सर्वोच्च न्यायालय ने पार्वती नैरती बनाम लक्ष्मी नैरती मामले में अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि वसीयत का पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) नहीं होने पर उसकी सत्यता संदेह के घेरे में नहीं आती क्योंकि भारतीय कानून के तहत पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि स्वाभाविक कानूनी उत्तराधिकारियों को बाहर करने वाली वसीयत पर शक नहीं किया जा सकता क्योंकि वसीयत सामान्य उत्तराधिकार को बदलने के लिए बनाई जाती है।
बीएमआर लीगल के पार्टनर शैंकी अग्रवाल कहते हैं, ‘मगर धोखाधड़ी, जबरदस्ती, संदिग्ध हस्ताक्षर या दिमागी हालत सही नहीं होने जैसे संदेह हों तो अदालत वसीयत की बारीकी से जांच कर सकती है।’
कब वैध है वसीयत
वसीयत तभी वैध होती है जब मानसिक तौर पर स्वस्थ व्यक्ति उसे स्वेच्छा से बनाता है और उसमें लिखी बातों को भलीभांति समझता है। वसीयत करने वाले को उस पर दस्तखत करने चाहिए और उसके दस्तखत के समय मौजूद कम से कम दो गवाहों को उसकी रजामंदी लेकर हस्ताक्षर करते हुए वसीयत को सत्यापित करना चाहिए। वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। वसीयत पर सही से दस्तखत हों और गवाहों के भी दस्तखत हों तो रजिस्ट्रेशन नहीं होने पर भी वह कानूनी रूप से वैध है।
गवाहों की अहमियत
गवाह बहुत अहम होते हैं क्योंकि वसीयत करने वाला उसे चुनौती मिलते समय आम तौर पर जीवित नहीं होता। ऐसे में गवाह यह साबित करने में मदद करते हैं कि वसीयत पर हस्ताक्षर बिना किसी दबाव के किए गए थे।
अग्रवाल ने कहा, ‘कायदे में गवाह स्वतंत्र और भरोसेमंद हों, जिन्हें आसानी से ढूंढा जा सके और जिन्हें वसीयत में ज्यादा फायदा नहीं मिल रहा हो। पारिवारिक विवादों में वसीयत माने जाने या नकारे जाने में गवाहों की अहम भूमिका हो सकती है।’
फिर भी कराएं रजिस्ट्रेशन?
वसीयत का रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं है मगर रजिस्ट्रेशन कराने से वसीयत सरकारी रिकॉर्ड में आ जाती है और उसकी असलियत पर कम सवाल खड़े होते हैं। अग्रवाल समझाते हैं, ‘रजिस्टर्ड वसीयत को भी धोखाधड़ी, जबरदस्ती, दिमागी हालत सही नहीं होने या सही गवाह नहीं होने की बात कहकर चुनौती दी जा सकती है। वसीयत स्पष्ट हो, गवाही ठीक से हो और दिमागी हालत सही होने का मेडिकल सर्टिफिकेट हो तो वसीयत की वैधता बढ़ जाती है।’
संपत्तियां बहुत कीमती हों, परिवार बहुत लंबा-चौड़ा हो, करीबी वारिसों को बाहर करना हो, कई संपत्तियां हों, वसीयत करने वाले की उम्र बहुत ज्यादा हो या बीमारी हो अथवा पारिवारिक विवाद की आशंका हो तो रजिस्ट्रेशन सही रहता है।
किंग स्टब ऐंड कासिवा एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज के एसोसिएट पार्टनर गौरव सिंह गौड़ कहते हैं, ‘हालांकि रजिस्ट्रेशन वसीयत के वैध होने का सबूत नहीं होता मगर अदालत इसे वसीयत सही होने का एक और सबूत मान सकती है। खास तौर पर उन मामलों में ऐसा हो सकता है, जहां वसीयत को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 और और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68 के तहत लागू और स्वतंत्र रूप से साबित किया जाता है।’
वसीयत को चुनौती
वसीयत साफ नहीं लिखी गई हो, गवाही सही तरीके से नहीं हो, गवाहों का वसीयत में हित हो, संपत्तियां ठीक से नहीं बताई गई हों और दिमागी हालत सही होने का मेडिकल सबूत दिए बगैर बीमारी की हालत में वसीयत की गई हो तो उसे चुनौती दी जा सकती है।
गौड़ ने कहा, ‘मूल वसीयत नहीं हो, ओवरराइटिंग हो, वसीयत देर से सामने लाई गई हो या पिछली वसीयत से अलग हो तो कानूनी विवाद शुरू हो सकते हैं।’
वारिसों को बाहर करते समय कम करें जोखिम
अगर कोई व्यक्ति स्वाभाविक कानूनी वारिसों को बाहर करता है तो वसीयत में साफ लिखा होना चाहिए कि इसे स्वेच्छा से और सही दिमागी हालत में तैयार किया गया है। वारिसों को बाहर करने का कारण संक्षेप में बताया जाना चाहिए और स्वतंत्र तथा भरोसेमंद गवाह होने चाहिए। बुढ़ापे, बीमारी या विवाद की आशंका में दिमागी हालत सही होने का मेडिकल सर्टिफिकेट वसीयत को ताकत देता है।
गौड़ की सलाह है, ‘विवाह, तलाक, परिवार में मृत्यु, कारोबार में बदलाव, बड़ी संपत्तियों की खरीद या बिक्री अथवा पारिवारिक रिश्तों में बदलाव जैसी अहम घटनाओं के बाद वसीयत को अपडेट करते रहें तो कानूनी चुनौतियां कम करना आसान हो जाता है।’
वसीयत में बदलाव
विवाह, तलाक, परिवार में मृत्यु, वारिसों के जन्म, बड़ी कारोबारी घटनाओं, दूसरी जगह बसने या संपत्ति खरीदने जैसे हर निजी या वित्तीय बदलाव के बाद वसीयत देख लेनी चाहिए। इंडियालॉ एलएलपी में प्रिंसिपल एसोसिएट दर्शना वेलानी समझाती हैं, ‘जायदाद में संपत्ति ज्यादा हों तो हर नई संपत्ति खरीदने, उसका पुनर्विकास करने, बटवारा करने या संपत्तियां नए सिरे से बदलने पर वसीयत को नए सिरे से देखना चाहिए क्योंकि संपत्ति या मिलकियत का ब्योरा पुराना हो तो आगे चलकर विवाद हो सकता है।’
संपत्तियों में, उनकी मालिकाना हक में या विवरण में कोई तब्दीली हो तो उनकी सूची को अपडेट किया जाना चाहिए। वेलानी कहती हैं, ‘यह वसीयत का सबसे अच्छा हिस्सा कहलाता है। सूची अगर पुरानी या गलत है तो वसीयत सही होने पर भी उसे लागू करना मुश्किल हो जाता है या विवाद खड़े हो सकते हैं।’
