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सायरन का परीक्षण तो हो गया, लेकिन देश में आपातकालीन संचार का बुनियादी ढांचा अब भी अधूरा

भारत में मोबाइल सायरन का परीक्षण तो हुआ है, लेकिन 15 साल के प्रयासों के बावजूद एकीकृत आपदा आपातकालीन संचार नेटवर्क (PPDR) का काम अब भी अधूरा है

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निवेदिता मुखर्जी   
Last Updated- May 15, 2026 | 9:50 PM IST

पिछले पखवाड़े लाखों मोबाइल फोन पर आपदा प्रबंधन घंटी (सायरन) के परीक्षण से कम से कम 15 वर्ष पहले ही देश में आपातकालीन संचार सेवाओं पर संबंधित पक्षों के साथ औपचारिक परामर्श शुरू हो चुका था। नवंबर, 2011 में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने ‘आपात स्थितियों के दौरान मोबाइल नेटवर्क में प्राथमिकता आधारित कॉल रूटिंग’ पर एक पूर्व-परामर्श पत्र जारी किया था। इसकी वजह 13 जुलाई, 2011 को मुंबई में हुए बम धमाके थे जिन्होंने भारत की वित्तीय राजधानी को हिलाकर रख दिया था। इस संकट के कारण शहर का मोबाइल तंत्र (नेटवर्क) पूरी तरह व्यस्त हो गया था जिसे देखते हुए दूरसंचार नियामक ने इस विषय पर परामर्श प्रक्रिया शुरू की।

इस कदम का मकसद आपात स्थितियों के दौरान राहत और बचाव कार्य में लगे कर्मियों के लिए मोबाइल नेटवर्क पर दबाव या भीड़-भाड़ कम करना और साथ ही आधुनिक दूरसंचार अवसंरचना का महत्त्व उजागर करना था। इस रिपोर्ट में जुलाई 2006 में मुंबई उप-नगरीय ट्रेन बम विस्फोटों के साथ-साथ सितंबर, 2001 में अमेरिका में हुए आतंकी हमलों, 2004 में थाईलैंड में आई सुनामी और 1994 के नॉर्थरिज भूकंप जैसी अंतरराष्ट्रीय आपदाओं का हवाला देते हुए मोबाइल तंत्र की व्यस्तता के समय मजबूत संचार प्रणालियों की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

नियामक ने 2011 में कहा था, ‘ऐसा देखा गया है कि बड़ी आपदाओं के समय मोबाइल तंत्र पर दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है क्योंकि लोग एक दूसरे का हाल-चाल या संबंधित घटना की जानकारी लेना शुरू कर देते हैं। इससे मोबाइल तंत्र पूरी तरह व्यस्त और अत्यधिक दबाव में आ जाता है।’

सरकार के आपदा प्रबंधन उपाय के रूप में नवीनतम मोबाइल सायरन प्रयोग को मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया के मद्देनजर इस ऐतिहासिक संदर्भ को याद करना अहम हो जाता है। सेल ब्रॉडकास्ट तकनीक का उपयोग करते हुए मोबाइल आधारित आपदा चेतावनी प्रणाली को सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (सी-डॉट) ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के साथ मिलकर विकसित किया है।

वर्ष 2011 में आपातकालीन संचार के क्षेत्र में अपनी यात्रा शुरू करने के बाद से ट्राई ने आपदा प्रबंधन से संबंधित कई परामर्श पत्र जारी किए हैं जिनमें आखिरी पत्र 2017 में प्रकाशित हुआ था।

ट्राई के वर्ष 2017 के परामर्श पत्र में इस तर्क पर जोर दिया गया था कि बचाव अभियान को रोका या विलंबित नहीं किया जा सकता भले ही प्रतिक्रिया देने वाली एजेंसियां आपस में संवाद करने में असमर्थ हों। दिसंबर, 2004 में हिंद महासागर में उठी सुनामी का हवाला देते हुए नियामक ने कहा कि हालांकि, दुनिया भर के भूकंपीय निगरानी स्टेशनों ने उस सुनामी का कारण रहे भयावह समुद्री भूकंप का पता लगा लिया था, लेकिन आवश्यक प्रक्रियाओं की कमी और कई क्षेत्रों में अपर्याप्त बुनियादी ढांचे के कारण इन संदेशों के प्रसारण में देरी हुई।

लिहाजा यह स्पष्ट है कि बेहतर संचार से कई लोगों की जानें बचाई जा सकती हैं। यह देखते हुए कि कई बार कुछ सार्वजनिक सुरक्षा एजेंसियों के संचार नेटवर्क अन्य एजेंसियों के नेटवर्क के साथ परस्पर सुसंगत या सहक्रियाशील नहीं होते, ट्राई ने नौ साल पहले अपने परामर्श पत्र में अमेरिका का एक उदाहरण पेश दिया।

