रुपये में उतार-चढ़ाव और विदेशी मुद्रा के लेन-देन में नुकसान से एक ओर कई कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हुआ है।
दूसरी ओर सिप्ला, सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लेबोरेटीज और वॉकहार्ट जैसी देश की प्रमुख दवा कंपनियां वित्त वर्ष 2008-09 के लिए राजस्व वृद्धि के अपने पूर्वनिर्धारित लक्ष्य के पार जाती दिख रही है।
अपनी स्थापना के 25वें वर्ष में चल रही डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरी ने बीते वित्त वर्ष में 25 फीसदी के विकास का लक्ष्य रखा था। हालांकि, पहली तिमाही में हुए भारी नुकसान के बावजूद कंपनी ने गत वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाहियों में क्रमश: 25, 30 और 49 फीसदी की दर से राजस्व वृद्धि हासिल की।
जानकारों के मुताबिक, अंतिम तिमाही में कंपनी का प्रदर्शन बेहतर रहने की उम्मीद है। इस तिमाही में कंपनी के राजस्व की विकास दर 20 फीसदी रहने का अनुमान है। इसकी वजह, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन की दवा इमिट्रेक्स के जेनेरिक संस्करण सुमेत्रिप्टन सुसाइनेट से हुआ जबरदस्त मुनाफा है। डॉ. रेड्डीज ने यह दवा नवंबर में लॉन्च की थी ताकि अगले 6 महीने तक कंपनी का कारोबार सुधर सके।
एंजिल ब्रोकिंग के एक विशेषज्ञ सरबजीत कौर नागरा ने बताया, ”रुपये में तकरीबन एक-चौथाई की गिरावट के बावजूद भारतीय कंपनियां मुनाफा कमाने में आगे हैं। परिचालन के मोर्चे पर ज्यादातर कंपनियों का मुनाफा कम हुआ है।”
उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों में बाजार पूंजीकरण के लिहाज से देश की सबसे बड़ी कंपनी सन फार्मास्युटिकल्स भी रही है। सन फार्मा ने 18-20 फीसदी विकास का अनुमान जताया है। हालांकि वित्त वर्ष 2008-09 के पहले 9 महीनों में इस कंपनी ने 50 फीसदी की विकास दर हासिल कर ली है। इस दौरान कंपनी की कुल बिक्री 3,138 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
इसका शुद्ध मुनाफा भी 86 फीसदी बढ़कर 1,423 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सन फार्मा के एक प्रवक्ता ने बताया, ”पहले 9 महीनों में हमारा प्रदर्शन हमारे अनुमान से बेहतर रहे।” रेलीगेयर हिचेंस के मुताबिक, सिप्ला की बिक्री मार्च में खत्म तिमाही ने 23 फीसदी बढ़कर 1,383 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।