इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
एक पुराना चीनी शाप कहता है, ‘ईश्वर करे तुम्हारा दिलचस्प समय आए।’ यह कहावत सुनने वाले के लिए ‘अव्यवस्था, अनिश्चितता और उथल-पुथल’ की कामना करती है। यही पिछले छह हफ्तों में दुनिया का सार है, जब अमेरिका और इजरायल ने जंग छेड़ी। इस युद्ध ने गैस की कमी, व्यापक आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान और तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दी है। हम इस अनिश्चितता, अशांति और अव्यवस्था की दुनिया से प्रभावी ढंग से कैसे निपट सकते हैं? जैसे-जैसे हम तात्कालिक चुनौतियों से निपट रहे हैं, हमें दीर्घकालिक सुदृढ़ता की अपनी आवश्यकता पर भी ध्यान देना होगा।
तात्कालिक प्रवृत्ति यही होगी कि हम अपने भीतर झांकें और आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ें। परंतु पूरी दुनिया और भारत भी, दूसरे देशों पर इतना अधिक निर्भर है कि यह एक प्रभावी रणनीति नहीं हो सकती है। वर्ष 2020 में गलवान के बाद हमने चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश की। विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाए और आयात को सीमित करने की कोशिश की। इसका नतीजा क्या हुआ? चीन को हमारा माल निर्यात 20 अरब डॉलर से कम पर ठहर गया। चीन से हमारा आयात दोगुना यानी 60 अरब डॉलर से बढ़कर 120 अरब डॉलर से अधिक हो गया। इसके चलते व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर का स्तर पार कर गया।
आत्मनिर्भरता का विकल्प है परस्पर-निर्भरता। यानी ऊर्जा के लिए, विशेष मशीनरी के लिए, विमान के लिए, मध्यवर्ती रसायनों के लिए, कुछ इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिए हम दूसरों पर निर्भर रहेंगे। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दूसरे भी हम पर उतने ही निर्भर हों, उन चीजों के लिए जो केवल हम प्रदान कर सकते हैं, या उन उत्पादों और लागतों के लिए जो विशिष्ट रूप से बेहतर हों। यहां हमें काम करना है। भारत को दुनिया के लिए कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बनना होगा। इसके लिए घरेलू मजबूती और अंतरराष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा दोनों की आवश्यकता है।
हमारी अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की बुनियादी स्थिति मजबूत है। उचित वृद्धि, कम महंगाई, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, और मजबूत बैंक तथा कंपनी बैलेंस शीट आदि इसके उदाहरण हैं। इसलिए, जब हम वर्तमान व्यवधान से निपट रहे हैं तो हमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर काम करना होगा। घरेलू मजबूती एक मजबूत अर्थव्यवस्था से आएगी, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और महत्त्वाकांक्षी कंपनियों पर आधारित होगी।
हमें सही कंपनियों की जरूरत है। प्रतिस्पर्धात्मकता को नीति के माध्यम से लागू करना होगा। इसका सबसे अच्छा तरीका है दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों से आयात के लिए खुले रहना। आगे बढ़ते हुए, वास्तव में प्रतिस्पर्धी कंपनी की एक अच्छी कसौटी है निर्यात। क्या हम अपने मुख्य व्यवसाय में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों से उनके ही घरेलू मैदान में सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं?
1991 के बाद के सुधारों की विशेषता कंपनियों में बदलाव रही, जहां कम प्रतिस्पर्धी कंपनियां बाहर हो गईं और अधिक सफल कंपनियां फली-फूलीं। सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाएं और औषधि उद्योग जैसे नए क्षेत्र प्रमुखता से उभरे, जिन्होंने हमारी सबसे सफल कंपनियां पैदा कीं। उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता विश्व बाजारों में सफलता से सिद्ध हुई। लेकिन यह बदलाव 2000 के दशक से कम हो गया। हमें इसे फिर से शुरू करने की आवश्यकता है।
हमें स्वामित्व वाली (प्रोपराइटरी) तकनीक में निवेश करना चाहिए। जैसा कि इस स्तंभ में भी लंबे समय से तर्क दिया है, भारतीय उद्योग को अपने आंतरिक शोध एवं विकास में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। एक अच्छा लक्ष्य यह होगा कि हम शोध एवं विकास में निवेश को अपने वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.3 फीसदी से पांच गुना बढ़ाकर विश्व औसत 1.5 फीसदी तक पहुंचें।
लेकिन इससे भी अधिक उपयोगी यह होगा कि अपने उद्योग की शीर्ष 10 या 20 कंपनियों के साथ गंभीर मानक तय किए जाएं। वे बिक्री के फीसदी के रूप में कितना निवेश करते हैं? उनके पास शोध एवं विकास में कितने लोग हैं? उनकी योग्यताएं क्या हैं? और उनका शोध एवं विकास हर वर्ष क्या उत्पादन करता है या नतीजे देता है? कौन से नए उत्पाद आए, कौन से पेटेंट और डिजाइन पंजीकरण हुए, कौन से नए व्यवसायों और बाजारों में प्रवेश हुआ? और इन सभी मानकों पर बेहतर करने का लक्ष्य रखा जाए।
