संपादकीय

Editorial: बैंकों के शीर्ष पद भरे जाएं

सरकारी बैंक इस पहलू से उलझे हुए हैं। व्यापक तौर पर ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र सरकार इनके बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति में देरी करती है

Published by
बीएस संपादकीय   
Last Updated- May 05, 2026 | 10:35 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक ने मसौदा शासन संशोधन निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य बैंकों के बोर्ड मसलन अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक, भुगतान बैंक, लघु वित्त बैंक और स्थानीय क्षेत्रीय बैंक आदि के संचालन को बेहतर बनाना है। नियामक का मानना है कि बढ़ती जटिलताओं से निपटने के लिए सिद्धांत-आधारित मार्गदर्शन अधिक उपयुक्त है।

हितधारकों से परामर्श लेने के बाद ये नए मानदंड इस वर्ष आगे चलकर लागू होंगे। यह कदम बैंकों के प्रशासन की दक्षता बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण है लेकिन इसका अर्थ यह है कि बैंक बोर्डों की संरचना और क्षमता शासन के लिए अहम तत्त्व हैं। एक प्रश्न यह भी है कि यदि बोर्ड में आवश्यक संख्या में सदस्य ही न हों तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक द्वारा दिया गया मार्गदर्शन व्यवहार में विफल हो सकता है। खासकर जब यह सिद्धांतों पर आधारित हो।

सरकारी बैंक इस पहलू से उलझे हुए हैं। व्यापक तौर पर ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र सरकार इनके बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति में देरी करती है। इनमें बैंकों के चेयरपर्सन भी शामिल हैं। रिजर्व बैंक का मसौदा गैर कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका के महत्त्व पर जोर देता है क्योंकि बोर्ड बैठक उनके निर्देश पर होती है और वे एजेंडा निर्धारित करने का अहम काम करते हैं।

यह अत्यंत चिंताजनक है कि इस समय 11  सरकार नियंत्रित बैंकों में से केवल तीन के पास ही गैर-कार्यकारी अध्यक्ष हैं। जैसा कि इस अख़बार ने पहले खबर दी है, इनमें से कुछ बैंकों में यह पद लंबे समय से खाली है। यही स्थिति अन्य वरिष्ठ पदों पर भी लागू होती है। केनरा बैंक, जिसे शीर्ष सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में गिना जाता है, लगभग चार महीने से प्रबंध निदेशक (जो मुख्य कार्याधिकारी भी होते हैं) के बिना काम कर रहा है।

अध्यक्षों की नियुक्ति न होने के अलावा भी बोर्ड अपूर्ण हैं। 11 सरकारी बैंकों में से दो के बोर्ड में केवल सात सदस्य हैं। केवल तीन राष्ट्रीयकृत बैंकों के बोर्ड में अ​धिकतम निर्धारित 10 सदस्य हैं। विशेष चिंता की बात यह है कि कई बैंकों में सनदी लेखाकार (सीए) श्रेणी से नियुक्त निदेशक नहीं हैं। ऐसी नियुक्ति आवश्यक है ताकि बोर्ड की महत्त्वपूर्ण अंकेक्षण समिति, जिसे कई अहम जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं वह नियमों के अनुरूप काम कर सके।

अधिकांश बैंकों में स्वतंत्र निदेशकों की पूरी संख्या भी नहीं है और वे रिजर्व बैंक तथा सरकार के नामित सदस्यों से ही काम चला रहे हैं। यह व्यापक समस्या है। निजी क्षेत्र में भी स्वतंत्र निदेशकों की कमी है जबकि विभिन्न नियमों ने इन भूमिकाओं पर और अधिक जिम्मेदारियां डाल दी हैं।

वर्षों से सरकार ने नियुक्ति प्रक्रियाओं को संस्थागत बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किए हैं। लेकिन हाल के दिनों में कार्रवाई धीमी प्रतीत होती है। सच्चाई यह है कि रिजर्व बैंक के नए निर्देश हों या न हों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को एक सुचारु और पूर्ण बोर्ड की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, यदि उचित अंकेक्षण समिति न हो तो बुनियादी शासन कार्य अधूरे रहेंगे। बोर्ड की कमी की समस्या सिद्धांत-आधारित शासन की ओर बदलाव के साथ और बढ़ेगी।

नए मानदंड बोर्डों से अपेक्षा करते हैं कि वे रणनीति और जोखिम शासन पर पर्याप्त समय दें, लेकिन कमजोर बोर्ड जिनमें स्वतंत्र आवाजें या वित्तीय विशेषज्ञता कम है, वे इस जिम्मेदारी को ठीक से निभाने में असमर्थ रहेंगे। अंततः यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन को प्रभावित करेगा और अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर डालेगा।

First Published : May 5, 2026 | 10:11 PM IST