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सामने आईं कमजोरियां अब मंथन का है वक्त: आत्म-प्रशंसा छोड़ यथार्थ को पहचानें

सरकार कठोर सत्य क्यों नहीं बोल सकती है यह समझना आसान है। इसलिए क्योंकि भरत यहां निष्पक्ष नहीं है। वह अरब-इजरायल और अमेरिका की ओर है

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शेखर गुप्ता   
Last Updated- March 29, 2026 | 10:07 PM IST

अगर ‘पाकिस्तान से आजादी’ का नारा देने के सिर्फ दो महीने बाद मैं फिर उसी देश के बारे में लिख रहा हूं, तो यकीनन मुझे एक स्पष्टीकरण देना चाहिए। मेरे दो बिंदु इस प्रकार हैं।

पहला, इस सप्ताह यह केवल आंशिक रूप से पाकिस्तान के बारे में है। जल्द ही हम वह बात करेंगे जो भारत के राष्ट्रीय हित के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण और केंद्रीय है। 

दूसरी बात केवल रोना धोना है। वह भी इस तथ्य के बारे में कि पाकिस्तान अब अमेरिका और ईरान के साथ बातचीत की टेबल पर है। और ऐसा क्यों? क्या हम अप्रासांगिक हो गए हैं? क्या हमारा नैतिक कद घट गया है?

विपक्ष सरकार पर हमला करेगा क्योंकि उसे ऐसा करना ही है। यहां तक कि सरकार भी सही जवाबों के लिए जूझ रही है और कह बैठती है कि हम ‘दलाल देश’ नहीं हैं। यह सही जवाब नहीं है।

सरकार कठोर सत्य क्यों नहीं बोल सकती है यह समझना आसान है। इसलिए क्योंकि भरत यहां निष्पक्ष नहीं है। वह अरब-इजरायल और अमेरिका की ओर है। यह सही है कि ईरान के साथ भारत के अहम हित हैं और वह उनके विरुद्ध भी नहीं जाएगा। लेकिन वह ईरान के साथ एकजुटता भी नहीं दिखाएगा। जब यह जंग खत्म होगी तो भारत के हित जीतने और हारने वाले दोनों के साथ जुड़े होंगे।

यही वजह है कि चीन ने कभी मध्यस्थता की पेशकश नहीं की और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यह विषय उठाया। वे समझदार हैं। जहां तक विकासशील देशों की बात है तो चीन पहले ही 32 देशों को अपनी बेल्ट ऐंड रोड (बीआरआई) पहल से जोड़ चुका है। ये सभी देश भारी ब्याज वाले कर्ज में हैं।

चीन शांत है। अगर भारत को मध्यस्थता के लिए या संदेश देने के लिए भी आमंत्रित कर लिया जाए तो भी वे नाराज नहीं होंगे। बल्कि वे तो खुश ही होंगे क्योंकि उन्हें पता है कि भू-राजनीति भावनात्मक विषय नहीं है। इसमें समय के साथ आपका दबदबा बढ़ता है।

पहले दिन से पाकिस्तान रणनीतिक स्पष्टता के मामले में भारत से आगे रहा है। हालांकि इतिहास हमें बताता है कि यह उसके लिए आत्मघाती रहा है। परंतु वह उसे ऐसे नहीं देखता। 1950 के दशक की शुरुआत में, वे साम्यवाद से ‘लड़ने’ के लिए अमेरिका-नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधनों में शामिल हो गए। 

भोले-भाले नेहरू ने इसे इतनी गंभीरता से लिया कि उन्होंने फील्ड मार्शल अयूब को भरोसे में लेकर हिमालय के पार ‘कम्युनिस्ट चीन’ से साझा खतरे के बारे में समझाया और आशा की कि पाकिस्तान भारत के साथ साझा उद्देश्य बनाएगा। कुछ ही समय बाद, पाकिस्तान चीन के साथ अपने ‘सीमा समझौते’ को अंतिम रूप दे रहे थे, जिसका अधिकांश हिस्सा उस कश्मीर के हिस्से में था जिसे उन्होंने कब्जा कर रखा था।

1960 के दशक की शुरुआत तक, पाकिस्तान अमेरिका और चीन दोनों के साथ मिलकर केवल एक उद्देश्य से जुड़ गया था और वह था कश्मीर को सैन्य रूप से लेना। 1965 की जंग को उन्होंने स्वयं चुना। इससे असंतोष पैदा हुआ, आखिरकार अयूब को सत्ता छोड़नी पड़ी और जुल्फिकार अली भुट्टो चुनाव हार गए। ‘गलत’ पक्ष (अवामी लीग) ने बहुमत हासिल किया और पाकिस्तान के पहले असली चुनाव के नतीजों को मानने से इनकार कर दिया गया।

पाकिस्तान ने एक बार फिर अमेरिका के साथ अपने सैन्य गठबंधन और चीन के साथ अपनी विशेष मित्रता को आगे बढ़ाते हुए एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला। उन्होंने जुलाई 1971 में हेनरी किसिंजर को गुप्त कूटनीति के जरिये चीन ले जाकर दोनों का लाभ उठाया। इससे वैश्विक सनसनी पैदा हुई। भारत भी चौंक गया। जाहिर है कि पाकिस्तानी नेता जनरल याह्या खान और भुट्टो खुद को दुनिया के शिखर पर महसूस कर रहे थे। लेकिन इस कौशल के प्रदर्शन के पांच महीने के भीतर उन्होंने अपने देश का आधा हिस्सा गंवा दिया। वास्तव में, उस समय पूर्वी पाकिस्तान की जनसंख्या पश्चिमी पाकिस्तान से अधिक थी। 

