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बिज़नेस स्टैंडर्ड

उदारीकरण के 35 साल: बैंकिंग सुधारों का जोर, प्रतिस्पर्धा से आगे बड़े बैंक बनाने की ओर 

अब जोर ऐसे बैंकिंग संस्थान तैयार करने पर है जो अर्थव्यवस्था के विकास के अगले चरण की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों

Manmohan Singh

(बाएं से) दीपक पारेख, आदित्य पुरी और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह वर्ष 1994 में एचडीएफसी बैंक के उद्घाटन समारोह के दौरान

Last Updated: सितंबर 21, 2026 | 10:22 PM IST

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई, 1969 को शनिवार की रात करीब 8.30 बजे देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘आपमें से कुछ लोगों ने शायद पहले ही सुन लिया होगा कि सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए भारत में काम कर रहे 14 सबसे बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया है।’ इसके बाद 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इससे देश के ज्यादातर वाणिज्यिक बैंक सरकारी नियंत्रण में आ गए। 1991 में आर्थिक उदारीकरण शुरू होने तक बैंकिंग क्षेत्र में यही व्यवस्था बनी रही।

उदारीकरण के साथ बैंकिंग क्षेत्र में बड़े बदलाव की शुरुआत हुई। इसी साल एम. नरसिंहम की अध्यक्षता वाली वित्तीय प्रणाली समिति ने ज्यादा निजी बैंकों को बैंकिंग लाइसेंस देने की सिफारिश की। समिति ने सरकार से यह स्पष्ट करने को भी कहा कि आगे और बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया जाएगा। इसका मकसद निजी बैंकों के तेजी से विस्तार में आ रही रुकावटों को दूर करना और बेहतर प्रदर्शन करने वाले बैंकों को आगे बढ़ने का मौका देना था।

दो साल बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने निजी क्षेत्र के बैंकों को कारोबार शुरू करने की अनुमति देने के लिए दिशानिर्देश जारी किए। इससे बैंकिंग क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ने का रास्ता साफ हुआ। उस समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) की देश की कुल बैंक शाखाओं में 91 फीसदी हिस्सेदारी थी और वे बैंकिंग कारोबार का करीब 85 फीसदी हिस्सा संभालते थे। 21 जुलाई 1993 को आरबीआई ने एचडीएफसी और यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (यूटीआई) को बैंकिंग कंपनियां शुरू करने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दी। बाद में यूटीआई का  बैंकिंग कारोबार ऐक्सिस बैंक के रूप में जाना गया। इसके बाद अगले कुछ वर्षों में कई और निजी बैंक अस्तित्व में आए। इनमें आईसीआईसीआई बैंक, इंडसइंड बैंक और डेवलपमेंट क्रेडिट बैंक (अब डीसीबी बैंक) प्रमुख हैं।

बैंकिंग क्षेत्र में हुए सुधारों को तीन चरणों में बांटा जा सकता है। पहला चरण पुरानी व्यवस्था से आगे बढ़ने और निजी क्षेत्र को नए बैंकिंग लाइसेंस देने से जुड़ा था। 2001 में जारी दिशानिर्देशों के तहत दूसरे चरण में नए बैंकों के गठन का रास्ता खुला। इसके बाद 2003 में कोटक महिंद्रा बैंक और 2004 में येस बैंक की शुरुआत हुई। तीसरे चरण में 2013 में संशोधित लाइसेंस नियम जारी किए गए। इसके तहत बंधन बैंक और आईडीएफसी बैंक की स्थापना हुई।

बाद में आईडीएफसी बैंक का नाम बदलकर आईडीएफसी फर्स्ट बैंक कर दिया गया। आरबीआई ने 2014 में अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से बैंकिंग व्यवस्था का एक नया ढांचा भी पेश किया। इसका उद्देश्य वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना था। इसके तहत स्मॉल फाइनैंस बैंक और पेमेंट्स बैंक शुरू किए गए। इन बैंकों का मकसद उन ग्राहकों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना था, जिन्हें अब तक इन सेवाओं की पर्याप्त पहुंच नहीं थी और ज्यादा से ज्यादा लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था।

