दो साल के लंबे इंतजार के बाद गुजरात के जामनगर में पीतल का व्यापार एक बार फिर से चमका है।
सरकार द्वारा पीतल के स्क्रैप (कबाड़) और कच्चे माल के मूल्यों में क मी से पीतल का व्यापार फिर से चढना शुरू हो गया है। साथ ही घरेलू बाजार में पीतल की मांग ने भी इस बाजार की डूबती नैया को सहारा दिया है।
पीतल की मांग में कमी से यह बाजार पूरी तरह खत्म हो रहा था और ज्यादातर व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद कर दी थी। जामनगर का पीतल बाजार भारत के प्रमुख पीतल उद्योगों में शुमार है। व्यापारी यहां से जो पीतल खरीदते हैं, वह पिन से लेकर विमानों के पुर्जे बनाने तक के काम में आता है।
उद्योग के सूत्रों के मुताबिक जामनगर में लगभग 4000-4500 पीतल इकाइयां हैं जिनमें 50,000 लोग काम करते हैं और परोक्ष रूप से इन इकाइयों से लगभग डेढ़ लाख लोगों की रोजी-रोटी चलती है। वैश्विक आर्थिक मंदी से इस उद्योग की कुल ब्रिकी 2000 करोड रुपये से घटकर 1,200 करोड हो गई और पिछले साल अक्टूबर में पीतल के उत्पादन में 70 फीसदी की कमी आई।
मंदी की मार से बेहाल इस उद्योग को बचाने के लिए जनवरी में सरकार द्वारा पीतल की शुल्क दर में 20 फीसदी की कमी की गई जिससे इस उद्योग को काफी हद तक राहत मिली है। केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) और राजस्व विभाग ने टैरिफ वैल्यू में 40,000 रुपये प्रति टन तक की कमी कर 120,000 रुपये प्रति टन कर दिया है जो पहले लगभग 1,60,000 रुपये प्रति टन था।
जामनगर फैक्टरी ऑनर्स एसोसिएशन (जेएफओए) के अध्यक्ष रामजी भाई पटेल का कहना है कि उद्योग के लिए मौजूदा शुल्क दर अब बेहतर स्तर पर है। अब उत्पादन में लागत भी कम आ रही है क्योंकि पीतल के अपशिष्ट की कीमत पिछले 6 महीनों में 260-270 रुपये प्रति किलोग्राम से घट कर 195-200 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई है।
पिछले साल दिवाली के वक्त हमारे पास 35 फीसदी ऑडर ही थे। हालांकि इस साल जनवरी से यह ऑर्डर बुक 35 फीसदी से बढ़ कर 70 फीसदी हो गया है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि निर्यात को लेकर स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि पिछले साल के मुकाबले इस साल केवल 20 फीसदी का निर्यात हुआ है। हर साल जामनगर से 500- 600 करोड़ रुपये का निर्यात होता था, लेकिन इस साल के वल 150 से 200 करोड रुपये का ही निर्यात हो सका। उन्होंने यह भी कहा कि इसी तरह पीतल के अपशिष्ट यानी रद्दी माल केआयात में भी फर्क पडा है।
प्रतिदिन के औसत आयात की मात्रा भी 200 टन से घटकर 100-125 तक रह गई है। ज्यादातर पीतल फैक्टरियों ने अपने उत्पादन में 50 फीसदी तक की कटौती कर दी है। पटेल का कहना है कि मंदी की वजह से भारत में पीतल का व्यापार अब केवल 40 फीसदी ही रह गया है। उनका यह भी मानना है कि घरेलू बाजार में पीतल की मांग चढ़ने से स्थिति में बदलाव आने की संभावना है। आशा है कि आने वाने दिनों में हम अच्छा व्यापार करेंगे।