शिवा-आईडीबीआई की तरह निपटान चाहेंगे बैंक डिफॉल्टर

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 4:43 AM IST

सी. शिवशंकरन के स्वामित्व वाली शिवा इंडस्ट्रीज से संकेत लेते हुए अन्य भारतीय प्रवर्तक ऐसा ही आवेदन करने की योजना बना रहे हैं। यह कहना है वकीलों का। शिवा इंडस्ट्रीज को आईडीबीआई बैंक की अगुआई में भारतीय लेनदारों से काफी उदार रुख हासिल हो रहा है ताकि मामला दिवालिया अदालतों में न जा सके।
शिवा इंडस्ट्रीज के 90 फीसदी लेनदारों की तरफ से मंजूर एकमुश्त निपटान योजना पर इस साल अप्रैल में हस्ताक्षर हुए क्योंकि लेनदारों का कहना है कि अन्य उपयुक्त पेशकश मौजूद ही नहीं थी। लेकिन वकीलों का कहना है कि इस तरह का निपटान दिवालिया संहिता के लिए गलत नजीर तय कर देगा और ज्यादातर डिफॉल्टर भारतीय बैंकों की कीमत पर इसी तरह के उदार रवैये की मांग कर रहे हैं।

केएस लीगल ऐंड एसोसिएट्स की प्रबंध साझेदार सोनम चंदवानी ने कहा, दोनों पक्षकारों के बीच हुआ निपटान ग्राहकों पर पड़े प्रभाव पर विचार करने में नाकाम रहा और यह लेनदारों व डिफॉल्टरों के लिए एकतरफा नजीर तय कर देगा। शिवा इंडस्ट्रीज को दी गई राहत डिफॉल्टरों को स्पष्ट संदेश दे रही है कि आसान राह मौजूद है। चूंकि सरकार उन्हें राहत दे रही है, लिहाजा वास्तविक स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट है कि डिफॉल्टर बेहतर स्थिति में बने रहेंगे, वहीं डिफॉल्टरों का बोझ सहने वाले लेनदार और आम आदमी को अलग-थलग छोड़ दिया जाएगा।
एक बयान में आईडीबीआई बैंक ने कहा कि शिवशंकरन ने 500 करोड़ रुपये की पेशकश की थी, जो परिसमापन से थोड़ी बेहतर थी। ऐसे में शिवा इंडस्ट्रीज की तरफ से 5,000 करोड़ रुपये के कर्ज भुगतान में की गई चूक के बाद इस पेशकश को स्वीकार करने का फैसला लिया गया।

कंपनी सीबीआई की जांच का सामना कर रही है, वहीं प्रवर्तक भी आईएलऐंडएफएस के धनशोधन मामले में प्रवर्तन निदेशालय के आरोप पत्र का सामना कर रहे हैं। वकीलों ने कहा कि शिवा इंडस्ट्रीज का मामला अन्य प्रवर्तकों को लेनदारों के पास आईबीसी की धारा 12 ए के तहत इसी तरह की याचिका दाखिल करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। यह प्रवर्तकों को कंपनी पर दोबारा नियंत्रण हासिल करने का विकल्प देता है। 
 

लेकिन एस्सार स्टील और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज की तरफ से दी गई ऐसी ही याचिका सार्वजनिक बैंकों ने अस्वीकार कर दी थी। दिवालिया एवं धनशोधन बोर्ड के मुताबिक, भारतीय लेनदारों ने पिछले साल दिसंबर तक धारा 12 ए के तहत 378 कंपनियों के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया प्रक्रिया वापस ले ली थी। सितंबर तिमाही में धारा 12 ए के तहत ऐसे 291 मामले बंद हुए थे। इनमें से छह मामलों बैंकों ने दिसंबर 2020 की तिमाही में 6 करोड़ रुपये से ज्यादा का दावा किया था।
वकीलों ने कहा कि दिवालिया प्रक्रिया वापस लेना पूरी तरह से लेनदारों के स्वविवेक का मामला है। डीएसके लीगल के पार्टनर अजय शॉ ने कहा, जब उन्होंने इस तरह का फैसला ले लिया है तो ऐसे में लेनदारों की वाणिज्यिक बुद्धिमत्ता का सम्मान किया जाना चाहिए, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी दोहराया है। कानून के तहत लेनदारों को 90 फीसदी सहमति के साथ याचिका वापसी का प्रस्ताव पारित करना होता है और उन्हें इसकी कोई वजह नहीं बतानी होती है।

दिलचस्प रूप से इससे पहले आन्ध्रा बैंक की अगुआई में लेनदारों ने स्टर्लिंग बायोटेक के प्रवर्तकों को ऐसे ही निपटान की पेशकश के लिए सहमति जताई थी लेकिन बाद में यह कानूनी विवाद में फंस गया। कंपनी परिसमापन के दायरे में है।लेनदारों ने कहा कि मौजूदा कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण आईबीसी प्रक्रिया के दायरे वाली कई परिसंपत्तियों के लिवाल नहीं हैं। लवासा कॉरपोरेशन, रिलायंस नेवल, रिलायंस कम्युनिकेशंस और कई अन्य  परियोजनाओं के खरीदार नहीं मिल रहे हैं या फिर ये कानूनी विवाद में फंसे हुए हैं।

First Published : May 17, 2021 | 10:35 PM IST