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Editorial: यूपीआई के बाद अब ऋण क्रांति की बारी, फिनटेक बढ़ाएं सेवाओं का दायरा

यूपीआई लेनदेन के आंकड़े छोटे कारोबारियों और एमएसएमई की साख का आकलन आसान बना सकते हैं

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- September 16, 2026 | 9:06 PM IST

भारत में वित्त-तकनीक (फिनटेक) क्षेत्र में आई क्रांति का दायरा अब बढ़ना चाहिए। इसे केवल भुगतान तक न सीमित रहकर अब ऋण आवंटन दिशा में भी कदम बढ़ाना चाहिए। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के जरिये होने वाले लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होने के बाद फिनटेक कंपनियों के लिए राजस्व की तस्वीर अब अधिक साफ हो जाएगी। इसे देखते हुए उन्हें अपनी सेवाओं का दायरा बढ़ाने और अधिक वित्तीय समावेशन की दिशा में काम करना चाहिए।

पिछले सप्ताह ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त-तकनीक क्षेत्र में अगले चरण के रूप में ऋण उपलब्ध कराने का दायरा बढ़ाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि बहुत छोटे व्यवसायों की वित्त आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए फिनटेक कंपनियां डिजिटल लेनदेन संबंधी उनके पिछले लेनदेन रिकॉर्ड या इतिहास का इस्तेमाल कर सकती हैं।

इसके एक दिन बाद नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी ने तर्क दिया कि यूपीआई से मिलने वाली लेनदेन संबंधी जानकारियां एवं इनसे संबंधित लोगों के आंकड़े साख मूल्यांकन और जोखिम निर्धारण को बेहतर बना सकते हैं। लाहिड़ी ने कहा कि इससे अनौपचारिक क्षेत्र की कंपनियों तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को औपचारिक ऋण व्यवस्था के दायरे में लाने में मदद मिल सकती है।

भुगतान तंत्र का बड़ा दायरा इसे संभव बना सकता है। अगस्त में यूपीआई के जरिये 29.82 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 24.51 अरब लेनदेन पूरे हुए जिसमें मात्रा में सालाना लगभग 22 फीसदी की वृद्धि हुई। उपभोक्ताओं और व्यवसायों द्वारा यूपीआई का बढ़ता इस्तेमाल आर्थिक गतिविधियों का एक व्यापक डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर रहा है जो संभावित रूप से ऋणदाताओं को उन उधारकर्ताओं का आकलन करने में मदद कर सकता है जिन्हें पारंपरिक ऋण व्यवस्था से पर्याप्त मदद नहीं मिल पाती है।

यह समस्या छोटे व्यवसायों के लिए खास तौर पर गंभीर है। हो सकता है कि किसी दुकान के पास जांचे (ऑडिट) गए खातों, रेहन रखने लायक बड़ी संपत्ति या साख का लंबा-चौड़ा रिकॉर्ड न हो फिर भी वह नियमित रूप से डिजिटल माध्यम से भुगतान हासिल कर रहा हो। ऐसे लेनदेन से राजस्व, लेनदेन की बारंबारता, मौसमी उतार-चढ़ाव और नकदी प्रवाह की स्थिरता के बारे में जानकारी मिल सकती है।

बेहतर जानकारी से सूचना की असमानता कम हो सकती है, जोखिम का अधिक सटीक आकलन हो सकता है और कर्ज देने वाले जोखिम के हिसाब से सही कीमत तय कर सकते हैं। इसमें बहुत बड़ा अवसर मौजूद है। डेलॉयट के अनुमान के मुताबिक ऋण में एमएसएमई का हिस्सा अभी भी कम है जो लगभग 14 फीसदी है। समस्या केवल मांग की कमी की नहीं है। पारंपरिक आंकड़ों की कमी, गिरवी रखने लायक संपत्ति की सीमा और कम मूल्य वाले कर्ज चुकाने का अधिक बोझ औपचारिक कर्ज आवंटन की राह में बाधा बनी हुई है।

यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (यूएलआई) इस मोर्चे पर यूपीआई का पूरक बन सकता है। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के इनोवेशन हब द्वारा विकसित यूएलआई का मकसद कई डेटा प्रदाताओं से ऋण देने वालों तक वित्तीय और गैर-वित्तीय जानकारियों का सहमति-आधारित प्रवाह सुनिश्चित करना है।

ब्यूरो स्कोर, आय विवरण और रेहन रखने लायक संपत्ति पर मुख्य रूप से निर्भर रहने के बजाय ऋणदाता लेनदेन के पुराने आंकड़ों के साथ-साथ जमीन से जुड़ी जानकारियों, संपत्ति के मालिकाना हक और अन्य वित्तीय जानकारियों जैसी सत्यापित जानकारी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे होने वाला संभावित लाभ केवल तेजी से ऋण आवंटन की प्रक्रिया पूरी होना ही नहीं है। बेहतर सूचना ढांचा छोटे कर्जदारों को बैंक से कर्ज पाने के लिए पात्र बना सकता है और उन क्षेत्रों में कर्ज देने की लागत कम कर सकता है जहां पारंपरिक मूल्यांकन महंगा होता है।

हालांकि, इसकी कुछ अहम सीमाएं भी हैं। यूपीआई रसीद पैसे के लेनदेन का सबूत होती है न कि आय या मुनाफे का। इससे लागत, मार्जिन, देनदारियों या नकद लेनदेन के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। लिहाजा, बेहतर साख मूल्यांकन की जगह लेने के बजाय, वैकल्पिक आंकड़े उनके पूरक होने चाहिए।

साथ ही, कमजोर डिजिटल पहुंच के आधार पर उन उधारकर्ताओं को वंचित नहीं किया जाना चाहिए जो नकद में लेनदेन करते हैं। संचालन संबंधी चुनौतियां भी हैं। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा का यह कहना दुरुस्त है कि फिनटेक कंपनियां ग्राहकों की जानकारियों को कारोबारी परिसंपत्ति समझने के बजाय ‘न्यासी उत्तरदायित्व’ मानती हैं। यूएलआई और डेटा-आधारित ऋण आवंटन के लिए सहमति, निजी जानकारियों की सुरक्षा, अंतर-परिचालन और भेदभावपूर्ण या अपारदर्शी एल्गोरिद्म से सुरक्षा की जरूरत होगी। मकसद एक ऐसा सुरक्षित प्रणाली बनाना होना चाहिए जो लोगों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़े।

First Published : September 16, 2026 | 9:00 PM IST