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भारी कर्ज के बोझ तले दबा अमेरिका! बॉन्ड यील्ड उछली, क्या आने वाली है मंदी? भारतीय बाजारों पर कितना असर?

अमेरिका में 30 साल की बॉन्ड यील्ड 5.3 फीसदी तक पहुंची, लेकिन घरेलू निवेश और कंपनियों की मजबूत कमाई से भारतीय बाजार को सहारा मिल सकता है

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दिग्विजय सिंह   
Last Updated- August 26, 2026 | 6:30 PM IST

US Debt Crisis: दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी अमेरिका पर बढ़ता कर्ज दुनियाभर के बाजारों के लिए सिरदर्द बन रहा है। साथ ही लॉन्ग टर्म के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में तेजी दर्ज की जा रही, जो कोविड के समय 1 फीसदी के मुकाबले 5 फीसदी के ऊपर निकल चुकी है। ऊपर से लॉन्ग टर्म के लिए यूएस ट्रेजरी अधिकतम डेट बायबैक को दोगुना से ज्यादा कर दिया है। ऐसे में निवेशकों को पैसा इक्विटी मार्केट के बजाय बॉन्ड मार्केट की ओर जा सकता है। इसका असर भारत समेत अन्य बाजारों में आ रहे विदेश निवेश पर भी पड़ सकता है।

हालांकि, भारतीय शेयर बाजारों के लिए कंडीशन पहले जैसी नहीं है। ब्रोकिंग फर्म ICICI सिक्योरिटीज ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया कि अमेरिका में निवेशकों के लिए बिना रिस्क के मिलने वाला रिटर्न बढ़ा है, लेकिन भारत की सरकारी बॉन्ड यील्ड काफी हद तक स्थिर होने की वजह से स्थिति अलग है। इसके अलावा घरेलू निवेशकों का शेयर बाजार पर भरोसा कायम है। साथ ही निवेशकों की बढ़ती हिस्सेदारी और दमदार अर्निंग्स के चलते सपोर्ट मिल सकता है।

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड कितनी बढ़ी?

ICICI सिक्योरिटीज की ‘स्ट्रैटेजी रिपोर्ट’ के मुताबिक अमेरिका की 30 साल की बॉन्ड यील्ड करीब 5.3 फीसदी तक पहुंच गई है, जो पिछली बार साल 2000 के आसपास देखा गया था। कोरोनाकाल यानी 2020 में यही यील्ड करीब 1 फीसदी के रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसल गई थी।

दरअसल, अमेरिका का बढ़ता कर्ज भी बाजारों की टेंशन को बढ़ा रहा है, जो करीब 40 ट्रिलियन डॉलर हो चुका है। लॉन्ग टर्म के बॉन्ड यील्ड में जारी तेजी के बीच यूएस ट्रेजरी ने 10 से 30 साल की सिक्योरिटीज के लिए अधिकतम डेट बायबैक को दोगुने से ज्यादा बढ़ा दिया, जिसे अब कम से कम 4 अरब डॉलर प्रति ऑपरेशन कर दिया है।

बॉन्ड यील्ड बढ़ना शेयरों के लिए चिंता क्यों?

रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2024 के दौरान अमेरिका की यील्ड कर्व इनवर्टेड थी। यानी शॉर्ट टर्म के बॉन्ड की यील्ड लॉन्ग टर्म के बॉन्ड से ज्यादा थी। लेकिन 2023 के बाद लॉन्ग टर्म की यील्ड ज्यादा तेजी से बढ़ी है और यील्ड कर्व अब नॉर्मल हो रही है। मतलब, सरकारी बॉन्ड को आम तौर पर कम रिस्क वाला निवेश माना जाता है। अगर इनसे मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है तो निवेशकों को इक्विटी में ज्यादा रिटर्न उठाने के बदले ज्यादा रिटर्न की उम्मीद होती है।

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ICICI सिक्योरिटीज के मुताबिक अमेरिका में रिस्क फ्री रेट बढ़ने से शेयरों की लॉन्ग टर्म की ग्रोथ वैल्यू के लिए डिस्काउंट रेट भी बढ़ रहा है। इससे शेयरों के वैल्युएशन पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, भारत में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है।

क्या भारतीय बाजारों के लिए बढ़ेगी टेंशन?

