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भारत में ‘मक्का क्रांति’ बहुत फायदेमंद, धान की जगह मक्के की खेती से पर्यावरण भी बचेगा व मुनाफा भी बढ़ेगा

तकनीक और हाइब्रिड बीजों के दम पर भारत में मक्का उत्पादन तेजी से बढ़ा है, जो धान का बेहतर विकल्प बनकर पर्यावरण और खजाने दोनों को फायदा पहुंचा रहा है

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रमेश चंद   
Last Updated- June 26, 2026 | 10:47 PM IST

पिछले एक दशक में देश के कृषि क्षेत्र की सूरत बहुत तेजी से बदली है। कृषि क्षेत्र में सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) की औसत वार्षिक वृद्धि दर बढ़कर 4.68 प्रतिशत हो गई है। ऐसा आंकड़ा पहले कभी नहीं देखा गया था। इस दरम्यान किसानों की आय विनिर्माण और दूसरे गैर-कृषि क्षेत्रों के उत्पादकों की आय के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ गई है। किंतु कृषि से जुड़े सभी क्षेत्रों में वृद्धि की कहानी एक जैसी नहीं रही है और इस बात पर गंभीर चिंता जताई जा रही है कि यह वृद्धि तकनीकी प्रगति के बजाय केवल कीमतों में बढ़ोतरी से तो नहीं हो रही है।

वृद्धि में तेजी मुख्य रूप से बागवानी, डेरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन जैसे अधिक मूल्य वाले (हाई वैल्यू) क्षेत्रों के दम पर रही है। इनके उलट अनाज, दलहन, तिलहन, कपास, गन्ना और रेशों जैसी खेतों में होने वाली फसलों में वृद्धि की गति धीमी रही है। इस पर ध्यान देना जरूरी है क्योंकि देश में फसल के कुल रकबे में से 85 प्रतिशत पर ये फसलें ही बोई जाती हैं। साथ ही कृषि और किसान आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा भी इन्हीं से जुड़ा है।

पिछले कुछ वर्षों में फसलों में वृद्धि धीमी रहने का एक बड़ा कारण ऐसी किसी बड़ी तकनीकी उपलब्धि का अभाव रहा है, जिसके कारण उत्पादन क्षमता में तेजी से इजाफा हो सके। सोयाबीन और कपास जैसी कुछ महत्त्वपूर्ण फसलों में तो उपज ठहर गई है बल्कि आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कम भी हुई है। ऐसी स्थिति में मक्का अपवाद बनकर उभरा है, जिसकी पैदावार तेजी से बढ़ी है और जो भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाली फसल बन गया है।

भारत में 2015-16 में 2.25 करोड़ टन मक्का हुआ था और 2025-26 में इस फसल का कुल उत्पादन बढ़कर 5.50 करोड़ टन तक पहुंच गया। इस दौरान इसका उत्पादन 9.3 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ा। यह इजाफा फसल की पैदावार बढ़ने से हुआ, जिसकी वजह से इसका रकबा भी पहले से बढ़ता गया। मक्के की वृद्धि दर अनाज, दलहन और धान की वृद्धि दर से दोगुनी रही है और गेहूं के मुकाबले तो इसमें तीन गुना ज्यादा वृद्धि हुई है।

हरित क्रांति से भी पहले दुनिया भर में मक्के की पैदावार में क्रांति शुरू हो गई थी। मगर भारत में मक्के का कायाकल्प कुछ देर से हुआ। इसमें अहम मोड़ 2007-08 में आया, जब मक्के की पैदावार एक वर्ष के भीतर ही करीब 22 प्रतिशत बढ़ गई तथा उत्पादन में 25 प्रतिशत से ज्यादा इजाफा दर्ज किया गया। इसके साथ ही मक्का पहले के मुकाबले एकदम अलग वृद्धि की राह पर बढ़ गया और उसे बेहतर भविष्य वाली बदलती फसल मान लिया गया। लगभग 4 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार के साथ भारत अब वैश्विक स्तर के करीब पहुंच रहा है।

मक्के में वृद्धि की खास बात है कि यह मूल्य के जरिये मदद देने वाली उस व्यवस्था के बगैर हुई है, जो गेहूं और धान को अरसे से मिलती रही है। उन फसलों जैसे नीतिगत प्रोत्साहन नहीं मिलने के बाद भी मक्के ने वृद्धि के मामले में दोनों को पछाड़ दिया है। यह सफलता मक्के की आधुनिक संकर किस्मों के कारण है, जिनका पलड़ा ज्यादा इलाकों में और ज्यादा मौसमों में उग सकने के कारण भारी रहता है। ज्यादातर फसलों के उलट मक्के की खेती देश के सभी कृषि क्षेत्रों में और खरीफ, रबी तथा गर्मी के मौसमों में की जा सकती है।

