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दिल्ली से सीखें सबक: नए शहरों को ‘अराजकता’ से बचाने के लिए प्रबंधन जरूरी है, लोकलुभावनवाद नहीं

दिल्ली की चरमराती व्यवस्था से सबक लेकर हमें नए शहरों के नियोजन में पारदर्शी गवर्नेंस, किफायती आवास और मजबूत सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देनी होगी

Published by
सुनीता नारायण   
Last Updated- March 08, 2026 | 10:18 PM IST

मुझे अपनी दिल्ली के लिए रोना आ रहा है। यह मेरा शहर है जहां मेरे परिवार की कई पीढ़ियां रह चुकी हैं। मैंने यहां अपने पेशेवर जीवन का अधिकांश समय स्वच्छ हवा, पानी और बुनियादी जीवनयापन के लिए आवश्यक हर चीज की वकालत करते हुए बिताया है। 

आज हर जगह कूड़ा-कचरा है, सड़कों पर गड्ढे हैं, यातायात व्यवस्था बिल्कुल नहीं है, जाम लगता है, अवैध इमारतें बनी हुई हैं और पार्किंग की समस्या है, जिससे सड़क प्रबंधन की व्यवस्था और भी खराब हो जाती है। पानी की आपूर्ति मांग के हिसाब से कम पड़ रही है, यमुना नदी उपेक्षित हो गई है और उसमें बड़ी मात्रा में सीवेज का पानी मिल रहा है। और हां, दिल्ली अब तो सांस लेने लायक भी नहीं रही। मैं और भी बहुत कुछ बता सकती हूं, लेकिन दिल्ली के सभी निवासी तो जानते ही हैं कि हम किस स्थिति से गुजर रहे हैं। 

इसलिए, हमें यह सवाल पूछना होगा कि क्या शहरी सेवाओं की खामियों को सुधारा जा सकता है, या क्या यह समस्या बहुत बढ़ चुकी है? मैं यह सवाल बुनियादी ढांचे के पतन पर शिकायत के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए पूछ रही हूं कि हम इस अनुभव से सीखें और भारत में एक और दिल्ली जैसी स्थिति न पैदा करें। दूसरे शब्दों में, हम यह सुनिश्चित करें कि मध्य भारत के शहर बढ़ते-बढ़ते बड़े पैमाने पर अव्यवस्था का शिकार न बन जाएं, यहां तक कि चरमरा न जाएं। 

यह महत्त्वपूर्ण है। हम जानते हैं कि शहरीकरण से उच्च पदों की नौकरियों को बढ़ावा मिलेगा। पश्चिमी देशों में आप्रवासन के दबाव के कारण भारत में युवा, कुशल कामगारों के लिए फलने-फूलने के अपार अवसर हैं। लेकिन उन्हें केवल धन से कहीं अधिक की आवश्यकता है। उन्हें अपने और अपने बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण जीवन की आवश्यकता है। यह केवल मॉल, रेस्तरां और नाइटलाइफ की बात नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतों की बात है जैसे स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, शिक्षा और आवास जिनकी बदौलत प्रतिभा को आकर्षित किया और उन्हें बनाए रखा जा सकता है। यह रहने लायक शहरों की बात है। 

इस योजना को सफल बनाने के लिए हमें यह समझना होगा कि क्या नहीं करना चाहिए। शहरों के जनसंख्या आंकड़े पुराने हो चुके हैं, और योजना अभी भी 2011 की जनगणना पर आधारित है। फिर भी, हम शहरों के अपने बाहरी क्षेत्रों में विस्तार के कारण होने वाले पतन को देख सकते हैं। वर्ष 1990 के दशक में दिल्ली के बाहरी इलाके में गुरुग्राम विकसित होना शुरू हुआ। आज, शहरी विस्तार मीलों तक अगल-बगल फैल रहा है और हर दिन बढ़ता जा रहा है। छोटे कस्बे बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन बिना योजना या सुविधाओं के। यही असली चुनौती है।

क्या किया जाना चाहिए? सबसे पहले शहरों को केवल सड़कों की ही नहीं, बल्कि आवागमन की भी योजना बनानी चाहिए। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लोगों का आवागमन किफायती आवास और आजीविका से जुड़ा हुआ है। जैसे-जैसे शहर बढ़ते हैं और जमीन की कीमतें बढ़ती हैं, कई लोग मकान खरीदने में असमर्थ हो जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि गरीब लोग, जो शहर के सेवा क्षेत्र के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, उन क्षेत्रों में रहने की तलाश करते हैं जिन्हें अवैध क्षेत्र या झुग्गी-झोपड़ी कहा जाता है। त्रासदी यह है कि कई मामलों में ये जमीन शहर के पर्यावरण के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं, जैसे कि हरित क्षेत्र या जल निकायों के संग्रहण क्षेत्र।

