उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 के कई प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को केंद्र को नोटिस जारी किया। शीर्ष अदालत ने हालांकि अक्षेपित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि ‘जब तक हम मामले की सुनवाई नहीं करते, तब तक अंतरिम आदेश से संसद द्वारा लागू की गई व्यवस्था को रोका नहीं जा सकेगा।’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली के पीठ ने सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन को लेकर डीपीडीपी अधिनियम और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम 2025 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया।
पीठ ने तीन याचिकाओं, डिजिटल समाचार मंच ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की ओर से वेंकटेश नायक, पत्रकार नितिन सेठी और राष्ट्रीय जन सूचना अधिकार अभियान (एनसीपीआरआई) द्वारा दायर, को भी वृहद पीठ के पास भेज दिया। इन याचिकाओं में ‘विश्वसनीयता’ संबंधी प्रावधानों पर चिंता जताई गई है, जो केंद्र सरकार को अपने विवेक से किसी भी डेटा प्रबंधन संस्था से डेटा प्राप्त करने की अनुमति देते हैं।
पीठ ने कहा कि यह मामला ‘जटिल और संवेदनशील मुद्दों’ से संबंधित है, और इसमें दो परस्पर विरोधी मौलिक अधिकारों, सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाना शामिल है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘यह परस्पर विरोधी हितों को संतुलित करने का मामला है। हमें सभी जटिलताओं को दूर करना होगा और यह निर्धारित करना होगा कि व्यक्तिगत जानकारी क्या होती है।’
याचियों में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने ऐतिहासिक सुभाष अग्रवाल फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही आरटीआई और निजता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए एक ढांचा तैयार कर लिया है। पीठ ने हालांकि कहा कि नए विधायी ढांचे के लिए एक नए, गहन परीक्षण की आवश्यकता है।