प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
इस समाचार पत्र में गुरुवार को प्रकाशित एक समाचार के मुताबिक भारत के दो सबसे बड़े कारोबारी साझेदारों अमेरिका और यूरोपीय संघ ने नियामकीय और गैर शुल्क बाधाओं को लेकर चिंता जताई है। ये मुद्दे विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ की व्यापार नीति समीक्षा के दौरान उठाए गए। यह व्यापार नीति की समय-समय पर होने वाली पियर ग्रुप समीक्षा है जो सदस्यों को इजाजत देती है कि वे विभिन्न मुद्दे उठाएं जिन्हें अलग-अलग देश अपनी प्रतिक्रिया से हल करने की कोशिश करते हैं।
उठाए गए मुद्दों में ऊंचे आयात शुल्क, सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी मानदंड, व्यापार में तकनीकी बाधाएं, डिजिटल व्यापार से संबंधित प्रतिबंध और गुणवत्ता नियंत्रण आदेश आदि शामिल हैं। हालांकि भारत के व्यापारिक साझेदार इस बात को लेकर भी आश्वस्त हैं कि भारत मुक्त व्यापार समझौतों के जरिये अपने जुड़ाव को बढ़ा रहा है जिससे व्यापार व्यवस्था में पारदर्शिता और खुलेपन को बढ़ावा मिलेगा।
निष्पक्षता से देखें तो व्यापारिक साझेदारों की ओर से भारत की व्यापार नीतियों और कुछ विशेष प्रतिबंधों की की जाने वाली आलोचना हमेशा पूरी तरह उचित नहीं होती। कई देश खुद भी सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे कारणों का हवाला देकर आयात पर कड़े नियम लागू करते हैं। बहरहाल, अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दे विचार करने योग्य हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अधिक खुलापन भारत के अपने हित में है।
यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारत में आयात शुल्क ऊंचे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन्हें तर्कसंगत बनाने की दिशा में कुछ कदम उठाए गए हैं, लेकिन अभी और प्रयास करने की जरूरत होगी।
गुणवत्ता नियंत्रण आदेश का मुद्दा भी जायज है। वर्षों के दौरान इनकी संख्या कई गुना बढ़ी है और इनके दायरे में आने वाली उत्पाद श्रेणियों की संख्या 2014 में लगभग 100 से बढ़कर अब 650 से अधिक हो गई है। हाल के महीनों में इनमें कुछ ढील दी गई है और कुछ आदेश वापस भी लिए गए हैं, लेकिन गुणवत्ता नियंत्रण आदेश की व्यवस्था और उनके दायरे की पूरी तरह समीक्षा किए जाने की जरूरत है।
यूरोपीय संघ ने भी माना है कि भारत इस मुद्दे के समाधान की दिशा में कदम उठा रहा है। इन आदेश का इस्तेमाल व्यापारिक बाधा के रूप में किया गया है और इनका असर खास तौर पर छोटे कारोबारों पर पड़ता है जो प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए सस्ते आयात पर निर्भर रहते हैं।
हाल के समय में भारत ने व्यापार के क्षेत्र में काफी खुलापन दिखाया है और यूरोपीय संघ तथा ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) किए हैं। हालांकि, उसे सामान्य रूप से आयात शुल्क को और तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। एक अनुमान के अनुसार, भारत का व्यापार-भारित सर्वाधिक तरजीही देश शुल्क 12.6 फीसदी है, जो उसके समकक्ष देशों की तुलना में काफी अधिक है।
इस पर पर्याप्त रूप से कम करने की जरूरत है। दुनिया के कुल व्यापार में 50 फीसदी से अधिक हिस्सा मध्यवर्ती वस्तुओं का है। ऐसे में अपेक्षाकृत ऊंचे आयात शुल्क के साथ वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं का हिस्सा बनना मुश्किल है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी काफी हद तक व्यापार के खुलेपन से प्रेरित होता है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऐसे देश में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने में हिचकिचाएंगी जहां उत्पादन के लिए जरूरी कच्चे माल और अन्य चीजों का आयात करना मुश्किल या महंगा हो।
भारत को घरेलू बचत के पूरक के रूप में बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश आकर्षित करने और उच्च आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की जरूरत है। इसलिए उसे विदेशी निवेशकों की अन्य चिंताओं को दूर करने के साथ-साथ व्यापार के लिए अधिक खुला होना चाहिए। यह शुल्क कम करने का एक अच्छा समय है, क्योंकि रुपये की वास्तविक विनिमय दर में काफी गिरावट आई है और इससे भारतीय कारोबारों को संरक्षण मिल रहा है।
कमजोर रुपये ने वस्तुओं के निर्यात को भी बढ़ावा दिया है। इस वर्ष अप्रैल से अगस्त के दौरान वस्तुओं का निर्यात 15 फीसदी से अधिक बढ़ा है।
हालांकि भारत को निश्चित रूप से व्यापार के लिए अधिक खुला होने की जरूरत है, लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि उसकी व्यापार नीति के आलोचकों में शामिल अमेरिका खुद आयात पर अंकुश लगाने और अन्य उद्देश्यों को हासिल करने के लिए शुल्क लगा रहा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि व्यापार घाटा उसके व्यापारिक साझेदारों की अनुचित व्यापार नीतियों का प्रतिबिंब है।
इसके अलावा, पिछले वर्ष भारत को दंडात्मक शुल्क का भी निशाना बनाया गया था। भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह समझौता जल्द पूरा होगा और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को जरूरी स्थिरता प्रदान करेगा।