लगभग 45,000 करोड़ की एनएचएआई की परियोजना को वित्तीय संस्थान कर्ज देने से मुकर रहे हैं।
इसकी वजह यह है कि इस परियोजना के लिए सरकार ने छूट अवधि को बढ़ाकर 25 से 30 वर्ष करने की मंजूरी दे दी, लेकिन वित्तीय संस्थान इस बढ़ी हुई अवधि तक कर्ज देने के लिए राजी नहीं हो रहे हैं।
सामान्यतया एनएचएआई की परियोजना की छूट अवधि 10 से 15 साल होती है। लेकिन भूमि अधिग्रहण और ट्रैफिक प्रक्षेपण जैसे तमाम मामलों की वजह से परियोजना पूरी होने में विलंब हो जाती है। इसी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने छूट अवधि बढ़ाने को मंजूरी दी है। इससे डेवलपर को ज्यादा समय मिल जाता है और वे ज्यादा से ज्यादा निवेश कर सकते हैं।
ऐसी परियोजनाएं जिसकी निर्माण अवधि लंबी है, उनमें आंध्र प्रदेश में कुड्डपा-मायदुकुर- कुर्नल खंड में चार लेन का निर्माण, दिल्ली-आगरा में छह लेन की नौ सड़कों का विस्तार आदि शामिल हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसी कई परियोजनाएं हैं, जिसकी निर्माण अवधि लंबी है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के विकास के लिए कर्ज मुहैया कराने वाली वित्तीय संस्थाओं आईडीएफसी, आईएल ऐंड एफएस और कोटक महिन्द्रा के कार्यकारियों ने कहा है कि मौजूदा तरलता संकट के दौर में छूट की अवधि 7 से 10 वर्ष की जानी चाहिए और यह किसी भी हालत में 15 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
एक निजी इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी के वरिष्ठ कार्यकारी ने बताया, ‘बैंक 7 से 10 वर्ष की अवधि से अधिक के लिए कर्ज मुहैया नहीं करा सकता है। इससे अधिक समय तक के लिए कर्ज उपलब्ध कराना अभी के दौर में मुश्किल है।’
इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी के कार्यकारियों और बैंकर्स सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि कर्ज की अवधि और छूट अवधि में तालमेल नहीं होने की वजह से परियोजनाओं के अधर में लटकने की संभावना बढ़ जाती है।
कोटक इन्वेस्टमेंट के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रमुख संजय सेठी कहते हैं, ‘एनएचएआई की सड़क परियोजनाओं में प्रस्तावित छूट अवधि में विस्तार स्वीकार्य है। जबकि कर्ज भी उसी हिसाब से मिले, इसका आशय स्पष्ट नहीं हो पाता है, क्योंकि शेयरधारकों को रिटर्न मिलने में परेशानी हो जाती है।’
सेठी कहते हैं कि छूट अवधि में विस्तार से बैंक इस बात को लेकर आश्वस्त रहते हैं कि उनके द्वारा दिया गया कर्ज नहीं डूबेगा। हालांकि अगर कर्ज देने की अवधि 15 वर्ष से बढ़ती है, तो अतिरिक्त पूंजी का प्रवाह रूक जाएगा और निवेश पर रिटर्न की आंतरिक दर कम हो जाएगी।
इसके अलावा इन परियोजनाओं की निर्माण अवधि तकरीबन तीन वर्ष होती है। अगर भूमि अधिग्रहण और कानूनी पचड़ों की वजह से इसमें देरी भी होती है, तो यह अवधि अधिकतम 5 वर्ष होनी चाहिए। इसके बाद पथ कर लगना शुरू हो जाता है।
नेशनल हाइवे बिल्डर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक एन. मुरली कहते हैं, ‘अभी तक मध्यस्थता के 413 मामले लंबित हैं। हालांकि ज्यादातर मामले में फैसला डेवलपरों के पक्ष में ही जाएगा, लेकिन इससे निर्माण की अवधि में बढ़ोतरी हो जाती है। अब जबकि छूट अवधि को बढ़ाकर 30 वर्ष कर दिया गया है, इसके निर्माण की अवधि इससे भी आगे जा सकती है।’