निगरानी कार्यालय को सावधान किया जा सकता है।
कर्मचारियों के व्यवहार के ढर्रे के बारे में संस्थागत जानकारी लगातार बदलती रहती है। नए और तकनीक की अच्छी समझ रखने वाले कर्मचारी बैंकिंग प्रणाली के कार्य करने के तरीके और उसकी कमजोरियों को अच्छी तरह समझते हैं।
फोरेंसिक जांच और नीति से जुड़े कदमों की आड़ में एक सवाल है जो भारत का बैंकिंग क्षेत्र आज स्वयं खुद से पूछ रहा है। वह सवाल यह है कि क्या सीमित वेतन, महंगी जीवन-शैली की लगती आदत और एल्गोरिद्म आधारित बेटिंग प्लेटफॉर्म जैसे माहौल में दूसरों के पैसे के साथ रोजाना काम करने से कुछ बैंकरों की नैतिकता का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है?
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)