भारत की 10 साल और 30 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड काफी हद तक स्थिर रही है और इनमें मामूली गिरावट भी आई है। भारत की 30 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 7.5 फीसदी और 10 साल की यील्ड करीब 6.9 फीसदी है।

ICICI सिक्योरिटीज का कहना है कि भारतीय इनवेस्टर्स के लिए रिस्क फ्री रेट और इसके चलते शेयरों की लॉन्ग टर्म ग्रोथ वैल्यू पर लगने वाला डिस्काउंट रेट अमेरिकी निवेशकों की तरह नहीं बढ़ा है। यानी अमेरिका में बढ़ती यील्ड वहां के शेयरों के वैल्युएशन पर दबाव डाल सकती है, जबकि भारत में फिलहाल वैसा दबाव नहीं दिख रहा है।

भारत के लिए बदलेगा विदेशी निवेशकों का रुख?

अमेरिकी निवेशक जब भारत जैसे दूसरे देश में पैसा लगाता है तो वह अमेरिकी रिस्क फ्री रेट के साथ उस देश में निवेश के एक्स्ट्रा रिस्क को भी देखता है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के मुकाबले भारत का CDS स्प्रेड फिलहाल सिर्फ 32 बेसिस पॉइंट्स है।

वहीं भारत और अमेरिका की 10 साल की बॉन्ड यील्ड का अंतर 217 बेसिस पॉइंट्स है। ICICI सिक्योरिटीज के मुताबिक ये आंकड़े बताते हैं कि अमेरिकी निवेशक के लिए भारत का एक्स्ट्रा रिस्क प्रीमियम अभी वहां के मुकाबले कम है।

हालांकि पश्चिम एशिया संकट और इससे कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी से हाल के समय में भारत का रिस्क प्रीमियम थोड़ा बढ़ा है। रिपोर्ट का मानना है कि अगर यह संकट नहीं होता तो भारत का इक्विटी रिस्क प्रीमियम और कम हो सकता था, जो पश्चिम एशिया में टेंशन कम होने पर आगे कम हो सकता है।

भारती बाजार में FIIs बेच रहे, तो कौन संभाल रहा?

भारतीय बाजारों के लिए कोविड के बाद घरेलू निवेशक यानी DIIs एक बड़े फैक्टर के तौर पर उभरे हैं। ICICI सिक्योरिटीज की रिपोर्ट में दिए गए 12 महीने के कुल फ्लो के आंकड़ों में FPI सेकंडरी मार्केट फ्लो काफी नीचे हैं, जबकि DII फ्लो रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। यानी भारतीय बाजार की निर्भरता विदेशी निवेशकों पर पहले जैसी नहीं रही।

भारतीय बाजारों के लिए अहम ट्रिगर कॉरपोरेट की मौजूदा वित्तीय स्थिति है। ब्रोकिंग फर्म के मुताबिक कॉरपोरेट इंडिया का प्रॉफिट साइकल आगे बढ़ रहा है। FY27 TTM में कंपनियों का नेट प्रॉफिट GDP के करीब 5.8 फीसदी पर है। साथ ही कंपनियों की फाइनेंशियल लेवरेज और घाटे का स्तर काफी नीचे है।

क्या अमेरिका में आने वाली है मंदी?

यील्ड कर्व के उलटने को लंबे समय से अमेरिका में मंदी आने के संकेत के तौर पर देखा जाता रहा है। हालांकि, ICICI सिक्योरिटीज का कहना है कि अब इसे मंदी का उतना भरोसेमंद संकेत नहीं माना जा सकता। क्योंकि 2023 में यील्ड कर्व इनवर्टेड होने के बावजूद अमेरिका में मंदी जैसी की स्थिति नहीं देखने को मिली। हल्कि यूएस इकोनॉमी 2026 तक मजबूत बनी रही, जिसमें AI से जुड़े भारी निवेश की भूमिका अहम रही।

 

First Published : August 26, 2026 | 11:25 AM IST