पिछले दो दशकों में मक्के की पैदावार दोगुनी हो चुकी है और इसका उत्पादन तीन गुने से भी ज्यादा हो गया है मगर भारत और दुनिया के अग्रणी मक्का उत्पादक देशों के बीच पैदावार का बड़ा अंतर बना हुआ है। भविष्य की बात करते हुए विशेषज्ञ कहते हैं कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में पहले से मौजूद उन्नत किस्में अपनाकर राष्ट्रीय स्तर पर मक्के की औसत पैदावार आसानी से 8 टन प्रति हेक्टेयर तक की जा सकती है।

राज्यवार आंकड़े भी ऐसा ही कहते हैं। पश्चिम बंगाल में औसतन प्रति हेक्टेयर लगभग 7 टन मक्का होता है। उसके बाद आंध्र प्रदेश में इसकी पैदावार लगभग 6.5 टन और बिहार में 6.1 टन प्रति हेक्टेयर है। तेलंगाना और तमिलनाडु भी इसी स्तर के करीब पहुंच रहे हैं। इन राज्यों में देश में मक्के का केवल 22 प्रतिशत रकबा है मगर कुल उत्पादन में इनका योगदान 38 प्रतिशत है।

इसके उलट मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मक्के का रकबा बहुत ज्यादा है मगर पैदावार अब भी 3 टन प्रति हेक्टेयर के इर्द-गिर्द अटकी है। उत्तर प्रदेश में मक्के का 70 प्रतिशत रकबा सिंचित है मगर पैदावार इतने ही या इससे कम सिंचित क्षेत्र वाले राज्यों से कम है। कम पैदावार से उबरने के लिए एकल संकर बीजों का व्यापक उपयोग आवश्यक है।

मक्के में तेज वृद्धि की संभावना तो है ही, पर्यावरण को भी इससे कई फायदे हैं। देश में और विशेष रूप से कम बारिश वाले तथा उत्तर पश्चिम क्षेत्र में धान की ज्यादा खेती ने भूजल का स्तर और भी कम कर दिया है, मिट्टी की गुणवत्ता खराब की है और पर्यावरण पर भी बोझ डाला है। खरीफ के मक्के को बहुत कम पानी की जरूरत पड़ती है और फसल कम वक्त में तैयार हो जाती है।

साथ ही इसकी जड़ें धान की तुलना में मिट्टी की स्थिति को बेहतर बनाए रखती हैं। इसलिए उत्तर पश्चिम भारत में धान की जगह मक्के की खेती को बढ़ावा दिया जाए तो धान-गेहूं से जुड़ी कई पर्यावरण एवं सतत विकास की चुनौतियां दूर की जा सकती हैं। लेकिन इसके लिए नीतिगत प्राथमिकताएं बदलनी होंगी।

भारत में अभी देश की जरूरत से करीब 30 प्रतिशत ज्यादा धान उगाया जाता है। इस अधिक धान का बड़ा हिस्सा सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की अपनी बाध्यता पूरी करने के लिए खरीद लेती है। मगर यह मात्रा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और बफर स्टॉक की जरूरतों से भी ज्यादा है, जिस कारण सरकारी एजेंसियों के पास चावल का बड़ा भंडार जमा हो जाता है।

इस अतिरिक्त चावल को आम बाजार के जरिये कारगर तरीके से बेचा नहीं जा सकता। इसलिए भारी मात्रा में चावल बायो-एथनॉल के उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है। इससे सरकारी खजाने को बड़ा घाटा होता है। धान के कुछ रकबे में धीरे-धीरे मक्का उगाना शुरू कर दिया जाए तो खजाने का घाटा कम हो सकता है क्योंकि मक्का भी धान की तरह ही मुनाफा दे सकता है।

ऐसे बदलाव के लिए मक्के से बनने वाली जैव-ऊर्जा को बढ़ावा देने वाला तंत्र तैयार करना होगा। इसके लिए ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो मक्का उत्पादकों को लाभकारी और स्थिर मूल्य दिलाएं। मक्के का उत्पादन इस तरह बढ़ाने पर अन्न तथा चारे के बीच ज्यादा होड़ शुरू नहीं होगी। बल्कि इससे कृषि की वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, ग्रामीण रोजगार उत्पन्न होगा, मूल्य श्रृंखला मजबूत होंगी, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटेगा और पर्यावरण को लंबे समय तक स्थिरता मिलेगी।

जोर पकड़ती मक्का क्रांति भारतीय कृषि को अहम सबक भी देती है। यह बताती है कि टिकाऊ वृद्धि केवल खाद, पानी और दूसरे साधनों का इस्तेमाल बढ़ाने से नहीं आएगी बल्कि प्रौद्योगिकी और विविध फसलों के जरिये पैदावार बढ़ाने से ही आएगी।

(लेखक इक्रियर के विशिष्ट प्रोफेसर हैं और नीति आयोग के सदस्य रह चुके हैं)

 

First Published : June 26, 2026 | 10:47 PM IST