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टाटा और भारत का रहा है ऐतिहासिक जुड़ाव, लेकिन अभी ग्रुप के सामने मूल्यों की सबसे बड़ी परीक्षा

टाटा समूह का इतिहास भारत के राष्ट्र निर्माण से जुड़ा है। मौजूदा वित्तीय और व्यावसायिक चुनौतियों के बीच टाटा संस को अपने मूल मूल्यों पर दोबारा लौटने की सख्त जरूरत है

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अरुण मायरा   
Last Updated- September 08, 2026 | 9:34 PM IST

टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन द्वारा तीसरे कार्यकाल के लिए पुन: नियुक्ति से खुद को अलग रखने फैसले के पीछे की वजह टाटा संस के बोर्ड में व्यक्तित्वों के बीच कोई टकराव या टाटा समूह पर नियंत्रण की कोई होड़ नहीं हैं। इसके मूल कारण कहीं अधिक गहरे हैं। वे उन उद्देश्यों से टाटा समूह के भटकाव में निहित हैं जिनके लिए इसकी स्थापना की गई थी। इसकी कारोबारी प्रकृति में आए परिवर्तन भी इसकी वजह हैं। 

महात्मा गांधी ने कहा था कि जब वह भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब जमशेदजी टाटा और उनके बेटे भारत की आर्थिक स्वतंत्रता की नींव तैयार कर रहे थे। वे भारतीय उद्योग के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा और उत्पादन क्षमता खड़ी करने का कठिन काम कर रहे थे। 1907 में स्थापित टाटा आयरन ऐंड स्टील कंपनी ने देश में ही खनन किए गए लौह अयस्क से इस्पात का उत्पादन किया। ब्रिटिश सरकार द्वारा उसके रास्ते में खड़ी की गई अनेक बाधाओं के बावजूद कंपनी ने अपना काम जारी रखा। 

टाटा परिवार ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस को बढ़ावा दिया जिसकी स्थापना 1909 में बेंगलूरु में हुई। इसी तरह 1910 में स्थापित टाटा हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी ने बंबई के कपड़ा उद्योग को स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराई। यह उद्योग भारत में पैदा होने वाली कपास को कपड़े में बदलकर देश के लोगों की जरूरतें पूरी करता था। टाटा इंजीनियरिंग ऐंड लोकोमोटिव कंपनी (जिसे अब टाटा मोटर्स के नाम से जाना जाता है) की स्थापना 1945 में हुई थी। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाले पहिये दिए।

शुरुआत में यह कंपनी भारतीय रेलवे के लिए लोकोमोटिव यानी रेल इंजन बनाती थी। 1954 में इसने अपने कारोबार में विविधता लाई और आगे चलकर देश की सबसे बड़ी ट्रक और बस निर्माता कंपनी बन गई। इसने ऑटोमोबाइल कलपुर्जों के स्वदेशी निर्माताओं का एक मजबूत और व्यापक आधार भी तैयार किया। बाद में इसी आधार ने मारुति को बड़े पैमाने पर कारों का उत्पादन शुरू करने में मदद की। 1990 के दशक में जब उदारीकरण आया तब भारतीय वाहन कलपुर्जा निर्माता भारत में बने कलपुर्जों का निर्यात अमेरिका और यूरोप की वाहन कंपनियों को करने लगे।

टाटा समूह का उद्देश्य भारतीय उद्योगों को मजबूत और ठोस नींव पर खड़ा करना था। टाटा की कंपनियों ने दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ अपना निर्माण किया। उन्होंने अपना मानव संसाधन भी स्वयं विकसित किया। कुशल कामगारों को प्रशिक्षित किया और इंजीनियरों की ऐसी पीढ़ियां तैयार कीं जिनमें से कई आगे चलकर सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की अन्य कंपनियों में प्रबंधक बने। 

जब आयात के लिए विदेशी मुद्रा उपलब्ध नहीं होती थी तब टाटा की कंपनियां अपनी मशीनें और उपकरण भी स्वयं तैयार करती थीं। टाटा के नेतृत्व की यह समझ थी कि विनिर्माण तकनीक केवल ज्ञान या प्रक्रियाओं में नहीं, बल्कि उत्पादन के लिए जरूरी मशीनों, डाई और औजारों में भी अंतर्निहित होती है। वे यह भी समझते थे कि औद्योगिक शोध एवं विकास का वास्तविक आधार उत्पादन उपकरणों के डिजाइन और विकास में निहित है। यही क्षमता किसी कंपनी को लंबे समय तक टिकाऊ प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान कर सकती है।

टाटा समूह की स्थापना और उसका निर्माण एक औद्योगिक उद्यम के रूप में हुआ था न कि एक वित्तीय साम्राज्य के रूप में। 1938 से 1991 तक समूह के चेयरमैन रहे जेआरडी टाटा ने कहा था कि जब भी उन्हें कोई कठिन निर्णय लेना होता था तो वे खुद से पूछते थे-भारत के लिए क्या अच्छा होगा और टाटा समूह के लिए क्या अच्छा होगा?