इसका अधिकांश हिस्सा उन कार्यों से संबंधित है जो कंपनियों को स्वयं करने चाहिए, एक ऐसे नीतिगत वातावरण के समर्थन से जो प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे। घरेलू मजबूती के लिए उद्योग और राज्य दोनों की समान रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं हैं।
घरेलू उद्योग का दूसरा पक्ष है अंतरराष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा। हमारे मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की तेजी से चल रही वार्ताएं स्वागतयोग्य हैं। हमें इन समझौतों का उपयोग एक मजबूत रणनीतिक संबंध बनाने के लिए करना चाहिए। पश्चिम एशिया में हमारे करीबी संबंध हमें युद्ध से प्रभावित क्षेत्र के पुनर्निर्माण और सुधार में गहराई से शामिल होने में मदद कर सकते हैं। यूरोपीय संघ का एफटीए यूरोप और भारत के लिए रक्षा और शिक्षा से लेकर संस्कृति तक हर क्षेत्र में संबंधों को गहरा करने का अवसर है।
हमें एशिया के अधिकांश हिस्सों के साथ भी रिश्ते गहरे करने की जरूरत है। हमारी ‘ऐक्ट ईस्ट’ (पूर्वी देशों के साथ सक्रिय रिश्ते) नीति को नारे से आगे बढ़कर वास्तव में क्रियान्वित होना चाहिए। कम से कम हम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान), जापान और दक्षिण कोरिया के साथ मौजूदा व्यापार समझौतों को नवीनीकृत और मजबूत कर सकते हैं।
हम व्यापक और प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते (सीपीटीपीपी) में शामिल होने पर विचार कर सकते हैं, जो प्रशांत क्षेत्र की 11 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण ब्रिटेन को एक साथ लाता है। यह एक गहरा और व्यापक समझौता है, जिसमें सरकारी खरीद से लेकर निवेश तक हर चीज के लिए उच्च मानक हैं। यह अध्ययन करना कि हमारी पात्रता के लिए किन चीजों में बदलाव जरूरी है, उपयोगी घरेलू सुधारों की पहचान करने में सहायक हो सकता है, भले ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि यह अभी हमारे राष्ट्रीय हित में नहीं है।
हम ग्लोबल साउथ या वैश्विक विकासशील देशों की आवाज होने का दावा करते हैं लेकिन शायद अन्य देश ऐसा नहीं महसूस करते। एक उपयोगी दृष्टिकोण यह हो सकता है कि हम विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र में साझा रुख अपनाएं, और अफ्रीका में संबंधों और व्यापार का विस्तार करें। हमें लैटिन अमेरिका में भी नए सिरे से रुचि लेनी चाहिए, जहां कई क्षेत्रों में गहरी समानता है। जिसमें पारिवारिक व्यवसाय का महत्त्व और एक ऐसा विविध समाज शामिल है, जो पारिवारिक संबंधों को समान महत्त्व देता है।
जहां राज्य उन सभी देशों के साथ करीबी संबंध सुनिश्चित करने में नेतृत्व कर सकता है जो हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं, वहीं उद्योग को अपने विदेशी निवेश के साथ उस नेतृत्व के अनुरूप कार्य करना चाहिए। हमारी औद्योगिक महत्त्वाकांक्षा एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति बनाने की होनी चाहिए। हमारी अग्रणी कंपनियां यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया में एक साथ काम करने में सहज कैसे हों? भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के श्रीलंका, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, ओमान और मिस्र जैसे विविध देशों में गए प्रतिनिधिमंडलों को यह संदेश मिला है कि वहां भारतीय कंपनियों की सक्रिय मांग है। हमें इस दिशा में आगे काम करना चाहिए।
वास्तव में हमारे लिए पूरी दुनिया है। चीन को छोड़कर शेष एशिया हमारे जीडीपी का तीन गुना है। पश्चिम एशिया, तुर्किये और अफ्रीका मिलकर 5 लाख करोड़ डॉलर से अधिक जोड़ते हैं, और लैटिन अमेरिका 7 लाख करोड़ डॉलर से अधिक। इन्हें जोड़ें तो हमारे पास अमेरिका या चीन से बड़ा बाजार है। यूरोपीय संघ इसे दोगुना कर देता है। आज, हमारी आईटी सेवाएं, औषधि उद्योग, और वस्त्र एवं परिधान, वाहन कलपुर्जे और इंजीनियरिंग उद्योगों की कुछ कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्षम हैं। भारतीय उद्योग को उनका अनुसरण करना चाहिए। हमारी कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर हैं और उन्हें विविधता लाने की आवश्यकता है। पिछले वर्ष ट्रंप के शुल्क संबंधी कदमों ने इसे लेकर एक उपयोगी संकेत दिया है।
घरेलू मजबूती और अंतरराष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा का संयोजन भारत पर निर्भरता पैदा कर सकता है। सरकार की नीतियां और भारतीय उद्योग मिलकर काम करें तो भारत दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण बन सकता है और एक परस्पर-निर्भर भविष्य प्रदान कर सकता है।
(लेखक फोर्ब्स मार्शल के सह-अध्यक्ष, नयनता विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्य, सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष और सेंटर फॉर टेक्नॉलजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च के वर्तमान अध्यक्ष हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)