संपादकीय

Editorial: टाटा संस की सूचीबद्धता पर फिर बढ़ा फोकस

जटिल स्वामित्व संरचना से घिरे होने के बावजूद, टाटा संस की सूचीबद्धता से उम्मीद है कि यह समूह को जोखिमों से, जिनमें शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण भी शामिल हैं, सुरक्षित रखेगी

Published by
बीएस संपादकीय   
Last Updated- March 05, 2026 | 9:58 PM IST

टाटा समूह के हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर टाटा संस की बाजार में सूचीबद्धता की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। यह नमक से लेकर, सेमीकंडक्टर तक के क्षेत्र में कारोबार करने वाले समूह की होल्डिंग कंपनी है। टाटा संस के सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट की हालिया अंदरूनी भिड़ंत और नेतृत्व तथा कारोबार में आगे की राह जैसे जटिल मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति के अभाव ने टाटा संस की सूचीबद्धता के महत्त्व पर ध्यान केंद्रित करा दिया है।

जटिल स्वामित्व संरचना से घिरे होने के बावजूद, टाटा संस की सूचीबद्धता से उम्मीद है कि यह समूह को जोखिमों से, जिनमें शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण भी शामिल हैं, सुरक्षित रखेगी। सितंबर 2022 में रिजर्व बैंक ने टाटा संस को ‘अपर लेयर’ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया था, जिससे तीन वर्षों के भीतर इसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराना अनिवार्य हो गया।

सितंबर 2025 में समयसीमा समाप्त होने के बाद रिजर्व बैंक ने टाटा समूह के उस अनुरोध पर प्रतिक्रिया नहीं दी है जिसमें उन्होंने ‘अपर लेयर कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी’ की श्रेणी में बदलाव की मांग की थी। हालांकि टाटा संस को आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) दाखिल करने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन इस विषय पर नियामक स्पष्टता लंबे समय से लंबित मुद्दे को सुलझाने में मदद करेगी।

गत 24 फरवरी को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक के नवीनतम घटनाक्रमों के बाद टाटा संस की सूचीबद्धता की आवश्यकता और महत्त्वपूर्ण हो गई है। इस बैठक में, टाटा संस के बहुल शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने कथित तौर पर टाटा संस की सूचीबद्धता के मुद्दे को एन. चंद्रशेखरन के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल के नवीनीकरण से जोड़ा।

नोएल टाटा ने छह महीने पहले चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल की सिफारिश की थी और उस पर टाटा ट्रस्ट्स ने एक प्रस्ताव पारित किया था। लेकिन फरवरी की बोर्ड बैठक में उन्होंने चंद्रशेखरन से यह आश्वासन मांगा कि टाटा संस निजी ही बनी रहेगी। कुछ टाटा कंपनियों की लाभप्रदता से संबंधित अन्य शर्तें भी चंद्रशेखरन के कार्यकाल के नवीनीकरण पर हुई चर्चा का हिस्सा थीं, जिसके चलते निर्णय स्थगित हो गया। नोएल टाटा द्वारा प्रस्तावित शीर्ष नेतृत्व के कार्यकाल का सशर्त नवीनीकरण न केवल अनिश्चितता का संदेश देता है बल्कि समूह के भीतर शासन पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

जहां तक अंशधारिता ढांचे की जटिलता का प्रश्न है तो टाटा ट्रस्ट्स जो परिभाषा के स्तर पर एक परोपकारी संस्थान है, वह टाटा संस में 66 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। टाटा संस करीब 26 सूचीबद्ध कंपनियों का संचालन करती है और कई अन्य गैरसूचीबद्ध कंपनियों की भी। इस जटिलता को बढ़ाते हुए नोएल टाटा, जो अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बने थे और बाद में टाटा संस के बोर्ड में भी शामिल हुए, समूह की कई कंपनियों मसलन ट्रेंट, वोल्टास और टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन आदि में शीर्ष पद पर बने हुए हैं। वह टाइटन और टाटा स्टील के उपाध्यक्ष भी हैं।

अधोसंरचना और विनिर्माण क्षेत्र का दिग्गज समूह शापूरजी पालोनजी टाटा संस में 18 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है। शापूरजी पालोनजी समूह, जो अक्टूबर 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा संस के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से टाटा समूह के साथ लंबी कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ है, टाटा संस के आईपीओ पर जोर दे रहा है ताकि अपनी हिस्सेदारी की बिक्री और कर्ज का निपटारा कर सके।

जब टाटा जैसे एक बड़े कारोबारी समूह को बार-बार चुनौती का सामना करना पड़ता है (साइरस मिस्त्री को बोर्ड रूम से बाहर करना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है) तो इससे उत्पन्न अनिश्चितता पूरे तंत्र को प्रभावित करती है। सरकार ने गत वर्ष टाटा ट्रस्ट्स के संकट को हल करने के लिए दखल दिया था और खबर है कि एक बार फिर घटनाक्रम पर उसकी करीबी नजर है। अब टाटा समूह के लोगों को अपनी चीजें ठीक करनी हैं और टाटा संस की सूचीबद्धता शायद इस दिशा में पहला कदम है।

First Published : March 5, 2026 | 9:49 PM IST