इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
परंपरागत समझ के तहत यही माना जाता है कि अगर विभिन्न देश आर्थिक रूप से एक दूसरे पर निर्भर हों तो उनके बीच सैन्य संघर्ष नहीं होते हैं और अगर हो रहा हो तो वह समाप्त हो जाता है। यूरोपीय संघ में शांति और समृद्धि का लंबा इतिहास, जो आर्थिक एकीकरण के सर्वोच्च चरण तक पहुंचने वाला एकमात्र क्षेत्रीय समूह है, इसका सटीक उदाहरण है।
1950 में फ्रांस के प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत शूमन योजना का उद्देश्य दो पूर्ववर्ती विरोधी महाशक्तियों यानी फ्रांस और जर्मनी के बीच परस्पर निर्भरता पैदा करना था, जिसके तहत उनके कोयला और इस्पात उत्पादन को एक एकल अधिराष्ट्रीय प्राधिकरण के अधीन रखा गया। इस प्रकार युद्ध की संभावना को ‘केवल अकल्पनीय ही नहीं बल्कि भौतिक रूप से असंभव’ बना दिया गया।
सहयोगात्मक आर्थिक लाभों को भविष्य के संघर्षों के विरुद्ध एक प्रमुख निवारक कारक माना गया। फ्रांस और तत्कालीन पश्चिम जर्मनी का गठजोड़ समय के साथ मजबूत होता गया और दोनों देशों के नेताओं की मजबूत राजनीतिक साझेदारी ने इसमें मदद की। इस प्रकार यूरोप का आर्थिक एकीकरण अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुंचा और यूरोपीय संघ सामने आया।
हालांकि आर्थिक परस्पर निर्भरता के लाभ कभी-कभी केवल सीमांत स्तर पर महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं और रणनीतिक हित प्रमुख हो जाते हैं। यह विशेष रूप से तब सच होता है जब द्विपक्षीय संबंध, शक्ति की विषमता और विरोधी राजनीतिक व्यवस्थाओं की विशेषता वाले होते हैं, या जब अत्यधिक शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर राष्ट्र की व्यापक वैश्विक आर्थिक परस्पर निर्भरता का लाभ उठाने की क्षमता को कम आंकता है। ऐसी शक्ति असंतुलन की स्थितियों में, श्रेष्ठ शक्ति के लिए यह आकर्षक हो सकता है कि वह कमजोर शक्ति को अनुपालन के लिए मजबूर करने हेतु आर्थिक साधनों या सैन्य कार्रवाई का उपयोग करे।
ईरान, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी रहा है, दशकों से अमेरिका द्वारा प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों यानी आर्थिक, वित्तीय, वैज्ञानिक और सैन्य प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। फिर भी, ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम और तकनीक को विकसित करने के साहसी प्रयास में लगातार दृढ़ता दिखाई है। इस प्रक्रिया में उसने न केवल एकमात्र वैश्विक महाशक्ति अमेरिका, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाले इजरायल की नाराजगी भी झेली।
ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की हालिया सैन्य कार्रवाई उनके दूरदृष्टि से रहित और विस्तारवादी विदेश नीति एजेंडा को दर्शाती है। ईरान की आर्थिक क्षमताओं को अलग-थलग करके किए गए आकलनों ने अमेरिका को इस क्षेत्र में इस गलत साहसिक कदम से अपेक्षित रणनीतिक लाभों का भ्रमित अतिमूल्यांकन करने की ओर धकेल दिया। ईरान के सामरिक जलमार्ग यानी होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता और इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) की अर्थव्यवस्थाओं के भौगोलिक निकटता का लाभ उठाने की उसकी क्षमता को कम करके आंका गया।
साल 2024 में, लगभग 84 फीसदी कच्चा तेल और 83 फीसदी एलएनजी जो होर्मुज स्ट्रेट से गुजरा वह एशिया की ओर जा रहा था। ऐसे में चीन, भारत, जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे सभी प्रमुख क्षेत्रीय तेल आयातक राष्ट्र आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और कमी का दबाव महसूस कर रहे हैं, लेकिन आसियान देशों की छोटी अर्थव्यवस्थाएं विशेष रूप से असुरक्षित हैं। वियतनाम, थाईलैंड और फिलिपींस में पहले ही आपात ऊर्जा-बचत उपाय लागू किए जा चुके हैं। जैसे-जैसे संघर्ष बिना रुके जारी रहेगा, ईंधन आपूर्ति में लगातार व्यवधान और मुद्रास्फीति का दबाव क्षेत्र में विनिर्माण और आर्थिक गतिविधियों पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