1979 में, पाकिस्तान फिर उसी ‘प्रतिभा’ के साथ अमेरिका के साथ सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में शामिल हो गया। इससे उसे बहुत लाभ मिला, लेकिन इसके साथ ही लाखों शरणार्थी और स्थायी जिहादी संस्कृति भी आ गई। वही जिहादी, जिन्हें पाकिस्तान या तथाकथित ‘अफ-पाक’ में पाला गया था, बाद में ट्विन टावर्स को गिराने वाले बने। लेकिन पाकिस्तान 2001 में फिर अमेरिका का ‘मजबूत सहयोगी’ बन गया और अगले दशक में लगभग 22 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक सहायता (या कहें भू-रणनीतिक किराया) प्राप्त की, जब तक कि ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में नहीं मिल गया।

इसके बाद उसके पास क्या बचा? एक लाइलाज जिहादी संस्कृति जो खुद उसे धमकी देती है। इसके अलावा गहरे और हिंसक सांप्रदायिक विभाजन, मानव बम की प्रवृत्ति और अब, जिसे उनके अपने मंत्री अफगानिस्तान के संग खुली जंग बताते हैं। वह भी अपनी ही रणनीतिक ‘संतान’ तालिबान के खिलाफ।

गत 70 सालों में जिन चार कदमों ने वैश्विक सुर्खियां बटोरीं, उन्होंने पाकिस्तान को और कमजोर, गरीब और आंतरिक एकता में गिरावट की ओर धकेल दिया। उसका सबसे लोकप्रिय नेता जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया और एक फील्ड मार्शल की हास्यास्पद छवि अपनी छड़ी घुमाते हुए ऐसे इठलाती रही जैसे यह 19वीं सदी हो। पाकिस्तान हेनरी किसिंजर की सबसे उद्धृत पंक्ति का बड़ा प्रमाण है।

उन्होंने कहा था, ‘अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है।’ भारत में हमें बस अपनी सीमाओं को ऊंचा करना और मजबूत करना है, और अधिक प्रतिरोधक क्षमता बनानी है। यही उपमहाद्वीप में शांति की एकमात्र गारंटी है।

एक सत्य यह भी है कि भले ही सभी पक्ष रणनीतिक स्वायत्तता की कसम खाते हैं लेकिन भू-राजनीति कमजोर दिल वालों के लिए खेल नहीं है, न ही उनके लिए जिनकी दुनिया के सभी प्रमुख प्रतिस्पर्धियों पर गंभीर निर्भरता है।

हमेशा से ऐसा रहा है और इसने हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को बाधित किया है। भोजन से लेकर हथियारों तक, पूंजी से लेकर तकनीक तक, और रोजगार से लेकर ईंधन तक, भारत कभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं रहा। लंबे समय तक ऐसा होने की संभावना भी नहीं है, जब तक कि हम भीतर की ओर न देखें और उन कारणों को ठीक न करें जो हमें औसत बनाए रखते हैं। नैतिक अधिकार और सॉफ्ट पावर जैसी बातें हारने वालों के लिए है।

मैं पांच महत्त्वपूर्ण खामियों की सूची बना सकता हूं जिन्हें चल रहे युद्ध ने उजागर किया है। पहली है ऊर्जा, और अगली दो उससे जुड़ी हैं: उर्वरक और मुद्रास्फीति। चौथी है सैन्य साजोसामान और तकनीक, और युद्धग्रस्त दुनिया में भारी मांग के कारण यह और चुनौतीपूर्ण होगी। पांचवीं है नौकरियां। लगभग एक करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में कार्यरत हैं, जो हमारे यहां धनप्रेषण का लगभग 40 फीसदी योगदान करते हैं, और लाखों अमेरिका में हैं। ऐसे में क्या भारत के पास यह रणनीतिक स्वायत्तता है कि वह कह सके कि इस युद्ध में क्या न्यायसंगत है और क्या नहीं?

एक राष्ट्र को रणनीतिक स्वायत्तता अर्जित करनी होती है, जैसा कि चीन ने किया है। यह विफलता विभिन्न दलों के कार्यकालों में फैली हुई है। यदि भारत को ईरान, वेनेजुएला और रूस से तेल खरीदने पर बड़ी शक्तियों (संयुक्त राष्ट्र नहीं) के प्रतिबंधों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता, और कभी-कभी उन सभी से, तो यह हमारी कमजोरियों की कठोर सच्चाई को रेखांकित करता है।

यदि हम हर सुबह आत्म-प्रशंसा को थोड़ी देर के लिए भूलकर इस पर विचार करें, तो केवल ईमानदारी, सच्चाई को स्वीकार करना, यथार्थवाद और अगले दो दशकों तक की गई कड़ी मेहनत ही हमें उस मुकाम तक पहुंचा सकती है। हमें जल्दबाजी करने की कोई जरूरत नहीं है।

First Published : March 29, 2026 | 10:06 PM IST