पिछले साल बैंकिंग नियामक आरबीआई ने एयू स्मॉल फाइनैंस बैंक के यूनिवर्सल बैंक में बदलने के आवेदन को मंजूरी दी थी। आरबीआई ने स्मॉल फाइनैंस बैंकों को स्वेच्छा से यूनिवर्सल बैंक में बदलने के लिए पात्रता मानदंड भी तय किए। फिलहाल भारत के बैंकिंग क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के 12 बैंक, निजी क्षेत्र के 21 बैंक, 11 स्मॉल फाइनैंस बैंक और पांच पेमेंट्स बैंक हैं।

इसके अलावा देश में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का भी एक विविध और बड़ा नेटवर्क है। एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और ऐक्सिस बैंक जैसे निजी क्षेत्र के बैंक देश के कुछ सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों में शामिल हो चुके हैं। वहीं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विलय और एकीकरण की प्रक्रिया चली। भारत द्वारा निजी क्षेत्र के लिए बैंकिंग क्षेत्र खोलने के तीन दशक से अधिक समय बाद अब आरबीआई का जोर नए बैंक जोड़ने के बजाय मौजूदा संस्थानों को मजबूत करने और उनका विस्तार करने पर दिखाई देता है। यह बदलाव गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों की बढ़ती भूमिका को भी दर्शाता है।

निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा

बैंकों के राष्ट्रीयकरण से बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में मदद मिली, लेकिन समय के साथ बैंकिंग व्यवस्था में सरकार के निर्देश के अनुसार कर्ज देना, ब्याज दरों पर सरकारी नियंत्रण और प्रतिस्पर्धा की कमी जैसी स्थितियां भी बन गईं। ऐसे में 1991 के आर्थिक सुधारों ने बैंकिंग क्षेत्र के कामकाज के तरीके में मूलभूत बदलाव किया। इसी पृष्ठभूमि में नरसिंहम समिति ने निजी बैंकों को बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश देने की सिफारिश की थी। इसका उद्देश्य मौजूदा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) का निजीकरण करना नहीं, बल्कि बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था।

हालांकि, इस बदलाव का बैंक कर्मचारियों और यूनियनों के कुछ वर्गों ने विरोध किया। बैंक कर्मचारी संगठनों ने उदारीकरण की प्रक्रिया के कई पहलुओं का विरोध किया। इनमें निजी बैंकों को प्रवेश देना, कंप्यूटरीकरण और बैंकों का पुनर्गठन शामिल था। कर्मचारियों को आशंका थी कि इन बदलावों से रोजगार प्रभावित हो सकता है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।

1997 में नौ बैंक यूनियनों और अधिकारियों के संगठनों ने देशव्यापी हड़ताल की। उन्होंने कई प्रस्तावित बदलावों का विरोध किया। इनमें स्थानीय स्तर पर काम करने वाले निजी बैंकों की स्थापना भी शामिल थी। यूटीआई बैंक का उदाहरण बताता है कि बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया कितनी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। एलआईसी और सरकारी स्वामित्व वाली सामान्य बीमा कंपनियों ने मिलकर इस बैंक को बढ़ावा दिया था और उसने 1994 में अपना कारोबार शुरू किया।

नियामकीय नजरिए से यह निजी क्षेत्र का बैंक था, लेकिन इसकी संस्थागत पृष्ठभूमि सार्वजनिक क्षेत्र से काफी हद तक जुड़ी हुई थी। इसके बावजूद नए निजी बैंकों ने प्रतिस्पर्धा का एक अलग मॉडल पेश किया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने दशकों तक शाखाओं का नेटवर्क और जमा कारोबार खड़ा किया था। इसके विपरीत नए निजी बैंक तकनीक, अधिक कारोबारी सोच वाले कामकाज और नए उत्पादों को तेजी से बाजार में उतारने के आधार पर अपना कारोबार विकसित कर सकते थे।

समय के साथ नए निजी बैंकों ने शुरुआती दौर में केवल चुनौती देने वाले बैंकों की भूमिका से आगे बढ़कर अपनी मजबूत जगह बना ली। एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, ऐक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक ने बड़े स्तर पर जमा और कर्ज का कारोबार खड़ा किया और देश के प्रमुख बैंकिंग संस्थानों में शामिल हो गए। इस बदलाव से भारत के बैंकिंग बाजार में विदेशी बैंकों की भूमिका भी बदली। एक समय कई विदेशी बैंक खुदरा बैंकिंग कारोबार में आक्रामक तरीके से प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने इस कारोबार को सीमित कर दिया या पूरी तरह से इससे बाहर निकल गए। इस दौरान घरेलू निजी बैंकों ने उनके कई कारोबार और ग्राहकों को अपने साथ जोड़ लिया। 

