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कमोडिटी ट्रेडिंग में स्पीड का नया खेल! SEBI अगले साल ला सकता है कोलोकेशन नियम

SEBI colocation rules: सेबी अगले वर्ष से कमोडिटी बाजारों में को-लोकेशन सुविधा की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। वर्तमान में यह सुविधा केवल इक्विटी सेगमेंट में है

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सुशील मिश्र   
Last Updated- September 11, 2026 | 5:27 PM IST

SEBI colocation rules: बाजार नियामक सेबी ने कमोडिटी बाजार में व्यापक सुधार करने में लगा है। इसी के तहत भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) अगले वर्ष से कमोडिटी बाजारों में को-लोकेशन सुविधा की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। फिलहाल यह सुविधा केवल इक्विटी सेगमेंट में दो दशकों से उपलब्ध है। विशेषज्ञों का मानना है कि को-लोकेशन से ट्रेडर्स को तेजी से ऑर्डर निष्पादन, टाइटर स्प्रेड और बेहतर कीमतें मिलेंगी। इससे बाजार में तरलता बढ़ेगी और विदेशी निवेशकों की रुचि भी आकर्षित हो सकती है।

कोलोकेशन नियम लागू करने का क्या है मकसद

भारत के कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सेबी अपनी कमोडिटी डेरिवेटिव्स एडवाइजरी कमेटी के जरिए कमोडिटी एक्सचेंजों के लिए कोलोकेशन सुविधाएं शुरू करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इस संभावित कदम का मकसद ट्रेडिंग की क्षमता बढ़ाना, लिक्विडिटी को बढ़ावा देना और कमोडिटी एक्सचेंजों को इक्विटी और ग्लोबल मार्केट के बराबर लाना है।

कोलोकेशन क्या है और यह क्यों जरूरी है?

कोलोकेशन का मतलब है किसी ट्रेडिंग मेंबर के सिस्टम को एक्सचेंज के सर्वर के बहुत पास रखना। इस सेटअप से लेटेंसी (डेटा ट्रांसमिशन में देरी) कम होती है, जिससे ट्रेडर्स को मार्केट डेटा और एग्जीक्यूशन तक बहुत तेज़ी से पहुंच मिलती है। इक्विटी मार्केट में पहले से ही मौजूद कोलोकेशन, दुनिया भर में कुशल और तेज-तर्रार ट्रेडिंग के लिए एक बेंचमार्क बन गया है।

सेबी के मौजूदा नियमों के तहत, कमोडिटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में को-लोकेशन की इजाजत नहीं है। इस रोक की वजह से इक्विटी और कमोडिटी मार्केट के बीच रेगुलेटरी अंतर पैदा होता है, जिससे ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल प्लेयर्स की भागीदारी कम हो सकती है। ये प्लेयर्स अलग-अलग एसेट क्लास में बराबरी और टेक्नोलॉजी में एकरूपता चाहते हैं।

त्म होगा दूरी का खेल

ट्रेडिंग में जब कोई ऑर्डर पंच किया जाता है, तो उसे ट्रेडर के कंप्यूटर से एक्सचेंज के मैचिंग इंजन तक पहुंचने में कुछ सेकेंड का समय लगता है, जिसे लैटेंसी या नेटवर्क डिले कहा जाता है। अगर आपका सर्वर दिल्ली में है और एक्सचेंज का सर्वर मुंबई में, तो डेटा ट्रांसफर में समय लगेगा।

कोलोकेशन के तहत आपका सर्वर सीधे एक्सचेंज के ही सर्वर रूम (डेटा सेंटर) में रख दिया जाता है। इससे डेटा ट्रांसफर की दूरी न के बराबर रह जाती है, जिससे लैटेंसी घटकर माइक्रोसेकंड में आ जाती है।

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कमोडिटी मार्केट में कोलोकेशन के मुख्य लाभ

कोलोकेशन नियम पूरी तरह लागू होने के बाद कमोडिटी मार्केट में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। हर मिलीसेकंड की बचत से ऑर्डर्स बहुत तेजी से मैच होंगे, जिससे आक्रामक और हाई-स्पीड ट्रेडिंग रणनीतियों को आसानी से लागू किया जा सकेगा।

कोलोकेशन की अनुमति मिलने से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) और बड़े एल्गोरिक ट्रेडर्स भारतीय कमोडिटी मार्केट (विशेषकर क्रूड ऑयल, गोल्ड, सिल्वर जैसे नॉन-एग्रीकल्चर सेगमेंट) में भारी निवेश करेंगे। खरीद और बिक्री मूल्य का अंतर कम हो जाएगा, जिससे आम ट्रेडर्स को बेहतर और सटीक कीमतें मिल सकेंगी।

वैश्विक बाजारों के नजदीक आएगा भारतीय कमोडिटी बाजार

एंजेल वन के मुताबिक देश के दो बड़े कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स को-लोकेशन सर्विस देने के विचार पर सहमत हो चुके हैं। दूसरे कमोडिटी एक्सचेंज भी इस बात से सहमत हैं, क्योंकि वे मार्केट की गहराई, बेहतर स्प्रेड और बेहतर प्राइस डिस्कवरी के फायदों को समझते हैं।

अगर यह निमय लागू होता तो यह भारत के कमोडिटी बाजारों के विकास में एक अहम पड़ाव होगा। इससे ये बाज़ार वैश्विक मानकों के और करीब आएंगे और साथ ही पारदर्शिता और निष्पक्षता के प्रति सेबी की प्रतिबद्धता भी बनी रहेगी।

First Published : September 11, 2026 | 5:27 PM IST