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भारत की उभरती एकदलीय राजनीति में कांग्रेस के लिए खुला नया रास्ता

चुनाव भले ही नगर निकाय का हो रहा हो, जहां कांग्रेस का वजूद ही न हो, भाजपा और नरेंद्र मोदी हमेशा उसे ही निशाना बनाते दिखते हैं

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शेखर गुप्ता   
Last Updated- July 19, 2026 | 10:07 PM IST

महज दो सप्ताह पहले मैंने इसी स्तंभ में लिखा था कि कैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लोक सभा में बहुमत से दूर होने के बाद भी देश को एकदलीय व्यवस्था की ओर ले जा रही है। संसद के मॉनसून सत्र में इसका भी परीक्षण होगा। इस दौरान स्पष्ट हो सकता है कि भारत एकदलीय देश बनता जा रहा है। बेशक इसका दूसरा पहलू भी होगा। किसी दूसरी पार्टी के उभरने की संभावना भी होगी बशर्ते वह उन क्षेत्रीय पार्टियों के बचे-खुचे वोट बैंक को समेट ले, जिन्हें भाजपा या तो खत्म कर रही है या खुद में मिला रही है।

विडंबना है कि भाजपा की यह अविश्वसनीय जीत ही कांग्रेस को मौका देगी, जिससे वह देश भर में भगवा पार्टी को चुनौती देने वाली इकलौती पार्टी के रूप में अपनी ताकत फिर हासिल कर सकती है। मुझे पता है कि कांग्रेस के कट्टर विरोधी भी इस पर संशय करेंगे और बार-बार निराश हुए समर्थक भी। लेकिन मोदी, शाह और भाजपा इससे सहमत होंगे। उन्हें पता है कि उनके सामने चुनौती कांग्रेस से ही आती है। मोदी के हाल के वर्षों के चुनावी भाषण देखें। वह कांग्रेस और गांधी परिवार पर ही सबसे अधिक हमला करते हैं।

राज्यों के चुनावों में भी यही दिखता है। आंध्र प्रदेश में मोदी ने बार-बार कहा कि अपनी तुष्टीकरण की नीति के कारण कांग्रेस ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का बहिष्कार किया। झारखंड में कांग्रेसी मंत्री के सहयोगी के घरेलू सहायक के घर से नकदी बरामद होने का मामला उठाते हुए उन्होंने पूछा कि पार्टी ने अपने पैसे के गोदाम कहां-कहां बना रखे हैं। आंध्र प्रदेश में भी यही सवाल उठाया गया जहां कांग्रेस को 2024 के आम चुनाव में केवल 2.74 प्रतिशत वोट मिले। ओडिशा में जहां कांग्रेस का नामलेवा नहीं है, उन्होंने पूछा कि क्या कांग्रेस का ‘शहजादा’ 2014 वाली स्क्रिप्ट ही पढ़ रहा है।’

बिहार में जहां कांग्रेस, यादव परिवार की सहयोगी है, उन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति के लिए बार-बार उसे निशाना बनाया। जिस पश्चिम बंगाल में भाजपा की एकमात्र प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस थी, वहां उन्होंने कांग्रेस को उसके साथ जोड़ते हुए कहा कि दोनों ने मिलकर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण रोकने की साजिश की।

चाहे ऐसा नगरपालिका चुनाव ही क्यों न हो, जहां कांग्रेस का वजूद ही नहीं, भाजपा वहां भी उसे ही निशाना बनाती है। यह प्रमाण है कि मोदी कांग्रेस को अपनी एकमात्र संभावित चुनौती मानते हैं। वे इतने चतुर हैं कि उसे नगण्य बताकर तिरस्कारपूर्वक खारिज नहीं करते।