भारत में कभी खुदरा बैंकिंग में मजबूत मौजूदगी रखने वाले कई विदेशी बैंकों ने घरेलू निजी बैंकों को अपना कारोबार बेचकर इस क्षेत्र से बाहर निकलना या अपने उपभोक्ता बैंकिंग कारोबार को काफी कम करना शुरू कर दिया। मसलन, सिटीबैंक ने 2022 में अपना उपभोक्ता बैंकिंग कारोबार ऐक्सिस बैंक को बेच दिया। इसमें खुदरा बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड, वेल्थ मैनेजमेंट और उपभोक्ता कर्ज शामिल थे। स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने 2024 में अपना 4,100 करोड़ रुपये का पर्सनल लोन पोर्टफोलियो कोटक महिंद्रा बैंक को बेच दिया। इसके बाद 2026 में बैंक ने अपना अलग क्रेडिट कार्ड पोर्टफोलियो फेडरल बैंक को हस्तांतरित करने पर सहमति जताई।

हालांकि, जिन ग्राहकों के बैंक के साथ अन्य बैंकिंग संबंध हैं, उन्हें स्टैंडर्ड चार्टर्ड अपने पास रखेगा। हाल ही में डॉयचे बैंक ने भारत में अपना रिटेल बैंकिंग, प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट कारोबार 282 करोड़ रुपये में कोटक महिंद्रा बैंक को बेचने पर सहमति जताई है। आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर एच. आर. खान के मुताबिक, पिछले 25 वर्षों में भारत में बहुत कम बैंकिंग लाइसेंस जारी होने का एक प्रमुख कारण कॉरपोरेट घरानों के बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश पर लगी पाबंदी है। खान फिलहाल एयू स्मॉल फाइनैंस बैंक के अंशकालिक चेयरमैन और स्वतंत्र निदेशक हैं।

खान ने कहा, ‘बड़े काॅरपोरेट समूह उन गिने-चुने संस्थानों में शामिल हैं, जिनके पास बड़े स्तर पर बैंक खड़ा करने के लिए जरूरी पूंजी होती है। जब इन्हें बैंकिंग क्षेत्र से बाहर रखा जाता है, तो बैंक लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले संभावित संस्थानों की संख्या काफी कम हो जाती है।’ खान के अनुसार, कुछ बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भविष्य में बैंक में बदल सकती हैं। हालांकि, इनमें से कई ने इसमें रुचि नहीं दिखाई है या उन्हें नियामकीय और निगरानी से जुड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ा है। स्मॉल फाइनैंस बैंक का ढांचा भी इस उम्मीद के साथ बनाया गया था कि आगे चलकर इनमें से कुछ बैंक यूनिवर्सल बैंक बन सकेंगे। लेकिन इस दिशा में प्रगति उम्मीद से धीमी रही है। खान ने कहा, ‘समय के साथ नियामक भी ज्यादा सतर्क हो गए हैं।’

एनबीएफसी का बढ़ता प्रभाव

बजाज फाइनैंस, टाटा कैपिटल और महिंद्रा फाइनैंस जैसी बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) कर्ज देने वाली प्रमुख संस्थाओं के रूप में उभरी हैं। ये कंपनियां अब उन क्षेत्रों में भी कर्ज दे रही हैं, जहां पहले नए बैंक लाइसेंस के जरिए बैंकिंग सेवाएं पहुंचने की उम्मीद थी। खान के मुताबिक, ‘फिलहाल कई बड़ी एनबीएफसी को बैंक में बदलने के बजाय एनबीएफसी के रूप में काम करना ही सुविधाजनक लग रहा है।’ इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूनिवर्सल बैंक का लाइसेंस देने की प्रक्रिया लगातार उपलब्ध कराए जाने के बाद भी किसी बड़ी एनबीएफसी ने इसके लिए आवेदन नहीं किया।

