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वैश्विक व्यवस्था में बढ़ा सौदेबाजी का चलन, क्या भारत बनेगा नई उम्मीद

वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन की तर्ज पर मझोली शक्तियों का गठबंधन एकमात्र टिकाऊ विकल्प लग रहा है

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श्याम सरन   
Last Updated- June 06, 2026 | 1:28 AM IST

वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ राष्ट्रों की विदेश नीति से जुड़े व्यवहार को सौदेबाजी की तरह देखते हैं। यह सौदेबाजी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय वैश्विक व्यवस्था की साख में सेंध लगने का सबूत माना जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तैयार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भी तमाम खामियां और असमानताएं थीं मगर इनके बावजूद इसका एक अपना रसूख हुआ करता था।

यह व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र जैसे सशक्त अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ उन मुद्दों से निपटने के लिए बहुपक्षीय प्रक्रियाओं में भागीदारी पर आधारित थी जिनके दुनिया के लिए दूरगामी परिणाम हो सकते थे।

17वीं शताब्दी से चरणों में विकसित अंतरराष्ट्रीय कानूनों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। राष्ट्रों के बीच द्विपक्षीय संबंध प्राथमिक समीकरण बने रहे मगर उन्हें एक व्यवस्थित राजनीतिक वातावरण को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाया जाता था। शक्ति को वैधता के साथ संतुलित करना आवश्यक था। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में होने वाली सौदेबाजी में ताकत स्वयं वैधता का स्रोत बन जाती है और फिर बेलगाम हो जाती है। इस नई सौदेबाजी वाली व्यवस्था में द्विपक्षीय लेनदेन को प्राथमिकता दी जाती है जहां प्रभाव प्रत्यक्ष होता है और परिणाम तत्काल दिखने लगते हैं।

पारस्परिकता पर जोर दिया जाता है और रियायतें सशर्त और अस्थायी होती हैं। बहुपक्षीय मंचों में परिणाम अव्यवस्थित हो सकते हैं, लाभ सामाजिक हो सकते हैं और दीर्घकालिक रूप से अधिक व्यापक हो सकते हैं।

भले ही बहुपक्षीय मंच बने रहें और राष्ट्र जलवायु परिवर्तन या साइबर सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करने के लिए एकत्रित होते रहें मगर परिस्थितियां अब भिन्न हैं। ये मंच अब सहयोगात्मक नतीजे हासिल करने वाले स्थान नहीं रह गए हैं। इसके बजाय वे भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के मंच बन गए हैं।  सौदेबाजी पर आधारित वैश्विक व्यवस्था की एक और विशेषता अंतर-राज्यीय संबंधों के संचालन में चपलता और रफ्तार पर दिया जाने वाला जोर है। किसी अंतरराष्ट्रीय घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया, सोच-समझकर और सावधानीपूर्वक की गई प्रतिक्रिया से अधिक अहम मानी जा रही है।

इसका कारण यह है कि सोशल मीडिया ने राजनीतिक समयसीमा को संकुचित कर दिया है और व्यावसायिक निर्णयों की तरह ही भू-राजनीतिक दांवपेच में प्रतिस्पर्द्धियों को पछाड़ना आवश्यक हो गया है।

राष्ट्रों की विदेश नीति में सौदेबाजी का चलन अक्सर एक नेता के प्रभाव वाली विदेश नीति से जुड़ा होता है जिसकी प्राथमिकता घरेलू राजनीतिक शक्ति होती है। यद्यपि, घरेलू राजनीति हमेशा विदेश नीति को प्रभावित करेगी मगर इस सौदेबाजी के अंतर्गत विदेश नीति अक्सर घरेलू राजनीति का एक साधन बन जाती है। इस प्रकार, राष्ट्रीय हित से सरोकार रखे बिना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेता की एक असाधारण छवि बनाना विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बन सकता है। यह डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिका में सबसे अधिक दिखाई दे रहा है मगर यह केवल वहीं तक सीमित नहीं है।

वैश्विक शासन के मूल में एक गहरा विरोधाभास निहित है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जब वैश्विक आयाम वाले अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का महत्त्व काफी बढ़ गया है। हम जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का सामना कर रहे हैं। हम कोविड-19 महामारी के कारण हुई मानवीय क्षति का गवाह रहे हैं जो किसी एक राष्ट्र तक सिमट कर नहीं रही। 

इसी प्रकार साइबर सुरक्षा भी एक वैश्विक चुनौती है और केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) पर लगाम लगा सकता है। एआई हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल सकती है। ये वास्तव में वैश्विक चुनौतियां हैं जिनका समाधान केवल वैश्विक, सहयोगात्मक उपायों से ही संभव है। ठीक ऐसे समय में जब इन उपायों को लागू करने के लिए सशक्त अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और प्रभावी बहुपक्षीय प्रक्रियाओं की सबसे अधिक आवश्यकता है, दुनिया विपरीत दिशा में आगे बढ़ रही है। आखिर, इस विरोधाभास का कारण क्या है? क्या राजनेताओं और नीति निर्माताओं के बीच समझ की कमी है या कुछ गहरी संरचनात्मक शक्तियां काम कर रही हैं जो सामूहिक और समन्वित कार्रवाई की अनिवार्यता को तर्कसंगत स्तर पर स्वीकार करने से इनकार कर रही हैं?

