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बिज़नेस स्टैंडर्ड

Editorial: ईपीएफओ वेतन सीमा बढ़ी, सामाजिक सुरक्षा मजबूत करने के साथ चुनौतियां भी बढ़ीं

ईपीएफओ कवरेज के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने के सरकार के फैसले से औपचारिक क्षेत्र में वेतन के साथ सामाजिक सुरक्षा का ढांचा और करीब आ गया है।

EPFO

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Last Updated: सितंबर 22, 2026 | 10:56 PM IST

अनिवार्य कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) कवरेज के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने के सरकार के फैसले से औपचारिक क्षेत्र में वेतन के साथ सामाजिक सुरक्षा का ढांचा और करीब आ गया है। इस सीमा में आखिरी बार सितंबर 2014 में संशोधन किया गया था जब इसे 6,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये किया गया था। इसके बाद से न केवल वेतन में वृद्धि हुई है, बल्कि औपचारिक रोजगार का आकार भी बढ़ा है। 

आवधिक श्रम शक्ति सर्वे (पीएलएफएस) की 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार नियमित वेतन/मजदूरी पाने वाले कर्मचारियों की औसत मासिक आय 2025 में 22,699 रुपये थी। ईपीएफओ की एक पूर्व विशेषज्ञ समिति ने उल्लेख किया था कि अमेरिका, सिंगापुर और ब्राजील जैसे देश वेतन के संदर्भ में ऐसी सीमाओं में समय-समय पर संशोधन करते हैं। ऐसे में यह तर्क दिया जा सकता है कि भारत को भी इतने लंबे अंतराल के बाद एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी करने के बजाय इस सीमा में अधिक नियमित अंतराल पर संशोधन करना चाहिए।

हालिया संशोधन से सरकार की राजकोषीय देनदारी भी बढ़ेगी। केंद्र सरकार का ईपीएफओ से संबंधित वार्षिक खर्च अनुमानतः 10,250 करोड़ रुपये से बढ़कर 11,339 करोड़ रुपये हो जाएगा। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण पेंशन योग्य उच्च वेतन सीमा पर कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) में सरकार द्वारा किए जाने वाले 1.16 फीसदी योगदान में वृद्धि है। 

इसका बड़ा हिस्सा नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बढ़े हुए योगदान के जरिए वहन किया जाएगा। योगदान बढ़ने से कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वेतन कम हो सकता है। यह अपेक्षाकृत कम समय में दूसरी बार होगा, जब कर्मचारियों के टेक-होम वेतन पर असर पड़ेगा। वेज कोड 2026 के तहत कंपनियों को पहले ही अपने वेतन ढांचे की समीक्षा करनी पड़ी है। इसमें प्रावधान है कि मूल वेतन और महंगाई भत्ता सकल वेतन का 50 फीसदी होना चाहिए। इस बदलाव से बड़ी संख्या में कर्मचारियों के ईपीएफ योगदान में वृद्धि हुई है।

अब वेतन सीमा में संशोधन से यह योगदान और बढ़ेगा तथा कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वेतन कम होगा, हालांकि यह राशि सेवानिवृत्ति बचत के लिए जमा की जाएगी। दोनों बदलावों को एक साथ लागू किया जा सकता था। यदि वेतन संरचना में नियोक्ता का योगदान पहले से ही कंपनी लागत (सीटीसी) में शामिल नहीं है तो नियोक्ताओं को भी अपने सांविधिक योगदान में इसी तरह की बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। यह खास तौर पर श्रम-प्रधान कंपनियों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए महत्त्वपूर्ण है जहां लाभ का मार्जिन और वेतन लागत एक-दूसरे से करीबी से जुड़े होते हैं। इस विस्तार से ईपीएफओ की सेवाएं कुशलतापूर्वक उपलब्ध कराने की क्षमता पर भी अधिक दबाव होगा। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार ईपीएफओ में करीब 7.98 करोड़ योगदान करने वाले सदस्य हैं जबकि कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) से लगभग 82 लाख पेंशनभोगियों को लाभ मिलता है।

ईपीएफओ ने 2024-25 में 6.02 करोड़ दावों का निपटारा किया। इस दौरान दावों के स्वचालित प्रसंस्करण और डिजिटल सेवाओं की ओर भी तेजी से बदलाव देखने को मिला है। ईपीएफओ 25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सेवानिवृत्ति बचत का प्रबंधन करता है। वर्ष 2025 में भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट ने ईपीएफओ की लेखांकन व्यवस्था, जोखिम प्रबंधन, पोर्टफोलियो प्रबंधन और आंतरिक प्रशासन में कुछ कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि ईपीएफओ की भविष्य निधि, पेंशन और बीमा योजनाओं की अलग-अलग देनदारियों के अनुरूप निवेश रणनीतियों को बेहतर ढंग से तैयार करने की जरूरत है।

इसलिए, अंशदान में बढ़ोतरी के साथ-साथ मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था, पेशेवर विशेषज्ञता और बेहतर एक्चुरियल निगरानी भी सुनिश्चित करनी होगी। इसके अलावा, सरकार को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्ति कोष के प्रबंधन में अधिक विकल्प और भूमिका दी जाए। इसका एक तरीका बाहर निकलने का विकल्प उपलब्ध कराना हो सकता है। कर्मचारियों को ईपीएफओ में अनिवार्य रूप से शामिल करने के बजाय राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) के माध्यम से बचत करने की अनुमति दी जा सकती है।

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