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SEBI का बड़ा प्लान! विदेशी निवेशकों को वापस लाने की तैयारी, ट्रेडिंग नियमों में बड़े बदलाव संभव

SEBI Trading Reforms: SEBI विदेशी निवेशकों की निकासी रोकने के लिए ट्रेडिंग नियमों में बदलाव की तैयारी कर रहा है

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बीएस वेब टीम   
Last Updated- August 20, 2026 | 10:34 AM IST

SEBI Trading Reforms: भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी रोकने के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) कई बड़े सुधारों पर काम कर रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक प्रस्तावित बदलावों में नकद शेयर बाजार में जमानत की जरूरत घटाना, शेयरों की शॉर्ट सेलिंग आसान बनाना और लंबी अवधि के डेरिवेटिव सौदों को बढ़ावा देना शामिल है।

ये सुधार ऐसे समय प्रस्तावित किए जा रहे हैं, जब भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। वहीं, इस साल रुपया करीब 6 फीसदी कमजोर हुआ है और एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल है।

9 महीने में लागू हो सकते हैं बदलाव

सूत्रों के मुताबिक सेबी उद्योग से सलाह लेने और बाजार से जुड़े संस्थानों को अपनी मौजूदा प्रणाली बदलने के लिए समय देने के बाद करीब 9 महीने में ये सुधार लागू कर सकता है। हालांकि, कुछ बदलावों के कारण शुरुआती दौर में बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका है।

सेबी शेयरों को उधार लेकर बेचने की व्यवस्था यानी सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग को भी मजबूत करना चाहता है। इसके तहत उधार लेने और देने के लिए पात्र शेयरों की संख्या लगभग दोगुनी की जा सकती है। इससे नकद बाजार में शॉर्ट सेलिंग करना आसान होगा। सेबी ने इस मामले में रॉयटर्स की ओर से मांगी गई प्रतिक्रिया का तत्काल जवाब नहीं दिया।

50 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी निकासी

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 50 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है। वैश्विक एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भारत का भार भी सितंबर 2024 के 21 फीसदी के उच्च स्तर से घटकर 12 फीसदी से नीचे आ गया है। सूत्रों का कहना है कि प्रस्तावित सुधारों से वैश्विक शेयर सूचकांकों में भारत का भार बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

विदेशी निवेशक लंबे समय से भारतीय बाजार के नियमों को चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे प्रमुख एशियाई बाजारों के अनुरूप बनाने की मांग कर रहे हैं। इन देशों में शेयरों को उधार लेने-देने और समापन नीलामी के जरिये बंद भाव तय करने की व्यवस्था पहले से विकसित है।

वैश्विक सूचकांक उपलब्ध कराने वाली एमएससीआई ने कहा कि वह प्रस्तावित सुधारों और उनके प्रभाव पर बाजार भागीदारों की प्रतिक्रिया की निगरानी करेगी। इसके आधार पर भविष्य में भारतीय बाजार की वैश्विक पहुंच का आकलन किया जाएगा।

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निवेशकों की पूंजी आवश्यकता घटेगी

सेबी अत्यधिक तरल शेयरों में कारोबार के लिए जमानत की जरूरत कम करने पर भी विचार कर रहा है। सूत्रों के अनुसार इससे निवेशकों की शुरुआती पूंजी आवश्यकता 15 से 20 फीसदी तक घट सकती है।

एक साल से अधिक अवधि वाले डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए भी शुरुआती जमानत कम की जा सकती है। विदेशी परिसंपत्ति प्रबंधकों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था छोटी अवधि, विशेष रूप से साप्ताहिक डेरिवेटिव अनुबंधों को बढ़ावा देती है। इसके कारण लंबी अवधि की जोखिम सुरक्षा रणनीतियां अपनाना मुश्किल होता है। भारतीय बाजार में छोटी अवधि के डेरिवेटिव अनुबंधों में अधिक कारोबार होता है, जबकि लंबी अवधि वाले अनुबंधों में तरलता लगभग न के बराबर है।

संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर

सेबी पिछले दो वर्षों से डेरिवेटिव बाजार में सट्टेबाजी करने वाले छोटे निवेशकों की गतिविधियां सीमित करने के लिए कई कदम उठा चुका है। नियामक अब डेरिवेटिव बाजार में संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना चाहता है।

एनएसई के आंकड़ों के मुताबिक भारत के बाजार कारोबार में खुदरा निवेशकों का योगदान 35 फीसदी से अधिक है। इसके मुकाबले अमेरिका में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है और वहां कारोबार पर संस्थागत एवं पेशेवर निवेशकों का दबदबा है।

एनलिस्ट्स का मानना है कि कारोबार की लागत और प्रक्रियागत बाधाएं कम होने से विदेशी संस्थागत तथा निष्क्रिय निवेश को भारत की ओर आकर्षित करने में मदद मिल सकती है।

शुरुआती दौर में बढ़ सकता है उतार-चढ़ाव

कुछ प्रस्तावित बदलावों को लागू करना चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है। डेरिवेटिव अनुबंध वाले शेयरों का बंद भाव तय करने के लिए शुरू की गई नई समापन नीलामी व्यवस्था के शुरुआती सप्ताह में निफ्टी में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया। बाजार निर्माता और निवेशक भी इसमें सीमित संख्या में शामिल हुए।

विशेषज्ञों के मुताबिक बाजार को नई व्यवस्था के अनुरूप ढलने में समय लगेगा। लंबी अवधि में इन सुधारों से कारोबार की रुकावटें और लागत घट सकती हैं। हालांकि, केवल नियमों में बदलाव से ही भारत में विदेशी निष्क्रिय निवेश में बड़ी बढ़ोतरी होने की संभावना कम है। विदेशी निवेशक रुपये की चाल, कंपनियों के मूल्यांकन, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक परिस्थितियों जैसे दूसरे पहलुओं पर भी नजर रखेंगे।

 

(एजेंसी इनपुट के साथ)

First Published : August 20, 2026 | 10:34 AM IST