यदि उन्हें किसी बात को लेकर संदेह होता तो वह भारत के पक्ष में फैसला करते थे। उनका कहना था कि दीर्घकाल में यह फैसला टाटा समूह के लिए भी अच्छा साबित होगा। टाटा समूह अपने मूल्यों में देश की जरूरतों को भी शामिल करता रहा। शेयर बाजार में कंपनियों का मूल्यांकन हमेशा दूसरे पायदान पर आता था हालांकि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। टाटा समूह की औद्योगिक नींव का कमजोर होना 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, वित्तीय बाजारों के वैश्वीकरण और औद्योगिक नीति को छोड़ देने के साथ शुरू हुआ। 

इसके अलावा, डिजिटल तकनीक के विकास के साथ ‘तकनीक’ की अवधारणा का हार्डवेयर और विनिर्माण से संबंध भी धीरे-धीरे टूट गया। किसी भी समस्या को हल करने के लिए अधिक तकनीक का अर्थ अधिक डिजिटल तकनीक हो गया। नवाचार का अर्थ भी तेज सेवाएं उपलब्ध कराने वाले नए डिजिटल ऐप्स बनाना हो गया।

उद्यमियों के प्रदर्शन को अब इस आधार पर मापा जाता है कि उनके उद्यमों का शेयर बाजार मूल्यांकन कितना है और वे कितनी तेजी से अरबपति बन सकते हैं, न कि इस आधार पर कि वे सबसे गरीब लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए क्या करते हैं।

भारत अब अपने विदेशी व्यापार के संतुलन के लिए भारतीय श्रम और प्रतिभा के निर्यात, विदेशों में रहने वाले भारतीयों से मिलने वाले धन और भारत से सॉफ्टवेयर सेवाओं के निर्यात पर निर्भर नहीं रह सकता। व्यापार संतुलित करने और भारत में रोजगार पैदा करने के लिए भारत में बने और भारतीयों द्वारा निर्मित भारतीय उत्पाद जरूरी हैं। भारत को अब ऐसे भारतीय उद्योग-निर्माताओं की जरूरत है, जो भारत का निर्माण करें-भारत के लिए निर्माण करके और भारत में निर्माण करके।

भारत की समस्याओं और टाटा समूह की समस्याओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में एक प्रमुख निवेशक है और अपने परोपकारी कार्यों के लिए टाटा संस से होने वाली आय पर निर्भर है, भविष्य में होने वाली अपनी आय को लेकर अनिश्चितता से चिंतित है।

टाटा संस इस समय वित्तीय दबाव का सामना कर रही है। एअर इंडिया जिसे जेआरडी टाटा ने 1932 में एक बिल्कुल अलग दौर में स्थापित किया था उसे गहरे वित्तीय संकट से निकालने और उसकी सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए समूह ने 2022 में सरकार से दोबारा अपने नियंत्रण में लिया था। अब एअर इंडिया टाटा संस के संसाधनों पर दबाव डाल रही है। यही स्थिति टाटा डिजिटल और उसके नए डिजिटल ऐप टाटा न्यू की भी है।

इसके अलावा, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) जो भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर सेवा निर्यातक कंपनी और टाटा संस के लिए सबसे अधिक नकदी पैदा करने वाला कारोबार थी, वह अब एआई के कारण सॉफ्टवेयर उद्योग में पैदा हुई उथल-पुथल की चपेट में आ रही है। ये सभी ऐसे कारोबार हैं जिनकी देखरेख चंद्रशेखरन ने की थी। इसलिए उन्हें टाटा ट्रस्ट्स के सवालों और विरोध का सामना करना पड़ा। 

टाटा संस के बोर्ड को अगले कुछ महीनों में चंद्रशेखरन के स्थान पर नया चेयरमैन नियुक्त करना होगा। लेकिन बोर्ड को शुरुआत कुछ बुनियादी और गहरे सवालों से करनी चाहिए।

टाटा संस एक परोपकारी संस्था है, एक निवेश प्रबंधक है या उद्योगों का निर्माण करने वाला उद्यम? टाटा समूह के अस्तित्व के उद्देश्य को पूरा करने के लिए अब टाटा संस का संचालन किस तरह किया जाना चाहिए? टाटा संस के कॉरपोरेट गवर्नेंस की गुणवत्ता को शेयर बाजार में उसके मूल्यांकन से मापा जाना चाहिए, या राष्ट्र की सेवा और सभी हितधारकों के साथ निष्पक्षता के टाटा मूल्यों के पालन से?

अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए टाटा संस के बोर्ड में अब किन क्षमताओं और विशेषज्ञताओं की जरूरत है? और आखिर में, टाटा संस के चेयरमैन के पास किस तरह का अनुभव और कौन-सी क्षमताएं होनी चाहिए? तथा वह किन मूल्यों से निर्देशित होगा या होगी?

First Published : September 8, 2026 | 9:11 PM IST