जिस समय फेसबुक को देश में नफरत फैलाने वाली सामग्री नहीं हटाने के कारण विवादों का सामना करना पड़ रहा है, उस समय फेसबुक इंडिया के प्रबंध निदेशक और उपाध्यक्ष अजित मोहन ने कहा कि कंपनी का इस बारे में पूरी तरह साफ रुख है कि वह नफरत फैलाने वाली सामग्री से लाभ नहीं कमाती है। उन्होंने कहा कि विज्ञापनदाता, भागीदार और सरकार समेत कंपनी के प्लेटफॉर्म से जुड़े लोग इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अच्छे कार्यों और आर्थिक मूल्य सृजित करने के लिए कर रहे हैं।
मोहन ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘हम अपने समाज के मानकों में अभिव्यक्ति और नफरतभरी अभिव्यक्ति को लेकर स्पष्ट हैं। इस बारे में हमारा स्पष्ट रुख है कि नफरत फैलाने वाली अभिव्यक्ति को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। हम समुदाय के इन मानकों को तटस्थ और बिना पक्षपात के वस्तुनिष्ठ तरीके से लागू करेंगे।’
मोहन ने कहा कि कंपनी कृत्रिम मेधा (एआई) और ऑटोमेटेड सिस्टम्स पर काफी निवेश कर रही है ताकि वह ऐसी सामग्री की पहचान कर सके, जो समुदाय के इन मानकों का उल्लंघन करती है। वे यूजर्स के इसके बारे में शिकायत करने से पहले ही ऐसी सामग्री की पहचान करने की कोशिश करेंगे। कंपनी के पास समीक्षा के लिए कर्मचारी भी हैं। कंपनी ने 35,000 लोगों की नियुक्ति की है, जो सुरक्षा पर ध्यान देते हैं।
मोहन ने कहा, ‘वर्ष 2017 की अंतिम तिमाही में दुनिया भर में करीब 17 लाख नफरत फैलाने वाली सामग्री हटाई थी। वर्ष 2020 की दूसरी तिमाही में यह आंकड़ा 2.2 करोड़ था।’ उन्होंने कहा, ‘इस तरह नफरत फैलाने वाली हटाई गई सामग्री में से 90 फीसदी की पहचान हमारे एआई सिस्टम ने की थी। ‘
मार्क जुकरबर्ग की अगुआई वाली कंपनी को लेकर कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि कंपनी भारत में फेसबुक के नफरत फैलाने वाली सामग्री के नियमों से एक राजनीतिक पार्टी विशेष को बचा रही है। इस पर मोहन ने कहा कि कंपनी के सिस्टम इस तरह से डिजाइन किए जा रहे हैं कि ऐसा न हो।
मोहन ने कहा, ‘हमसे ऐसे लोग जुड़े हैं, जो सभी राजनीतिक हलकों में काम कर चुके हैं। लेकिन उनके कंपनी के भीतर आने के बाद यही चीज मायने रखती है कि हम तटस्थ हों और पक्षपात से दूर रहें और हम अपने मानकों को वस्तुनिष्ठ तरीके से लागू कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा, ‘भारत में सामग्री नीति टीम अलग-अलग बैठती है और सार्वजनिक नीति टीम से स्वतंत्र होती है।’
अमेरिका और फ्रांस में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को साइबर हमले झेलने पड़े हैं और चुनावों को प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों को प्रसारित किया गया।
विशेषज्ञों ने कहा कि यह भारत के लिए भी एक बड़ी चिंता है। मोहन से पूछा गया कि इस चुनौती के समाधान के लिए फेसबुक समेत बड़ी तकनीकी कंपनियों की यूजर्स के प्रति क्या जिम्मेदारी है तो उन्होंने कहा कि कंपनी स्थानीय नियमों के पालन के अलावा अपने प्लेटफॉर्म पर लोगों को सुरक्षित रखना चाहती है। वह फैक्ट-चेकर्स पर भी निर्भरता बढ़ा रही है, जो भारत में िवभिन्न भाषाओं में भ्रामक सूचनाओं से निपट रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘हम दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा भारत में फैक्ट-चेकर्स का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं।’
कंपनी को पहले भी फेसबुक कैम्ब्रिज एनालिटिका डेटा सेंधमारी और जासूसी के विवाद का भी सामना करना पड़ा था, जिसमें फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सऐप इंस्टेंट मैसेंजर को हैक करने के लिए पेगासस स्पाईवेयर इस्तेमाल किया गया था।
मोहन ने कहा कि फेसबुक दो-तीन साल पहले की तुलना में काफी बदल गई है और अब निजता पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है। फेसबुक भारतीय बाजार पर बड़ा दांव लगा रही है और उसका मानना है कि वह देश के डिजिटल कायाकल्प में बड़ी भूमिका निभा सकती है। इसने हाल में रिलायंस इंडस्ट्रीज के जियो प्लेटफॉम्र्स में 5.7 अरब डॉलर का निवेश किया है।