मॉनसून सत्र में इस तर्क की परीक्षा इस बात से होगी कि भाजपा दलबदल, समावेशन या अनुपस्थिति के जरिये दो-तिहाई बहुमत जुटा पाती है या नहीं। और फिर संसद का आकार बढ़ाने, नया परिसीमन करने और उसके भीतर महिलाओं के आरक्षण विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन कर पाती है या नहीं। अपनी केवल 240 सीटें होने के बाद भी 362 या उससे अधिक का दो-तिहाई बहुमत हासिल करना वाकई राजनीतिक चमत्कार होगा।

इसके बाद भाजपा की नजर अगले साल की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब तथा बाद में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों पर होगी। उसके अगले साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ होंगे। मैं लोकसभा में 10 से अधिक सदस्य देने वाले राज्य ही गिना रहा हूं। इनमें से अधिकांश में कांग्रेस ही भाजपा की मुख्य चुनौती होगी। इसलिए भाजपा का कांग्रेस-विरोधी सुर तीखा होता जाएगा।

लेकिन भाजपा की नजर 2029 और उससे आगे है। उसे प्रतिद्वंद्वी कौन लगता है? उसे 240 सीटों तक रोकने वाले क्षेत्रीय और जाति आधारित दलों में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सिवा ज्यादातर खत्म हो चुके हैं। भाजपा ने उन्हें विभाजन, दलबदल या ऑपरेशन लोटस के जरिये खत्म कर दिया है। भाजपा से हारकर कोई क्षेत्रीय दल बच नहीं सका। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) शायद अपनी विचारधारा के साथ जीवित रहे लेकिन तमिलनाडु में भाजपा का वजूद ही नहीं है। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) ने भाजपा के साथ गठबंधन किया है। उनके प्रतिद्वंद्वी वाईएस जगन मोहन रेड्डी की युवजन श्रमिक रैयतु कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) भी भाजपा से नहीं लड़ेगी।

इंडिया ब्लॉक के कई सहयोगी दल या तो खत्म हो चुके हैं, टूट चुके हैं या छटपटा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास भविष्य के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। क्या वह भाजपा को ललकारने वाली इकलौती पार्टी बनने का साहस कर सकती है? कांग्रेस के पास 21 प्रतिशत वोट का स्थायी बैंक है। भाजपा को 2024 में लगभग 37 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस को 37 प्रतिशत तक पहुंचने की जरूरत नहीं है। यदि वह केवल 5 प्रतिशत और जोड़ ले तो भाजपा का खेल बिगाड़ सकती है।

माना जा सकता है कि इनमे से ज्यादातर वोट भाजपा से ही आएंगे क्योंकि कांग्रेस के साथ मुकाबलों में भाजपा ही सबसे सफल रही है। भाजपा के वोट 30-32 प्रतिशत रह गए तो उसकी सीटें 200 तक सिमट जाएंगी। तब भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) बिल्कुल अलग होगा। हालांकि यह बात केवल कहने के लिए है मगर भाजपा इससे पूरी तरह वाकिफ है। यही कारण है कि प्रतिद्वंद्वी चाहे तृणमूल हो, बीजू जनता दल हो या वाईएसआरसीपी, उसकी दुश्मन कांग्रेस ही रहती है।

चूंकि हम सैद्धांतिक बात कर रहे हैं, इसलिए जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा जुलाई 2026 में प्रकाशित ‘जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी’ में छपा राजनीति विज्ञानी एडगर सार और पेलिन आयन मुसिल का लेख पढ़ें। इसका शीर्षक भारत में बेहद अप्रत्याशित लगेगा जहां मजबूत सत्ताधारी पार्टी को हराने का इकलौता तरीका गठबंधन ही माना जाता है। कांग्रेस युग में भाजपा ने राजग बनाया और फिर कांग्रेस ने उसका जवाब संप्रग से दिया। लेकिन जॉन्स हॉपकिन्स का यह लेख हंगरी तथा तुर्किये के उदाहरण देकर तस्वीर उलट देता है।

