भारत की 11वीं सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स हो सकता है कि उद्योग की बड़ी-बड़ी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों रैनबैक्सी, डॉ. रेड्डीज और निकोल्स पीरामल 2010 तक मूल दवाओं या नवीन रसायन संस्था (एनसीई) की बिक्री के मामले में आगे निकल जाए।
कंपनी का कहना है कि ग्लेनमार्क की योजना अपनी अतिसार रोधी दवा क्रोफेलमर को उत्तरी अमेरिका, यूरोप, जापान और चीन को छोड़कर दुनियाभर में 2010 की पहली छमाही में बिक्री शुरू करने की है। कंपनी में अपनी दवा को प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले आगे बढ़कर बेचने का भरोसा तब बढ़ गया,
जब क्रोफेलेमर की मूल विकास करने वाले कंपनी नैपो फार्मास्युटिकल इंक ने हाल ही में अमेरिका की दवा निर्मात कंपनी सैलिक्स के साथ दवा को अमेरिकी बाजार में बेचने के लिए गठजोड़ किया है। दोनों कंपनियों के इस कदम के बाद ग्लेनमार्क के लिए बाकी के सभी देशों के लिए रास्ते खुल गए हैं।
क्लीनिकल दवा विकास के वैश्विक मानकों के जरिये अगर इसमें सफलता मिलती है तो ग्लेनमार्क पहली भारतीय कंपनी होगी जो एनसीई बेचेगी। ग्लेनमार्क की क्रोफेलेमर में यह एचआईवी संबंधित अतिसार के रोगियों को दवाओं की बिक्री कर कम से कम 400 करोड़ रुपये आय करने की संभावनाएं हैं।
भारत में अब भी एक नए फार्मास्युटिकल दवा की खोज और बिक्री करना बाकी है, जिसमें 10 से 15 साल की विकास की प्रक्रिया और लगभग अरबों रुपये का निवेश किया गया हो। कम से कम 6 मॉलीक्यूल्स विकास की प्रक्रिया में हैं,
जिनमें डॉ. रेड्डी लैबोरेटरीज का बैलाग्लिटाजोन, ग्लेनमार्क के तीन मॉलीक्यूल्स- ओग्लेमिलास्ट (जीआरसी 3886), मेलोग्लिप्टिन (जीआरसी 8200), गठिया के लिए जीआरसी 6211, रैनबैक्सी की मलेरिया की दवा आटर्रोलेन और निकोलस पीरामल की कैंस की दवा पी276 और सूजन के लिए खानी वाली दवा शामिल है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये दवाएं बाजार में 2010 से 2013 तक उतर आएंगी।
अतिसार-रोधी दवा क्रोफेलेमर को वास्तव में अमेरिका की नैपो फार्मास्युटिकल इंक ने विकसित किया था। इस कंपाउंड का ग्लेनमार्क ने जुलाई, 2006 से लाइसेंस ले लिया है और कंपनी इस पर भारत में दूसरे चरण का क्लीनिकल परीक्षण कर रही है।
उद्योग जगत के विशेषज्ञों का कहना है, ‘तकनीकी तौर पर हम क्रोफेलेमर को भारतीय दवा नहीं कह सकते, क्योंकि इसका आविष्कार अमेरिकी कंपनी ने किया है।
लेकिन यह भी सच है कि इसका भारतीय संबंध काफी मजबूत है क्योंकि ग्लेनमार्क की ओर से काफी जल्दी इसका लाइसेंस ले लिया गया था और इसके विकास में भारतीय कंपनी की अहम भूमिका है। ग्लेनमार्क के पास 140 देशों में इसे बेचने का लाइसेंस है और वह इसका मुख्य एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (एपीआई) भी बना सकती है।’
बायोटेक कंपाउंडों की स्क्रीनिंग के लिए निकोलस पीरामल के साथ नैपो का दवा की खोज वाले गठजोड़ है। पहले नैपो ग्लेमार्क की साझेदार थी, लेकिन इस दवा के बिक्री चरण के लिए वित्तीय संकट और पैसे की कमी के कारण कंपनियां अलग हो गई।
इस दवा का भविष्य अनिश्चित था, लेकिन कुछ सप्ताह पहले नैपो अमेरिका के लिए सैलिक्स फार्मास्युटिकल्स के साथ गठजोड़ कर चुकी है।
इस समय दवा अमेरिका में लगभग 350 रोगियों के बीच तीसरे चरण में है। कंपनी की दवा को अमेरिकी औषधि प्राधिकारणों ने जल्द कार्यवाही की बात की है, जिससे अमेरिकी बाजार में इस दवा को पहले पेश करने में मदद मिलेगी।