प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
आज के दौर में अगर आप किसी के हाथ में नया आईफोन देखें या किसी को मालदीव की तस्वीरों में मुस्कुराते हुए पाएं, तो यह जरूरी नहीं कि उनके बैंक अकाउंट में लाखों रुपये जमा हों। हो सकता है कि यह सब ‘नो-कॉस्ट EMI’ और ‘बाय नाउ पे लेटर’ (BNPL) का कमाल हो। कभी जो कर्ज एक मजबूरी माना जाता था, आज वह एक ‘लाइफस्टाइल चॉइस’ बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुविधा हमें बेहतर जीवन दे रही है, या चुपके से हमारी ‘फाइनेंशियल फ्रीडम’ छीन रही है?
आज के समय में गैजेट्स से लेकर ग्रॉसरी तक, लगभग हर चीज किस्तों पर मिल रही है। ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर और फाइनेंशियल सर्विसेज के रिस्क लीडर विवेक अय्यर कहते हैं कि क्रेडिट का मकसद सैलरीड लोगों को थोड़ी तरलता (liquidity) देना था, ताकि वे अपनी जरूरत की चीजें आसानी से खरीद सकें और उनकी लाइफस्टाइल बेहतर हो सके। इसका मूल विचार यह था कि लोग अपने ‘पर्सनल फाइनेंशियल मैनेजमेंट’ के नियमों से समझौता किए बिना अच्छी चीजों तक पहुंच बना सकें। लेकिन जब बाजार की चमक-दमक और ज्यादा खर्च करने की होड़ बढ़ने लगती है, तो यही सुविधा धीरे-धीरे एक जाल में बदलने लगती है।
क्रेडिट मिलना अपने-आप में कोई बुरी बात नहीं है। असल में अगर सही समझदारी हो, तो क्रेडिट तक पहुंच लोगों को आर्थिक तौर पर आगे बढ़ने में मदद ही करती है। दिक्कत तब शुरू होती है जब कर्ज लेने की मांग और कर्ज देने की आपूर्ति के बीच संतुलन बिगड़ने लगता है।
विवेक अय्यर का कहना है कि अगर ग्राहक जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने लगें या बैंक और वित्तीय संस्थान (Financial Institution) जरूरत से ज्यादा कर्ज बांटने लगें, तो इससे पूरे फाइनेंशियल सिस्टम के लिए खतरा पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति को ही व्यवस्थित जोखिम यानी ‘Systemic Risk’ कहा जाता है।
आज ‘Buy Now, Pay Later’ जैसी स्कीम्स आपको यह महसूस कराती हैं कि आप अभी कुछ भी खरीद सकते हैं और बाद में पैसे दे देंगे। लेकिन अक्सर ये यह नहीं बतातीं कि इसके बदले आपकी आने वाली कमाई का एक हिस्सा पहले ही तय हो जाता है।
अय्यर कहते हैं, “तेजी से बढ़ता ‘उपभोक्तावाद’ अब बचत और निवेश के संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है। कई लोग भविष्य के लिए पैसा बचाने या निवेश करने के बजाय आज की जरूरतों और सुविधाओं को ज्यादा अहमियत देने लगे हैं। हालांकि इसके लिए सिर्फ लोन देने वाली कंपनियों या स्कीम्स को दोष देना भी पूरी तरह सही नहीं है। एक जागरूक उपभोक्ता के तौर पर हमारी जिम्मेदारी भी बनती है कि हम ऐसी स्कीम्स की शर्तों को ध्यान से पढ़ें, समझें और जरूरत पड़ने पर सही सवाल पूछें।”
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अय्यर के मुताबिक, पर्सनल फाइनेंस में एक बहुत आसान और काम का नियम माना जाता है 50:30:20 का फॉर्मूला। वो कहते हैं, “आपकी कमाई का करीब 50% हिस्सा रोजमर्रा के जरूरी खर्चों जैसे खाना, कपड़ा और घर पर जाना चाहिए। करीब 30% पैसा निवेश के लिए रखना चाहिए और कम से कम 20% रकम इमरजेंसी के लिए बचाकर रखनी चाहिए।”
लेकिन जब हमारी लाइफस्टाइल EMI के भरोसे चलने लगती है, तो सबसे पहले इसी 30% निवेश और 20% इमरजेंसी फंड वाले हिस्से पर असर पड़ता है। यानी बचत और भविष्य की सुरक्षा धीरे-धीरे कम होने लगती है।
जब आपकी सैलरी का बड़ा हिस्सा हर महीने EMI में कटने लगता है, तो निवेश के लिए जगह ही नहीं बचती। ऐसे में इमरजेंसी फंड बनाना भी मुश्किल हो जाता है।
अय्यर का कहना है कि EMI को भी 50:30:20 के नियम के नजरिए से ही देखना चाहिए। अगर आपकी किस्तें उस पैसे को खा रही हैं जो निवेश या इमरजेंसी फंड के लिए होना चाहिए, तो यह चेतावनी का संकेत है। इसका मतलब है कि आप ‘फाइनेंशियल फ्रीडम’ की तरफ नहीं, बल्कि धीरे-धीरे डेट ट्रैप यानी कर्ज के जाल की तरफ बढ़ रहे हैं।
आजकल शॉपिंग ऐप्स और मार्केटिंग का तरीका ऐसा हो गया है कि वे आपको उन चीजों की भी जरूरत महसूस करा देते हैं, जिनके बारे में आपने पहले सोचा भी नहीं था। BNPL (Buy Now, Pay Later) जैसी स्कीम्स अक्सर बिना ब्याज वाले लोन का वादा करती हैं, जो सुनने में काफी आकर्षक लगता है।
लेकिन यही वह जगह है जहां थोड़ा सावधान रहने की जरूरत होती है। विवेक अय्यर कहते हैं कि ग्राहकों को ऐसी योजनाओं का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए। बिना ज्यादा सोचे लिया गया कर्ज, चाहे रकम छोटी ही क्यों न हो, धीरे-धीरे आपके लंबे समय के वित्तीय लक्ष्यों पर असर डाल सकता है।
अय्य बताते हैं कि आखिर में बात इतनी सी है कि क्रेडिट एक औजार की तरह है। अगर आप इसे समझदारी से इस्तेमाल करते हैं, तो यह आपकी जिंदगी को आसान बना सकता है। लेकिन अगर इसकी आदत पड़ जाए, तो यही चीज आपकी वित्तीय आजादी को सीमित भी कर सकती है।
वे कहते हैं, “असल अमीरी बैंक बैलेंस और निवेश से बनती है, न कि उन चीजों से जो आपने उधार के पैसों से खरीदी हों। इसलिए अगली बार जब आप ऑनलाइन खरीदारी करते समय ‘Checkout’ पर जाएं और EMI का विकल्प दिखे, तो एक पल रुककर खुद से जरूर पूछें कि क्या आपको सच में यह चीज चाहिए, या आप इसके बदले अपनी भविष्य की आर्थिक शांति गिरवी रख रहे हैं?”