लेखक कहते हैं, ‘यह निबंध विद्वानों और रणनीतिकारों के बीच बनी उस सहमति को उलटता है कि प्रतिस्पर्धी अधिनायकवादी प्रणालियों में चुनाव पूर्व बने व्यापक गठबंधन ही प्रभुत्वशाली दलों को हटा सकते हैं।’ उनके मुताबिक इसके सबूत दो चौंकाने वाले उलटफेरों में है। पहला हंगरी है, जहां 2026 में टिस्जा पार्टी ने अकेले ही ऑर्बान की फिदेज को पराजित किया और दूसरा तुर्किये है, जहां 2024 में रिपब्लिकन पीपल्स पार्टी ने अकेले लड़कर ऐतिहासिक स्थानीय चुनाव जीते।

हंगरी में फिदेज के असंतुष्ट पीटर माग्यार ने नई पार्टी बनाई और ऑर्बान को केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा। विचारधारा में वह भी ऑर्बान जितने ही दक्षिणपंथी हैं। तुर्किये में रिपब्लिकन पीपल्स पार्टी ने खुद को नया रूप दिया और ‘विस्तृत विपक्षी मतदाता वर्ग’ को अपने भीतर समेट लिया। यह मतदाता वर्ग अहम है। यह भारत सहित हर लोकतंत्र में होता है। इस वोट को एकजुट करने के लिए विपक्ष ने अभी तक बहुदलीय गठबंधन बनाने की कोशिश की है। क्या कांग्रेस अब अकेले हिम्मत कर सकती है?

हमने श्रीलंका और नेपाल में देखा कि ताकतवर सत्ताधारियों को हराया जा सकता है। मैं बांग्लादेश की बात नहीं कर रहा क्योंकि वहां चुनाव सत्ताधारी दल पर प्रतिबंध लगाने के बाद हुए। श्रीलंका और नेपाल में नए नेता नई सोच तथा एकदलीय चुनौती के साथ आए।

क्या कांग्रेस खुद को नए सिरे से गढ़ सकती है? वाम-दक्षिण का द्वंद्व काम नहीं करेगा क्योंकि कल्याणकारी योजनाओं, वितरणवादी अर्थशास्त्र, सार्वजनिक क्षेत्र और सब्सिडी के मामले में मोदी कांग्रेस से भी अधिक वामपंथी हैं। मोदी की नीतियों, विदेशी सम्मान पाने की प्रवृत्ति, भाषा, शैली का मजाक उड़ाने से सोशल मीडिया पर रीट्वीट तो मिल सकते हैं मगर मोदी के कारण भाजपा को मिलने वाले 15 प्रतिशत वोट अधिक वोटों पर फर्क नहीं पड़ेगा।

कांग्रेस को नई सोच और एजेंडा चाहिए। वह कहती है कि भाजपा चीन और डॉनल्ड ट्रंप के सामने झुक रही है, पाकिस्तान से नहीं लड़ सकती, इजरायल से बहुत मित्रवत है लेकिन कांग्रेस खुद इन सबका सामना कैसे करेगी? बदली हुई दुनिया में कांग्रेस की विदेश नीति, सामरिक नीति और आर्थिक नीति क्या होगी? वह कहती है कि मोदी के वृद्धि के आंकड़े झूठे हैं। तो वह भारत को 8 प्रतिशत वृद्धि दर तक कैसे ले जाएगी?

सबसे बड़ी विडंबनाएं अक्सर सबसे कठोर हकीकतों में छिपी होती हैं जैसे सबसे बड़े संकट में अवसर छिपे होते हैं। क्षेत्रीय दलों के जाने के बाद नया एकदलीय तंत्र अब दो दलीय मुकाबले का रास्ता खोल सकता है। बस, चुनौती देने वाली पार्टी में सत्ताधारी को अकेले चुनौती देने के लिए साहस, महत्त्वाकांक्षा और नई सोच होना जरूरी है।

First Published : July 19, 2026 | 9:58 PM IST