अमेरिका में पुलिस व्यवस्था, आपराधिक न्याय, सार्वजनिक सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को सहारा देने के लिए सार्वजनिक सुरक्षा एजेंसियों ने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियां का ढांचा तैयार करने, इन्हें विकसित और तैनात करने के लिए मिल कर काम किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आपदाओं के समय त्वरित कार्रवाई के लिए सार्वजनिक सुरक्षा और आपदा राहत (पीपीडीआर) संचार तंत्र (नेटवर्क) का निर्माण हुआ।

अमेरिका के पीपीडीआर मॉडल के आधार पर नियामक ने हितधारकों के परामर्श के लिए कई प्रश्न रखे जिनमें उस समय भारत में पीपीडीआर प्रणाली में खामियां, सार्वजनिक सुरक्षा और आपदा राहत के लिए विशेष रूप से पहचाने जा सकने वाले आवृत्ति बैंड और इसके लिए आवश्यक स्पेक्ट्रम आदि शामिल थे।

वर्ष 2017 के परामर्श पत्र के आधार पर दूरसंचार नियामक ने एक साल बाद सिफारिशें जारी कीं। पीपीडीआर नेटवर्क उस सिफारिश का आधार था। ट्राई ने अपनी प्रणाली में एक प्रमुख कमजोरी की ओर इशारा किया। इस पत्र में बताया गया है कि भारतीय पीपीडीआर एजेंसियां (जिनमें पुलिस, अग्निशमन विभाग, आपातकालीन चिकित्सा पेशेवर, अर्धसैनिक बल और कई अन्य शामिल हैं) ध्वनि संचार में इस्तेमाल होने वाले संकीर्ण (नैरो)-बैंड या पुराने एनालॉग सिस्टम पर निर्भर रहती हैं। 

पीपीडीआर संचार तंत्र स्वतंत्र सरकारी एजेंसियों द्वारा संचालित होते हैं और दूरसंचार विभाग द्वारा कैप्टिव मोबाइल रेडियो ट्रंकिंग सेवा श्रेणी के तहत लाइसेंस जारी किए जाते हैं। इस श्रेणी के लिए स्पेक्ट्रम का आवंटन डीओटी के वायरलेस प्लानिंग ऐंड कोऑर्डिनेशन विंग द्वारा कुछ चुनिंदा बैंडों में किया जाता है। ट्राई का तर्क है कि इस ढांचे के परिणामस्वरूप स्पेक्ट्रम का खंडित आवंटन और प्रमुख सब-गीगाहर्ट्ज आवृत्तियों का ठीक से इस्तेमाल नहीं हो पाता है। नियामक द्वारा उठाया गया एक अन्य मुद्दा पीपीडीआर एजेंसियों का अलग-अलग काम करना था।

हितधारकों, मुख्य रूप से गृह मंत्रालय और एनडीएमए (पीपीडीआर संचार के प्रमुख उपयोगकर्ता) के साथ बैठकों के बाद ट्राई ने अपने सुझावों को अंतिम रूप दिया। 

शीर्ष सुझावों में एक एकीकृत ब्रॉडबैंड पीपीडीआर संचार तंत्र की स्थापना, नेटवर्क संचालन के लिए गृह मंत्रालय के अधीन एक विशेष प्रयोजन इकाई (एसपीवी) का गठन, डीओटी द्वारा मौजूदा एनालॉग नेटवर्क को चरणबद्ध तरीके से बंद करने के लिए एक समय सीमा और सेवा लागू करने से पहले सरकारी दूरसंचार कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल के माध्यम से अखिल भारतीय पायलट प्रोजेक्ट शामिल थे।

स्पेक्ट्रम के संबंध में (जो राष्ट्रव्यापी ब्रॉडबैंड पीपीडीआर नेटवर्क के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करेगा) नियामक ने ब्रॉडबैंड पीपीडीआर के भविष्य के विकास के लिए 440-470 मेगाहर्ट्ज आवृत्ति रेंज (मुख्यत: 450-470 मेगाहर्ट्ज) में 20 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम सहित कई आवृत्तियों पर समर्पित बैंड की सिफारिश की है।

मगर आठ साल बाद भी इस पर ज्यादातर काम अधूरा है और इसके बीच लाखों भारतीयों को पिछले पखवाड़े देश की आपदा प्रबंधन रणनीति की झलक मिली। हालांकि, दूरसंचार नियामक पिछले 15 वर्षों से आपदा प्रबंधन के विषय पर औपचारिक रूप से काम कर रहा है मगर एनडीएमए के सहयोग से सी-डॉट द्वारा विकसित सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम का ट्राई के दस्तावेजों में कोई उल्लेख नहीं है। 

First Published : May 15, 2026 | 9:35 PM IST