इसके अलावा, संघर्ष का विस्तार जीसीसी अर्थव्यवस्थाओं तक होना आसियान की निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्थाओं के लिए दोहरी मार है। अमेरिका द्वारा लगाए गए जवाबी शुल्कों के बाद, जीसीसी देशों ने आसियान और भारत की बाजार विविधीकरण रणनीति में एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभरना शुरू किया था। लेकिन संघर्ष ने शिपिंग और बीमा लागतों को बढ़ाने के साथ-साथ जीसीसी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार की अनिश्चितता को भी बढ़ा दिया है।
ईरान द्वारा खाड़ी देशों की ऊर्जा और बुनियादी ढांचा सुविधाओं पर किए गए प्रतिशोधी हमलों की व्यापकता को देखते हुए युद्ध समाप्त होने के बाद उनकी आर्थिक बहाली तुरंत नहीं हो पाएगी। वास्तव में, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो जीसीसी देशों को अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है, क्योंकि यह क्षेत्र में निवेश और पर्यटन के प्रति वैश्विक विश्वास को प्रभावित करेगा।
निर्यात बाजार जोखिमों में वृद्धि और विनिर्माण गतिविधि में गिरावट की संभावनाएं आसियान अर्थव्यवस्थाओं में पहले से मौजूद ‘असमय औद्योगीकरण क्षति’ की चुनौती पर और बोझ डालती हैं। चीन से कम लागत वाले आयात की बाढ़, उसकी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता और पश्चिमी मांग की कमजोरी अधिकांश आसियान अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू विनिर्माण और औद्योगिक गतिविधि के लिए विशेष रूप से हानिकारक रही है। पिछले कुछ वर्षों में थाईलैंड और इंडोनेशिया में कारखानों का बंद होना आम हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां चल रहा संघर्ष छोटे तेल-आयातक आसियान देशों के लिए गंभीर प्रभाव डाल रहा है, वहीं चीन कई कारणों से लाभ उठा सकता है। पहला, उसने कच्चे तेल का बड़ा सामरिक भंडार जमा कर रखा है, दूसरा, रूस से प्राकृतिक पाइपलाइन गैस का निरंतर आयात जारी है और तीसरा, वह इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर पैनलों का प्रमुख उत्पादक है। इन सबके कारण वह होर्मुज के प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित है।
दूसरा, युद्ध ने चीन और भारत जैसे सभी बड़े शुद्ध तेल-आयातक देशों के लिए जीवाश्म ईंधन से दूर हटने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में और अधिक निवेश करने की तात्कालिक आवश्यकता पैदा कर दी है। दुनिया के सबसे बड़े हरित प्रौद्योगिकी और उत्पाद जैसे सौर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन और पवन टर्बाइन निर्माता के रूप में चीन को वर्तमान में विशिष्ट लाभ प्राप्त है।
तीसरा, ईरान युद्ध में अमेरिका की लंबी सहभागिता और इसके परिणामस्वरूप सैन्य संसाधनों की कमी तथा पूर्वी एशिया से ध्यान हटना इस क्षेत्र के लिए गंभीर सुरक्षा निहितार्थ रख सकता है। उदाहरण के लिए, युद्ध ने ताइवान की कमजोरियों को उजागर किया है, जो दुनिया का अग्रणी सेमीकंडक्टर और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातक है।
सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन ऊर्जा-गहन है और सामग्री, पुर्जों और घटकों के सुचारु हवाई और समुद्री परिवहन पर अत्यधिक निर्भर है। ताइवान के पास क्षेत्र के प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक उत्पादकों में सबसे छोटे गैस भंडार हैं। इसके अलावा, ईरानी हमलों की आशंका ने कतर की हीलियम उत्पादन केंद्रों को रोक दिया है, जो दुनिया की हीलियम आवश्यकता का एक-तिहाई आपूर्ति करती हैं। हीलियम चिप निर्माण और अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों में एक महत्त्वपूर्ण इनपुट है। लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष ताइवान की अर्थव्यवस्था को गंभीर चोट पहुंचा सकता है, जिसमें चीनी हस्तक्षेप की संभावना भी शामिल हैं।
इसलिए, यह उचित कारण है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक परस्पर निर्भरता को शांति का साधन माना गया था। युद्ध, चाहे स्थानीय ही क्यों न हो, एक सघन रूप से जुड़ी हुई दुनिया में वैश्विक अर्थव्यवस्था में खतरनाक परिणामों को जन्म देने के लिए बाध्य है। इनमें से कुछ परिणाम लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
(लेखिका जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)