सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए विशेष दिवाला व्यवस्था में कर्जदार को समाधान प्रक्रिया पूरी होने तक कंपनी का अधिकार अपने पास रखने की इजाजत मिल सकती है, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय पर अंतिम फैसला ऋणदाताओं की समिति ही करेगी। यह जानकारी आज भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड के चेयरमैन एमएस साहू ने दी।
साहू ने कहा, ‘मौजूदा व्यवस्था में कंपनी को प्रमोटर से अंतरिम समाधान पेशेवर और उसके बाद समाधान पेशेवर और तब जाकर समाधान आवेदक बनना पड़ता है। छोटी कंपनी को इस कवायद से बहुत अधिक कारोबारी बाधा पहुंचती है।’
इस नई कवायद के लिए कानून में किसी तरह का बदलाव करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसे आईबीसी की धारा 240ए के प्रावधानों के तहत प्रभावी कर दिया जाएगा। इस धारा में एमएसमएई को धारा 29ए के कुछ निश्चित उपनियमों से छूट मिली हुई है जो गैर-निष्पादित संपत्ति के प्रमोटर को समाधान योजना में हिस्सा लेने से बचाता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह घोषणा की थी कि कोविड राहत पैकेज के हिस्से के तौर पर दबावग्रस्त एमएसएमई के समाधान के लिए विशेष तंत्र लाया जाएगा।
सरकार सभी दबावग्रस्त कंपनियों के लिए भी पहले से तैयार योजना लाने के लिए दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता में संशोधन करने पर भी विचार कर रही है।
साहू ने कहा, ‘(दिवाला कानून) समिति पहले से तैयार योजना का तंत्र बनाने पर विचार कर रही है और वह इस महीने के अंत तक अपनी रिपोर्ट देगी। इसके लिए कानून में बदलाव करने की जरूरत पड़ेगी।’
अमेरिका और ब्रिटेन में प्रचलित पहले से तैयार दिवाला समाधान योजनाओं में दिवाला प्रक्रिया शुरू करने से पहले दबावग्रस्त कंपनी और उसके ऋणदाताओं की ओर से खरीदार के साथ एक समझौता किया जाता है।
कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स में पार्टनर मनोज कुमार ने कहा, ‘नियंत्रण मौजूदा प्रबंधन के हाथ में होने, गैर-पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धी बोली नहीं होने के कारण पहले से तैयार दिवाला समाधान को अंतिम रूप नहीं दिया जा रहा था। लेकिन कोविड संकट के कारण सरकार आईबीसी की निलंबन अवधि के बाद इसको लागू करने पर विचार कर रही है।’
एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित सेमिनार में बोलते हुए साहू ने कहा कि आईबीसी के तहत एक निश्चित अवधि के लिए कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया का निलंबन कम से कम तकलीफ के साथ सुधार करने वाला कदम था।
उन्होंने कहा कि जिसका निलंबन किया गया है वह बहुत सूक्ष्म है और यह व्यावहारिक कंपनियों को समय से पहले समाप्त हो जाने से बचाने के लिए किया गया है।
साहू ने कहा, ‘कानून को अंतत: बाजार की वास्तविकता में मजबूती से उतरना होगा। मौजूदा वक्त में किसी कंपनी के बंद होने का मतलब है बहुत से लोगों की आजीविका के साधन का समाप्त हो जाना। किसी गैर व्यावहारिक कंपनी का परिसमापन नहीं करा पाना एक गलती थी, जिसे अगली तिमाही में सुधारा जा सकता है।’