व्यापक स्तर पर अधिकांश राजनीतिक नेता ऐसी नीतिगत कार्रवाइयों के तर्क को समझते हैं मगर सूक्ष्म स्तर पर ऐसे प्रोत्साहन मौजूद हैं जो उन्हें विपरीत दिशा में खींचते हैं। जलवायु परिवर्तन, महामारी की तैयारी और साइबर हमले झेलने एवं इनसे निपटने की क्षमता घरेलू राजनीतिक चक्र की तुलना में कहीं अधिक दीर्घकालिक स्तर पर काम करते हैं। जो नेता दीर्घकालिक वैश्विक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बेमतलब की राजनीति से दूरी बरतने लगते हैं उन्हें अक्सर मतदाताओं के कोप का सामना करना पड़ता है। 

वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए समान रूप से बोझ साझा करने पर आधारित सामूहिक कार्रवाई की प्रतिस्पर्द्धा होनी चाहिए थी मगर इसके बजाय यह बोझ एक-दूसरे पर डाला जा रहा है जो एक आत्मघाती सौदेबाजी है। क्या ऐसी कोई संभावना है कि मझोली शक्तियों का कोई ढीला-ढाला गठबंधन वास्तव में वैश्विक साझा संसाधनों की चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित कर सके और एकजुटता और वैश्विक जिम्मेदारी की नई भावना के साथ कार्रवाई का नेतृत्व कर सके? 

वैश्विक मंचों पर उनकी अधिक सक्रियता है और अव्यवस्था से भरी दुनिया में उन्हें बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। आम तौर पर दुनिया के विकासशील एवं आर्थिक रूप से कमजोर देशों (ग्लोबल साउथ) की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को मझोली ताकतों के रूप में देखा जाता है। इनमें भारत, इंडोनेशिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और अंततः ईरान शामिल हो सकते हैं। हालांकि, अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के गठबंधन के बिखराव के साथ फ्रांस और जर्मनी जैसी यूरोपीय शक्तियां और अमेरिका में कनाडा और मेक्सिको जैसी शक्तियां भी रणनीतिक स्वायत्तता की ओर अग्रसर हैं।

जापान और दक्षिण कोरिया भी खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। यह संभावित रूप से देशों का एक ऐसा समूह है जो मिलकर एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय आंदोलन खड़ा कर सकता है जो अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की भावना को बढ़ावा दे सकता है और साझा कार्रवाई का नेतृत्व कर सकता है। 

हमें यह देखना होगा कि क्या किसी बहुराष्ट्रीय या द्विपक्षीय सैन्य गठबंधन का हिस्सा होना (भले ही उसका स्वरूप कमजोर हो गया हो) उनकी कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित करेगा। जब तक कुछ प्रभावशाली शक्तियां आगे बढ़कर कमान नहीं संभालतीं तब तक लेन-देनवाद की मौजूदा पकड़ के हटने और अधिक सकारात्मक मानदंडों के आने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

मगर एक विश्वसनीय मध्यम शक्ति को ही ऐसे गठबंधन का गठन करना होगा। भारत वह ताकत बन सकता है मगर उसे अपनी विदेश नीति के सौदेबाजी आधारित झुकाव से दूर हटना होगा।

एक ऐतिहासिक समानता शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन में देखी जा सकती है जब नव स्वतंत्र और उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों के एक समूह ने ध्रुवीकृत भू-राजनीतिक परिदृश्य में अपने हितों की रक्षा और उनके प्रचार के लिए एक स्वतंत्र स्थान बनाने का प्रयास किया। वह स्थिति हमारे वर्तमान अव्यवस्थित और खतरनाक विश्व से बहुत अलग नहीं थी। किसी भी स्थिति में इतनी सघन रूप से परस्पर जुड़ी और एक-दूसरे पर निर्भर दुनिया में सौदेबाजी एक खतरनाक मोड़ की ओर ले जाती है।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं)

First Published : June 6, 2026 | 1:28 AM IST