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डीपफेक और AI कंटेंट पर Meta की बढ़ी मुश्किलें, सरकार ने ‘इंटरमीडियरी’ स्टेटस पर उठाए सवाल

फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी सोशल मीडिया साइट्स चलाने वाली कंपनी Meta की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। भारत सरकार ने डीपफेक और नुकसान पहुंचाने वाले AI कंटेंट को लेकर कंपनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। न्यूज एजेंसी PTI की…

Meta

Last Updated: 8 अगस्त 2026 | 2:19 PM IST

फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी सोशल मीडिया साइट्स चलाने वाली कंपनी Meta की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। भारत सरकार ने डीपफेक और नुकसान पहुंचाने वाले AI कंटेंट को लेकर कंपनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने Meta से अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसे कंटेंट के खिलाफ जरूरी सुधार करने को कहा है। इसके साथ ही सरकार यह भी देख रही है कि भारतीय कानून के तहत Meta को अब भी ‘इंटरमीडियरी’ यानी मध्यस्थ का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं।

सरकार की चिंता खास तौर पर Meta के उन सिस्टम को लेकर है, जो यह तय करते हैं कि किसी यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाए। अधिकारियों का मानना है कि अगर कोई प्लेटफॉर्म सिर्फ यूजर्स की ओर से डाले गए कंटेंट को होस्ट करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने सिस्टम के जरिए यह भी तय करता है कि किस व्यक्ति को क्या दिखेगा, तो उसके कानूनी दर्जे पर सवाल उठ सकते हैं।

रिकमेंडेशन सिस्टम पर सरकार की नजर

PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, Meta के साथ हुई हाल की बैठकों में उसके रिकमेंडेशन सिस्टम और पैसे देकर कंटेंट प्रमोट करने के तरीके को लेकर भी सवाल पूछे गए। सरकार यह जानना चाहती है कि कंटेंट चुनने और उसे खास यूजर्स तक पहुंचाने की ये प्रक्रियाएं इंटरमीडियरी के तौर पर मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के नियमों के मुताबिक हैं या नहीं।

भारत के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत इंटरमीडियरी को यूजर्स या किसी तीसरे पक्ष की ओर से पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए कुछ मामलों में ‘सेफ हार्बर’ की कानूनी सुरक्षा मिलती है। हालांकि, यह सुरक्षा तभी लागू होती है जब प्लेटफॉर्म तय शर्तों और जरूरी जिम्मेदारियों का पालन करे। इसमें 2021 के IT नियमों के तहत तय ड्यू डिलिजेंस की शर्तें भी शामिल हैं।

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अगर कोई प्लेटफॉर्म इन कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करता है, तो उसे धारा 79 के तहत मिलने वाली सुरक्षा गंवानी पड़ सकती है। ऐसे में उसके खिलाफ लागू कानूनों के तहत दूसरी कार्रवाई का रास्ता भी खुल सकता है।

डीपफेक और बिना लेबल वाले AI कंटेंट पर सवाल

सरकार ने Meta के सामने डीपफेक, चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM), बिना लेबल वाले सिंथेटिक कंटेंट और कंटेंट मॉडरेशन से जुड़े कई सवाल रखे हैं। अधिकारियों ने पूछा कि जब नियमों के तहत सिंथेटिक कंटेंट की पहचान करना और उस पर लेबल लगाना जरूरी है, तो बिना सही लेबल वाले AI वीडियो अब भी प्लेटफॉर्म पर क्यों दिखाई दे रहे हैं और तेजी से फैल रहे हैं।

इस सप्ताह Meta की ग्लोबल टीम के साथ दो दिनों तक इन मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। इस दौरान कंपनी ने अधिकारियों के साथ तकनीकी स्तर पर भी चर्चा की और बताया कि इन समस्याओं से निपटने के लिए वह क्या कदम उठा रही है।

सरकार ने Meta से कंटेंट की निगरानी में इंसानी दखल बढ़ाने और भारतीय भाषाओं के साथ स्थानीय संदर्भों को बेहतर ढंग से समझने की व्यवस्था मजबूत करने को कहा है। इन मुद्दों पर सरकार और कंपनी के बीच आगे भी बातचीत जारी रहने की उम्मीद है। अगले सप्ताह दोनों पक्षों के बीच एक और बैठक हो सकती है।

सरकार हालिया बैठकों के नतीजों के आधार पर Meta के खिलाफ आगे की संभावित कानूनी कार्रवाई पर भी विचार कर रही है। इसके लिए कानूनी राय लेने पर भी विचार किया जा रहा है। अगर यह समीक्षा आगे बढ़ती है, तो दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। उनके रिकमेंडेशन सिस्टम और कंटेंट से जुड़े तरीकों को भी भारतीय कानूनों के मुताबिक परखा जा सकता है।

सरकार का कहना है कि उसका मकसद सेंसरशिप करना नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से भारतीय कानूनों का पालन सुनिश्चित कराना है। यह मामला उस घटना के बाद भी चर्चा में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। Meta ने इसके लिए माफी मांगी थी।

इसके बाद संसदीय स्थायी समिति ने भी Meta के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग से माफी मांगने को कहा था और कंपनी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा पर दोबारा विचार करने की चेतावनी दी थी।

First Published - अगस्त 8, 2026 | 2:09 PM IST

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