शहर के बाहरी इलाकों से, जहां आवास सस्ता हो सकता है, आवागमन या तो संभव नहीं होता या पहुंच से बाहर होता है। मध्यम वर्ग भी निजी परिवहन पर निर्भर होकर शहर से बाहर की ओर पलायन करता है, जिससे भीड़भाड़ और बढ़ जाती है। शहर को हर तरह से नुकसान होता है।

जैसे-जैसे शहर बढ़ते हैं, नियोजन का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक, उसकी रीढ़ माने जाने वाला परिवहन होना चाहिए  ताकि बाहरी क्षेत्रों को जोड़ा जा सके और शहर के भीतर आवागमन सुगम हो सके। लोग पैदल चल सकें, साइकल चला सकें, बसों या मेट्रो का उपयोग कर सकें और केवल आवश्यकता पड़ने पर ही कार का इस्तेमाल करें। एक आधुनिक शहर दिल्ली या बेंगलूरु जैसे जाम से ग्रस्त शहरों जैसा नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा और स्वच्छ जल तक अन्य बुनियादी सेवाओं की भी आवश्यकता है। ये सभी चीजें शहर के जीवन स्तर को बेहतर बनाएंगी।

लेकिन मास्टर प्लान का क्रियान्वयन सबसे महत्त्वपूर्ण है। दिल्ली का मास्टर प्लान पुराना हो चुका है और उससे भी बुरी बात यह है कि इसका उल्लंघन ही हो रहा है। भारत के अधिकांश शहरों में, और विशेष रूप से विकासशील शहरों में भूमि उपयोग योजना का कोई नामोनिशान भी नहीं है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो ताकि लोगों को पता चले कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। पारदर्शिता रोकथाम का पहला कदम है। इस भ्रम से जानबूझकर पैदा हुई अराजकता दिल्ली में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहां अवैध अतिक्रमण सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं और बुनियादी ढांचे में किया गया सार्वजनिक निवेश व्यर्थ हो जाता है।

नई पीढ़ी के शहर को प्रबंधन की आवश्यकता है, न कि लोकलुभावनवाद की, जो अराजकता की ओर ले जाता है। असली चुनौती यहीं है। हमें शहरीकरण के किफायती मॉडल चाहिए, लेकिन आजीविका की रक्षा के नाम पर हर अवैध चीज की अनुमति देने से ये मॉडल नहीं उभरेंगे। इससे केवल अराजकता और घटिया सेवाएं ही सुनिश्चित होंगी।

असल मुद्दा शहरी प्रशासन की प्रकृति पर ध्यान केंद्रित करना है। हमारे यहां पूरी तरह से असंगत शहरी शासन प्रणालियां हैं, जहां प्रतिनिधियों को चुना तो जाता है, लेकिन फिर उन्हें निष्क्रिय कर दिया जाता है। वे फिर हर लाभप्रद चीज से खिलवाड़ करते हैं, जिससे अव्यवस्था बढ़ती है। विडंबना यह है कि नई दिल्ली ने, जहां सत्ताधारी अभिजात वर्ग रहता है, यह मान लिया है कि लोकतंत्र उसके लिए कारगर नहीं है, अब अधिकारियों का एक समूह शहर चलाता है। यह तेजी से अन्य नए विकसित शहरों के लिए एक आदर्श बनता जा रहा है। तो फिर, सबसे अच्छा विकल्प क्या है?

यही वह प्रश्न है जिससे हमारा आर्थिक भविष्य तय होगा। शहरीकरण का स्वरूप संसाधन-कुशल, समावेशी और आजीविका सुरक्षा तथा जीवन को सार्थक बनाने वाली हर चीज को सुनिश्चित करने में सक्षम होना चाहिए-स्वच्छ जल और स्वच्छ वायु से लेकर खेल के मैदानों और स्कूलों तक। आइए, अतीत की दिल्ली जैसी शहरी कल्पनाओं को त्याग दें और भविष्य को अपनाएं। 

(ले​खिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से जुड़ी हैं)

First Published : March 8, 2026 | 10:18 PM IST