प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया मंगलवार को 0.42 फीसदी गिरकर 95.96 पर बंद हुआ। रुपये में लगातार 5 कारोबारी सत्रों से गिरावट आ रही है और स्थानीय मुद्रा में यह गिरावट 14 जुलाई के बाद किसी एक दिन में सबसे बड़ी गिरावट है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसले से पहले कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का असर रुपये पर पड़ा है।
पिछले सत्र के 95.55 के मुकाबले घरेलू मुद्रा 95.96 प्रति डॉलर पर बंद हुई। बाजार के जानकारों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक को सरकारी बैंकों के जरिये 95.95 के स्तर के आसपास दखल देते देखा गया। तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मजबूत मांग के बीच केंद्रीय बैंक के डॉलर बिक्री करने से रुपये की गिरावट रोकने में मदद मिली।
गणेश चतुर्थी के कारण सोमवार को विदेशी मुद्रा बाजार और मनी मार्केट बंद रहे। एशियाई कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 2.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह 108 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर ट्रेड कर रहा था। भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत बढ़कर 128.70 डॉलर प्रति बैरल हो गई। तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत के आयात खर्च और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के शोध विश्लेषक दिलीप परमार ने कहा, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी और आपूर्ति में रुकावट के बीच कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से भारतीय रुपया लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में कमजोर हुआ। एफओएमसी की तरफ से ब्याज दरों पर अहम फैसले से पहले जोखिम से बचने के माहौल ने एशियाई मुद्राओं, जिनमें भारतीय रुपया शामिल है, पर और दबाव डाला। परमार ने कहा कि अमेरिकी डॉलर/रुपये के लिए 96.30 पर प्रतिरोध और 95.45 पर समर्थन है, जो डॉलर के खरीदारों के पक्ष में है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी हेड और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, अमेरिका और भारत में यील्ड और तेल की कीमतें बढ़ने से रुपया 45 दिनों के निचले स्तर पर आ गया, जबकि इक्विटी में कमजोरी और तेल कंपनियों व एफपीआई की डॉलर मांग के कारण रुपये पर दबाव रहा।
जुलाई में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड घाटा 31.98 अरब डॉलर था, जो अगस्त में घटकर 26.86 अरब डॉलर रह गया। इसके बावजूद रुपये में गिरावट आई। सालाना आधार पर निर्यात में 26.12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि आयात 14.1 फीसदी बढ़कर 72.67 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
वैश्विक बॉन्ड यील्ड भी दबाव का एक और कारण रही। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5 फीसदी के पार चली गई, जबकि भारत के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर लगभग 7.09 फीसदी पर पहुंच गई थी और बाद में 7.07 फीसदी पर बंद हुई। घरेलू बेंचमार्क यील्ड में यह बढ़ोतरी अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई तेजी के अनुरूप थी, क्योंकि बाजार महंगाई और ब्याज दरों पर तेल की ऊंची कीमतों के असर का आकलन कर रहे थे।
एक सरकारी बैंक के फॉरेक्स ट्रेडर ने कहा, तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी यील्ड के कारण रुपया दबाव में है और 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 5 फीसदी के पार चली गई है। डॉलर की मांग मजबूत बनी हुई है और फेड के फैसले से पहले रुपये के लिए रुख नकारात्मक रहने की संभावना है।
तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से भारत में सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदें भी मजबूत हुई हैं, जबकि वैश्विक यील्ड में बढ़ोतरी से घरेलू स्तर पर उधार लेने की लागत पर दबाव बढ़ा है। बाजार अब बुधवार को अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसले का इंतजार कर रहे हैं। डॉलर इंडेक्स 99.64 के आसपास था, जबकि जोखिम से बचने की व्यापक प्रवृत्ति के बीच एशियाई मुद्राएं भी कमजोर हुईं।
आरबीआई की तरफ से तीन किस्तों में 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियों की ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) के जरिये बिक्री का ऐलान बैंकिंग सिस्टम में ज्यादा नकदी की स्थिति को देखते हुए किया गया है। पहली नीलामी 16 सितंबर को 50,000 करोड़ रुपये की होगी। इसके बाद 25,000-25,000 करोड़ रुपये की दो और नीलामी होंगी। एफसीएनआर (बी) जमा योजना के तहत भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने के बाद बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी 10.7 लाख करोड़ रुपये हो गई है।