उद्योग के जानकारों का कहना है कि बैंकिंग लाइसेंस मिलने से कम लागत वाली जमा राशि जुटाने का रास्ता खुलता है, लेकिन इसके साथ कई कड़े नियामकीय नियम भी लागू होते हैं। इनमें नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) जैसी आरक्षित आवश्यकताएं, प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज देने के नियम और ज्यादा कड़ी निगरानी शामिल हैं। कई बड़ी एनबीएफसी के लिए बैंक में बदलने की प्रक्रिया में होने वाले खर्च और कामकाज में जरूरी बदलाव से मिलने वाले फायदे कम हो सकते हैं। इसलिए वित्तीय क्षेत्र में अब बहस इस बात पर ज्यादा केंद्रित है कि भारत को और अधिक बैंकों की जरूरत है या बड़े और मजबूत पूंजी वाले बैंकों की।  समय के साथ आरबीआई का ध्यान स्मॉल फाइनैंस बैंक जैसे विशेष प्रकार के बैंकिंग लाइसेंस पर अधिक रहा है।

नियोस्ट्रैट एडवाइजर्स एलएलपी के संस्थापक अबिजर दीवानजी ने कहा, ‘एनबीएफसी अब वित्तीय व्यवस्था की एक बड़ी ताकत बन चुकी हैं। कई बड़े काॅरपोरेट समर्थित एनबीएफसी का आकार कुछ बैंकों से भी बड़ा हो गया है। उन्हें यह समझ में आ गया है कि बैंक में बदलना जरूरी नहीं कि उनके लिए फायदेमंद हो क्योंकि बैंकिंग लाइसेंस के साथ नियामकीय लागत और कई तरह की पाबंदियां भी आती हैं।’

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एकीकरण

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के एकीकरण की प्रक्रिया कुछ साल पहले शुरू हुई। 2017 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने अपने सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक का अपने में विलय कर लिया। इसके बाद 2019 में विजया बैंक और देना बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय हुआ। फिर 2020 में 10 अन्य बैंकों का चार बड़े बैंकों में विलय कर दिया गया। दीवानजी के मुताबिक, ‘आज बहस इस बात पर नहीं है कि भारत को और बैंकों की जरूरत है या नहीं। अब जोर बड़े बैंकों के निर्माण पर है।’ उनके अनुसार, आरबीआई एकीकरण, निजीकरण, पूंजी डालने और स्वामित्व में बदलाव के जरिए इस दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालांकि, ज्यादा संभावित रास्ता यह है कि मौजूदा छोटे बैंकों को अपना कारोबार बढ़ाने में मदद दी जाए या समय के साथ बड़ी एनबीएफसी को बैंकिंग क्षेत्र में आने का मौका दिया जाए बजाय इसके कि नए बैंकिंग लाइसेंस जारी किए जाएं।

आरबीआई का मौजूदा रुख नए दौर में यूनिवर्सल बैंकिंग लाइसेंस जारी करने के बजाय बैंकों का एकीकरण, पूंजी बढ़ाने और स्वामित्व में बदलाव के जरिए उनका आकार बढ़ाने पर केंद्रित दिखाई देता है। नियामक ने विदेशी बैंकों को भारत में स्थानीय स्तर पर पंजीकृत सहायक कंपनियां स्थापित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया है। साथ ही, मौजूदा संस्थानों को मजबूत करने पर भी उसका जोर बढ़ा है।

जानकारों का मानना है कि मध्यम आकार के बैंक नई पूंजी जुटाकर और दूसरे बैंकों का अधिग्रहण करके अपना कारोबार बढ़ा सकते हैं। वहीं, बड़ी एनबीएफसी भी नए लाइसेंस के बजाय विलय या पुनर्गठन के जरिए धीरे-धीरे बैंकिंग कारोबार में प्रवेश कर सकती हैं। निजी क्षेत्र के बैंक प्रमुख प्रतिस्पर्धी के रूप में अपनी जगह बना चुके हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एकीकरण हो चुका है। ऐसे में अब जोर ऐसे बैंकिंग संस्थान तैयार करने पर है जो आकार में बड़े हों, पर्याप्त पूंजी वाले हों और अर्थव्यवस्था के विकास के अगले चरण की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों।

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