जब कोई म्युचुअल फंड कंपनी अपनी नई स्कीम पहली बार निवेशकों के लिए खोलती है, तो इसे न्यू फंड ऑफर (New Fund Offer) यानी NFO कहा जाता है। NFO के जरिए फंड कंपनी निवेशकों से पैसा जुटाती है और बदले में उन्हें स्कीम की यूनिट देती है। शुरुआत में आमतौर पर एक यूनिट की कीमत 10 रुपये रखी जाती है। ऐसे में पहली बार निवेश करने वाले लोगों को लग सकता है कि 10 रुपये में मिलने वाली यूनिट सस्ती है। लेकिन क्या कम कीमत का मतलब वास्तव में सस्ता फंड और ज्यादा रिटर्न की संभावना है? ऐसा जरूरी नहीं है। इसकी वजह समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि म्युचुअल फंड की एक यूनिट की कीमत यानी नेट एसेट वैल्यू (Net Asset Value) या NAV कैसे तय होती है।
NAV क्या होती है?
नेट एसेट वैल्यू यानी NAV आसान शब्दों में किसी म्युचुअल फंड की एक यूनिट की कीमत होती है। लेकिन यह कीमत तय कैसे होती है? इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि म्युचुअल फंड आपके पैसे के साथ क्या करता है। फंड कई निवेशकों से पैसा जुटाता है और फिर स्कीम के हिसाब से उसे शेयर, बॉन्ड या दूसरी जगहों पर निवेश करता है।
अब फंड ने जहां-जहां पैसा लगाया है, उन सभी निवेशों की मौजूदा कीमत जोड़ी जाती है। इसमें से फंड को चुकाई जाने वाली रकम घटा दी जाती है। इसके बाद जो रकम बचती है, उसे फंड की कुल यूनिटों की संख्या से बांट दिया जाता है। इसी हिसाब से एक यूनिट की NAV निकलती है।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए सभी जरूरी रकम घटाने के बाद किसी फंड के निवेश की कुल कीमत 10 लाख रुपये है और उसकी कुल 1 लाख यूनिट हैं। ऐसे में 10 लाख रुपये को 1 लाख यूनिट से बांटने पर एक यूनिट की NAV 10 रुपये होगी। अब फंड ने जिन जगहों पर पैसा लगाया है, उनकी कीमत बढ़ेगी तो फंड की कुल कीमत भी बढ़ सकती है और इसका असर NAV पर पड़ेगा। इसी तरह निवेश की कीमत घटने पर NAV भी नीचे आ सकती है।
बाजार के साथ क्यों बदलती है NAV?
एक बार NAV तय होने के बाद वह हमेशा उसी स्तर पर नहीं रहती। इसकी वजह यह है कि फंड ने जिन शेयरों, बॉन्ड या दूसरी जगहों पर पैसा लगाया है, उनकी कीमत समय के साथ बदलती रहती है। जब इन निवेशों की कुल कीमत बढ़ती है, तो फंड की NAV भी बढ़ सकती है। वहीं, इनकी कीमत घटने पर NAV भी नीचे आ सकती है।
मसलन, किसी फंड की NAV आज 10 रुपये है और उसके निवेश की कीमत आगे बढ़ती है, तो उसकी NAV भी 10 रुपये से ऊपर जा सकती है। इसी तरह निवेश की कीमत घटने पर NAV 10 रुपये से नीचे भी आ सकती है। यानी NAV में होने वाला बदलाव फंड के निवेश की कीमत में आए बदलाव से जुड़ा होता है।
क्या 10 रुपये की NAV का मतलब सस्ता फंड है?
अब सवाल आता है कि अगर NFO में एक यूनिट 10 रुपये में मिल रही है, तो क्या वह फंड सस्ता है? इसका जवाब है, जरूरी नहीं। 10 रुपये सिर्फ उस नई स्कीम की शुरुआती कीमत होती है। इससे यह तय नहीं होता कि फंड आगे ज्यादा रिटर्न देगा या निवेश के लिए बेहतर है।
इसे उदाहरण से समझें। एक नए फंड की NAV 10 रुपये है और कई साल से चल रहे दूसरे फंड की NAV 100 रुपये है। सिर्फ कीमत देखकर 10 रुपये वाले फंड को सस्ता और 100 रुपये वाले को महंगा नहीं कहा जा सकता। पुराने फंड की NAV उसके निवेश की कीमत समय के साथ बढ़ने के कारण 100 रुपये तक पहुंची हो सकती है। इसलिए फंड चुनते समय NAV कम या ज्यादा होने के बजाय यह देखना जरूरी है कि फंड पैसा कहां लगाता है, उसमें कितना जोखिम है और वह आपके निवेश के मकसद के हिसाब से सही है या नहीं।
(सोर्स: सेबी, एम्फी)
