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शेयर बाजार के नियमों में होगा बड़ा बदलाव, संसदीय समिति ने SMC Bill पर लगाई मुहर

संसदीय समिति ने प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक के अहम संशोधनों को समर्थन दिया है। इसमें निवेशक सुरक्षा, नियमन, आपराधिक प्रावधान और सेबी के अधिशेष कोष से जुड़े नियम शामिल हैं

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खुशबू तिवारी   
Last Updated- July 27, 2026 | 8:52 AM IST

वित्त पर संसदीय स्थायी समिति ने प्रतिभूति बाजार संहिता (एसएमसी) विधेयक में प्रमुख संशोधनों का समर्थन किया है। इन संशोधनों में नियामक के उद्देश्यों को परिभाषित करने के लिए स्पष्ट प्रस्तावना, एक धारा को समाप्त करके आपराधिक प्रावधानों पर सख्त सीमाएं लगाना और जांच नोटिस जारी करने पर अधिक स्पष्टता शामिल है। समिति ने नियामक के अधिशेष कोष का एक हिस्सा भारत के ‘कंसोलिडेटेड फंड’ में हस्तांतरित करने के अनिवार्य प्रावधान को बरकरार रखा है।

अहम बदलाव विधेयक की प्रस्तावना में किया गया है। इसमें निवेशकों के हितों की रक्षा, प्रतिभूति बाजार के विकास को बढ़ावा देने और प्रभावी नियमन सुनिश्चित करने के उद्देश्यों को शामिल किया गया है। यह बदलाव ‘सिक्योरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया एक्ट, 1992’, ‘सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1956’ और ‘डिपॉजिटरीज एक्ट, 1996’ को मिला देने से कहीं ज्यादा है।

इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (आईबीबीआई) के पूर्व चेयरमैन और सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य एमएस साहू ने कहा, ‘कमेटी ने सिफारिश की है कि संहिता के शुरुआती हिस्से में इसके संवैधानिक उद्देश्य को स्पष्ट तौर पर बताया जाना चाहिए। साथ ही, यह सुझाव भी बहुत अहम है कि बिल के आखिरी हिस्से यानी ‘डेलिगेटेड लेजिस्लेशन’ (सौंपे गए विधायी कार्यों) से जुड़े प्रतिवेदन में जरूरी विधायी कार्यों को सौंपने पर रोक लगाई जानी चाहिए।’

लेकिन सेबी के सालाना अधिशेष को भारत के कंसोलिडेटेड फंड में ट्रांसफर करने की अनिवार्यता पहले की ही तरह बरकरार रखी गई है। विधेयक के अनुसार किसी भी वित्त वर्ष में सामन्य कोष के सालाना सरप्लस का 25 प्रतिशत हिस्सा एक रिजर्व फंड में जमा किया जाएगा। यह फंड पिछले दो वित्त वर्ष के कुल सालाना खर्च से ज्यादा नहीं होगा। इस रिजर्व फंड का इस्तेमाल सेबी के खर्चों को पूरा करने के लिए किया जाएगा।

साहू कहते हैं, ‘इससे कारगर नियमन के लिए जरूरी शुल्क से ज्यादा वसूलने का कोई संस्थागत प्रोत्साहन खत्म हो जाता है। साथ ही, इससे नियामकीय शुल्क और कर के बीच का अंतर भी खत्म हो जाता है, क्योंकि सेवाओं के बदले में लिया जाने वाला शुल्क संवैधानिक रूप से जायज होता है। बेहतर तरीका यह होता कि कमेटी सिफारिश करती कि नियामकीय शुल्क सिर्फ नियामक की जायज फंडिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए ही वसूला जाए और यह वसूली ‘क्विड प्रो क्वो’ (सेवा के बदले भुगतान) के सिद्धांत पर ही आधारित हो।’

साल 2024-25 के दौरान, फीस और दूसरे शुल्कों के रूप में कुल 2,334 करोड़ रुपये मिले, जो इससे पिछले साल के 1,851.48 करोड़ रुपये से अधिक हैं। फीस, निवेश पर ब्याज और अलग-अलग दस्तावेज की फाइलिंग फीस जैसे कई स्रोतों से कुल फंड वित्त वर्ष 2025 में 2,712.4 करोड़ रुपये रहा, जबकि साल का खर्च 1,278.3 करोड़ रुपये था। रिपोर्ट में बोर्ड के गठन और नियुक्तियों जैसे दूसरे प्रशासनिक मामलों को लेकर कोई बदलाव नहीं किया गया है।

First Published : July 27, 2026 | 8:52 AM IST